शशिवेंद्र 'शशि' एक लेखक और विचारक हैं जो लगभग दो दशकों से शिक्षण, अनुसंधान और लेखन के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। अपने लेखन के माध्यम से वह भारतीय समाज की परंपराओं और रुढ़ियों की जटिलताओं में गहराई से जाते हैं। वह जाति प्रणाली और असमानताओं की आलोचना करते हैं और सांस्कृतिक न्याय और समानता के लिए मजबूती से वकालत करते हैं। शशि समानता और सुलभ न्याय के लिए वकालत करते हैं, साथ ही साथ महान सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाते हैं। ट्विटर: @Shashivendra84 सोशल मीडिया हैशटैग: #Ssps96
गुरुवार, 3 सितंबर 2026
गुरुवार, 27 अगस्त 2026
विरला संयोग
दीन दयाल विरिदु सम भारी
हरहू नाथ ममं संकट भारी
गेरूआ वस्त्र पहने हुए भरे पूरे शरीर वाले एक सूर लाठी की टेक लगाये चले आते हैं
धीरे धीरे आगे बढते हुए
किसी ने हाथ पकड़कर एक सिक्का दे दिया और किसी ने मुंह फेर लिया लेकिन वो बिना विचलित हुए चले जाते हैं
मै 12-15 वर्षो से यह संयोग देख रहा हूं
वही गाड़ी
वही गायक
वही मै
वही सरयू
वही चौपाई
बडा ही विरला संयोग है ।
मै हर बार इसमें अपना 10 रूपीय योगदान कर इस संयोग पर अचंभित रह जाता हूं
शनिवार, 22 अगस्त 2026
23rd August 2026
मंगलवार, 18 अगस्त 2026
मेरी शतरंज यात्रा
रविवार, 21 जून 2026
आंसू
शनिवार, 25 अप्रैल 2026
नारायन 'चा'
शनिवार, 27 सितंबर 2025
घोड़े
रविवार, 24 अगस्त 2025
द्रोण पुस्तक के चतुर्थ सर्ग से
शनिवार, 23 अगस्त 2025
महादेवी वर्मा को शब्दसुमन अर्पण !
प्रतिज्ञा
रविवार, 29 दिसंबर 2024
फिसलता वक्त ⏳️
खुदा से इतर करी न किसी की बंदगी
आयेगी मौत तो न झुकेंगी मेरी नजरें
शुक्र है जो न की हसीनों से दिल्लगी।।१
झूठ के मुंह पर हमेशा उसे झूठ कहा
वक्त बदला तो दौर अब अपना न रहा
हम तो नजाकत में पले थे बचपन से
बदलते मौसम के थपेड़े कभी न सहा।।२
इल्म हुआ बेशक इन थपेड़ो की चोट से
सुरखुरु करने का ये कुदरती अंदाज है
शुक्रिया कहने को अब रहता ही कौन
खत्म हो तमाशा तो क्या शाकीन बचते हैं?३
गिरते गिरते भी संभल पाने का हुनर
डूबने पे तैरकर निकल जाने का हुनर
समो लेना समंदर का तूफां आगोश में
मुफलिसी से सीखा हमने अजीम हुनर।।४
हमने डंसते आस्तीनो का सांप देखा है
गोया जीत चुके बाजी की मात देखा है
देखा, दूसरों के जज्बात ठुकराते लोग
गैर की आफत मे कहकहे लगाते लोग।।५
अपना जुगनू तो दम भर उछालते हैं
दूजे का हो आफ़ताब खाक बताते हैं
सब्र औ सुकुं बचा ही कहां दुनिया में
मशविरा देकर यहां माल कमा जाते हैं।।६
रविवार, 15 दिसंबर 2024
पकड़ी का पेड़:- धरोहर
मेरे गांव मे एक पुराना 'पकड़ी' का पेड़ है जो हमारी कई पीढियों से यूं ही अडिग अचल खड़ा है। वो मेरे गांव के पश्चिमी छोर पर मौन खड़ा सैकड़ो पंक्षियों का बसेरा है। छोटे बड़े किसान अपनी फसल की मड़ाई करते हैं वहां उसने देखा है अनगिनत बदलती हुई ऋतुएं, बदलते हुए मुख्तार और अप्रतिम भाईचारा ।
उसने देखा है 'कर्बला के मेले' में ताजिए के पास ढोलक बजाता संदीप, जलेबी बनाते पुजारी, सब्जी बेचते रामकिशुन और कागज के बनावटी घोड़े को नचाते जवाहर और भी ऐसे अनेकों लोग जो शायद अखबार नही पढ़ते इसीलिए बराबर शरीक होते है एक दूसरे के दुख सुख में उनके तीज त्यौहार में। पर एक दिन जब पूरी हो जाएगी उसकी उम्र तो वो भी चला जाएगा अपने साथियों की तरह, सूख जायेंगी उसकी डालियाँ रह जाएगा शेष कि उस 'पकड़ी के पेड़ ने एक युग एक पूरा युग जिया सिर तानकर, कमर पर हाथ रखकर ...........
रविवार, 8 दिसंबर 2024
'द्रोण' पुस्तक के अंश का संकलन, एक कविता के रूप मे
जन्माष्टमी विशेष
सुबह-सुबह जैसे ही नींद खुली तो "ठाकुर जी" का बडा सलोना सा एक चित्र मेज पर रखा था कैसी मनोहर तस्वीर है माथे पर चंदन लगा...
-
वृद्धाश्रम में सुबह की चाय पीते हुए शारदा बाबू नीम के पेड़ के नीचे वाले चबूतरे पर बैठ गये थे। सेवानिवृत्त होने के बाद धीरे धीरे यह तीसरा साल...
-
सिसकती रातों की मंजिल क्या है लरजते आसुंओं से हासिल क्या है जीते तो मिल ही जाती बादशाहत पर हार जाने पे मुकम्मल क्या है।। थके तो...
-
शीर्षक - वफादार घोड़े :- 🐎 आज के परिवेश मे राजनीतिक कार्यकर्ताओं की घोर निष्ठा और वफादारी अपनी स्वामिभक्ति के लिए विख...
