बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

चिरैयादह का मलेर

चिरैयादह वर्तमान पंजाब और हरियाणा की सीमा से लगी एक स्वतंत्र रियासत थी। यह मलेर राजपूतों की राजधानी थी। किंवदन्ती है कि एक मलेर दस दिलेर के बराबर होता था और प्रत्येक दिलेर एक सवाशेर के बराबर होता था । 
यह अनुपात कुछ इस प्रकार था कि एक सवाशेर एक पूर्णतया विकसित और पुष्ट शेर की शक्ति के सवैया के बराबर माना जाता था। उस समय चिरैयादह का शासन सुलखा मलेर के हाथ में था जो अपने पिता बिराल की चौथी पत्नी की सातवीं संतान था।
उसके जन्म से पहले ही अलूवा सिद्ध ने बता दिया था कि चिरैयादह का नया मेठ आने वाला था। चिरैयादह में राजा को मेठ कहा जाता था । उसकी मां किसी कुलीन राजवंश से नही थी बल्कि एक चरवाहे की बेटी थी जो अपनी भेडों की रक्षा के लिए निहत्थे ही भेडियों के झुंड से भिड़ जाते थे। माता के वंश का शायद जुझारूपन का यही गुण सुलखान के व्यक्तित्व में समा गया था। वह बचपन से ही बहुत जुझारू और गंभीर था। अपने भाई बहनों मे वह 11वें नंबर पर था लेकिन पिता का स्नेह इसे कभी नही मिला।
बलबन उस समय दिल्ली की गद्दी पर बैठा और उसने चहलगानी समाप्त कर अब एक नयी सैन्य पद्धति चलायी थी। जिसमें सेना में भर्ती होने के लिए अन्य राजाओं को सुल्तान की सेवा में अपने राज्य से युवा सैनिक देने पडते थे। चिरैयादह राज्य अपने निर्माण से ही स्वतंत्र रहा था उसे गुलाम बनाने का साहस कभी किसी भी शासन में नही रहा लेकिन बलबन को अब ज्यादा सैनिकों की आवश्यकता थी और अपने शासन के नवोदित काल में ही मलेरों के इतने मजबूत समूह को दिल्ली के इतने पास नही रहने देना चाहता था। यह कूटनीतिक दृष्टि से भी सुरक्षित नही प्रतीत होता था बल्कि उसे तो आश्चर्य था कि कैसे उसके पूर्ववर्ती शासको ने इनहे फलने फूलने दिया था। सो वह उन्हे छेड़ने का खतरा लेने को बाध्य था। चहलगानी के अमीर अब इल्बारी तुर्कों से नफरत करने लगे थे क्योंकि बलबन इसी वंश खानदान से था। जब एक तुर्की अमीर को भरे दरबार में घुटनों पर बैठकर सुल्तान को सिजदा और पाबोस करना पडता था तो वह अंदर तक शर्मसार हो जाता था और अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए वह किसी भी स्तर पर जाने को तैयार बैठा था लेकिन राज दरबार मे असंतोष का स्वर उठाने का किसी मे साहस न था।  बलबन की मजबूत लौह और रक्त की नीति इसके लिए जिम्मेदार थी। वह अपनी अवज्ञा करने वालों के साथ भयंकर रूप से निपटता था। इससे उसके विरोधियों के हौसले पस्त हो जाते थे और विरोध का स्वर उनके कब्र मे दब कर क्षीण हो जाता था। इतनी बर्बरता और कठोरता के आगे सभी डरे हुए थे । यहां तक कि सुल्तान के मंत्री सलाहकार भी डर डर कर सलाह देते थे। बलबन छोटे कद का एक कठोर शासक था यह उसके चेहरे से भी झलकता था जो बचपन मे ही चेचक के दाग से भर गया था और विकृत लगता था। सुल्तान की गद्दी पर बैठा इक डरावना व्यक्ति जिसकी हनक मात्र से बडे बडे योद्धाओं की छाती बैठ जाती थी परंतु बलबन मे ऐसा कोई अवगुण नही था जो राज्य के लिए नुकसानदायक हो। शायद ऐसा इसलिए कि प्रकृति ने उसे मंगोलों की चुनौती झेलने के लिए तैयार किया था। मंगोल उस समय की सबसे बडी चुनौती थे, चहलगानी अलग षड्यंत्र बुन रही थी। बलबन की राह आसान नही थी लेकिन अपनी इच्छाशक्ति से वो आगे बढ रहा था मंगोलों के छोटे छोटे हमले नाकाम किये जा रहे थे जो आने वाले किसी बडे युद्ध का संकेत भी थी। बलबन इसे भांप चुका था और वह अपनी सैन्य मजबूती मे लग गया था। हालांकि उसकी सेना में अलग अलग समूह थे सबपर उनकी वीरता का ठप्पा लगा था लेकिन मंगोलों के लिए यह पर्याप्त नही था। मंगोलों का सरदार रंहोर खान कद काठी और क्रूरता मे हूबहू दूसरा चंगेज खान था। दुधमुंहे बच्चे को पटककर मारने के उसके कई कुख्यात किस्से सुनाये जाते थे। उसपर नरभक्षण का संशय भी था यहां तक कि रात्रि में उसकी ही सेवा में तैनात परिचायकों के गायब होने की कई घटनायें हो चुकी थी। दबी जुबान से उसके निशा-राक्षस होने की बात सुनने में आती थी । वह मांस का ऐसा प्रेमी था कि जानवरों  के बच्चे का मुलायम मांस कच्चा खा जाता था। ऐसे भयानक और क्रूर शत्रु ने जब दिल्ली का रूख किया तो दिल्ली सल्तनत के अंदर भय इस कदर व्याप्त हुआ कि वणिक और व्यवसायी वर्ग अपना व्यवसाय छोड़कर पूरब मे बंगाल की तरफ जाने की योजना बनाने लगे । उनका मानना था कि रंहोर विप्लव करता हुआ दिल्ली और आसपास के इलाकों तक ही रहेगा यदि आगे भी बढ गया तो मध्यक्षेत्र तक जा सकेगा बंगाल का ध्यान नही करेगा। बलबन के पास इस बात की सूचना पहुँची तो वह पहले से ही आतंकित था अब उसकी रात की नींद भी गायब हो गयी थी। रोजाना सुबह शाम मंगोल टुकड़ी की सूचना मिलती, आज यहा तक आ पहुँचे परंतु जब मंगोल सेना सरहिंद तक आ गयी जो दिल्ली से महज चार दिन का सफर शेष रह गया तो बलबन की व्याकुलता बढ़ गयी। वैसे तो मंगोल कोई बहुत युद्ध के लिए प्रशिक्षित कौम नही थी परंतु युद्ध के बाद लूट-खसोट की इतनी तत्परता शायद ही किसी और कौम मे थी। यही एक वजह थी कि उनका प्रत्येक सदस्य लडने को आतुर एक खतरनाक योद्धा था और उसके हाथ मे पकड़ी गई हरेक चीज एक हथियार थी। वह समुद्र की एक बड़ी लहर की भांति थे जो अपने सामने आने वाली हरेक चीज को बहा ले जाती थी और पीछे तबाही का अवशेष छोड जाते थे। बलबन के पास इनकी कोई काट नही थी उसकी सेना मे रंहोर का इक अलग भय भी व्याप्त था ।
जो कच्चा मांस खा जाता हो उस दस्यु की शक्ति का क्या ही पारावार होगा।
बलबन और उसका पूरा सियासी खेमा इस पर विचार कर रहा था रतजगे हो रहे थे। आधी रात बीत चुकी थी कोई समाधान नही दिख रहा था। सबके हाथ माथा थामे हुए थे अचानक जलीग नुसाई जो बलबन का बावर्ची था कहवे का कुल्हड लेकर शाही कमरे मे हाजिर हुआ और सुल्तान के दस्तरखान पर रखते हुए बोला
"हुजूर जान की माफी हो तो कुछ अर्ज करूं"
बलबन ने बिना उसकी ओर देखे बोलने का इशारा किया 
"सुल्तान, इस मुसीबत को टालने के लिए पश्चिम की ओर क्यों नही देखते
जनाब, रंहोर को मलेर ही मार सकते है"। 
और इतना कह कर वह हुक्म लेकर चला गया
बलबन के पास अब तक इसका समस्या कोई हल न था लेकिन अब उसके पास था
लेकिन मलेरों को मनायेगा कौन........क्रमशः

(शशिवेंद्र 'शशि' के उपन्यास 'चिरैयादह का मलेर' का अंश)

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मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

अनाहत

आज का शब्द 👑 'अनाहत'
(Unstruck, Unbeaten, Soundless)
अर्थ🔍है : जिसे आहत (चोटिल, आघातित या प्रहार) न किया गया हो; जो बिना किसी आघात या संघर्ष के स्वतः उत्पन्न हो।

इसके पर्यायवाची शब्द हैं:- 

• अनहद
• अक्षत
• अखंड
• अक्लिष्ट
• अनाहत नाद

साहित्यिक 📙संदर्भ:-

• संत कबीरदास और अन्य निर्गुण संतों की वाणी में 'अनहद' (अनाहत का प्राकृत रूप) शब्द का अत्यंत गहरा प्रयोग मिलता है। जब साधक का मन बाहरी कोलाहल से मुक्त होकर भीतर की ओर मुड़ता है, तब उसे उस शाश्वत आंतरिक संगीत (अनहद नाद) की अनुभूति होती है।

• यह शब्द उस अछूते, निर्मल और शाश्वत सत्य का प्रतीक है जिस पर समय या संसार के प्रहार अपनी कोई छाप नहीं छोड़ पाते।

झिलमिल झिलमिल झिगमग बाजे, अनहद का बाजा रे। 
गगन मंडल में बैठी के, संत करें रतिराजा रे॥
— संत कबीर
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बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

ईष्ट

आज का शब्द है 👑 'ईष्ट'

Desired / Wished / Favorable / Beloved 

संस्कृत के 'इष्' (चाहना / कामना करना) धातु से बने इस शब्द का शाब्दिक अर्थ 'चाहा हुआ' या 'प्रिय' है।

अर्थ🔍: जो अत्यंत प्रिय हो, जिसकी कामना की गई हो, या जिसकी आराधना की जाए; आदरणीय, वांछित या आराध्य ।

इसके पर्यायवाची शब्द:

• वांछित / अभीष्ट 

• प्रिय / प्यारा 

• आराध्य / पूज्य 

• शुभ / अनुकूल 

नोट: उर्दू में इसके लिए 'मस्लूब', 'पसंदीदा', या 'महबूब / मुराद' का प्रयोग किया जाता है।

साहित्यिक संदर्भ 📙📙📙:

1️⃣ भारतीय परंपरा में 'इष्ट' या 'इष्टदेव' उस देवी-देवता या शक्ति को कहा जाता है जिसके प्रति व्यक्ति की अगाध निष्ठा, प्रेम और व्यक्तिगत समर्पण होता है।

2️⃣ काव्य और प्रेम-साहित्य में 'ईष्ट' या 'अभीष्ट' उस लक्ष्य या प्रियतम का प्रतीक है जिसे पाने के लिए कवि या नायक समस्त बाधाओं को पार करता है।

3️⃣ मनोविज्ञान में मनुष्य की गहरी इच्छाओं और आकांक्षाओं को उसका 'ईष्ट' कहा जा सकता है।

श्रद्धा के जिस अर्घ्य से, सजता है मन का घाट, 
वही ईष्ट बनकर तराशता, जीवन की हर एक बाट।

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मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

बेतकल्लुफी

बेतकल्लुफी से बोते रहे नफरत की फसल।
मै परेशान हूं ये कटेगी औ घर ही तो आवेगी।।

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सोमवार, 28 सितंबर 2026

बेटी

क्या ये वक्त है बदला, क्या हालात बदले हैं
क्या तासीर बदली है खूब जज्बात बदले हैं
स्टोव की ज़द में पहले होती थी बस बहुएं
अब सास ससुर भी नीले ड्रम के खतरे है।।
बडा खानदान है उसका जो बेटी देता है तुम्हे
अपने से बडा समझे है तो बेटी देता है तुम्हें 
तुम यूं बेमुरूव्वत जी रहे घर की दहलीज मे
उसकी सिसकियों का सैलाब जला न दे तुम्हें ।।
खाली हाथ आया भाई तो आंख भर आयी
जो कुछ छिपाया था हथेली पर रख आयी
गुल्लक में छिपा दिये शौहर के चांटे सारे
वह भाई से मिली भी तो मुस्करा कर आयी।।
जमीं पे गिरे आंसू वो अब तेजाब हो गये
सिसकियां जो बदलीं तो अजाब हो गये
दहलीज में बैठे गिने वो चांदी के सिक्के
बेटी की ससुराल वाले बेनकाब हो गये।।

बाग से फूल हटाओगे तो माली क्या ही करेगा
हंसी चिड़िया मिटाओगे तो जंगल क्या ही करेगा
जिसकी मुस्कराहट पर सारी उम्र जिया उसने
उसकी गुड़िया जलाओगे तो बाप क्या ही करेगा।।


आंगन की गौरैया बचायी जालिम जमाने से
और तुम्हें सौंपी हो बड़ी मिन्नत से, मनाने से
वो भूचाल थाम कर  पी लेगा समंदर सारा 
खता न करना, बचना उसे आजमाने से।।
जख्म देना गर उसे तो बस बेपरवाह ना होना
ख्याल रखना उसका कभी लापरवाह न होना
बेटियां सबसे अजीम चीज होती हैं बाप की
जिंदा हो बाप तो बेटी रूलाकर चैन से न सोना।।

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शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

मुहावरेदार:- बंदर 🐒 क्या जाने अदरक का स्वाद

मुहावरेदार:- बंदर 🐒 क्या जाने अदरक का स्वाद

शुक्रवार की बाजार मे थैले और जेब का भरसक संतुलन बनाने का प्रयास करते हुए मैं अगली खरीदारी को बढा ही था कि श्रीमती जी का फोन आ गया
मैने एक ही झटके मे सब बता दिया जो खरीद चुका था और जो खरीदने वाला था ।
वो दूर दराज किसी कस्बे के दबंग थानेदार की तरह पूछती रही मै एक सीधे साधे ग्रामीण की तरह सकपकाता जवाब देता चला गया।
सब ठीक चल रहा था अचानक उसे अदरक का ध्यान आ गया
बोली तीन बार से अदरक नही ला रहे हो
मैने भी तपाक से जवाब दिया, ले लिया है, बताना भूल गया
काल काटकर मै अदरक वाले को ढूंढता आगे बढा वह कोने मे खडा था उसकी रेहडी पर बहुत कम भीड़ थी।
मैने जब दाम पूछा तो पता चला 400रू प्रति किलो
थकहार कर मुझे 100ग्राम खरीदना ही पडा
फिर वापस लौटते हुए अदरक मेरे दिमाग में कौंधने लगा

"बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद"

अक्सर घरों मुहल्लों चौक चौबारे और सामान्य बोलचाल में यह तंजपूर्ण मुहावरा चिपका दिया जाता है।

अदरक 🫚 जिसे संस्कृत में शुष्ठी भी कहते हैं। यह एक औषधीय पौधा है जिसका वानस्पतिक नाम जिंजिबर ऑफ़िसिनेल है और यह हमारे दक्षिण एशिया की देशीय उपज है लेकिन यह स्वभाव से अति कडवा और गर्म होता है। इसके गुण दोष का मूल्यांकन करें तो कहीं भी यह नही लगता कि यह किसी को पारितोषिक के तौर पर दिया जा सके।
हां यदि किसी से मित्रता बढानी हो तो उस खांसते या सिसकते व्यक्ति को मस्त अदरक की चाय पर आमंत्रित किया जा सकता है।
इसके अलावा पुराने टाइम मे जब कोका कोला पेप्सी जैसे ठंडे पेय पदार्थ नही थे तो हमसे जस्ट पहले वाली पीढी शायद कालेज कैंटीन मे अपनी महिला मित्र को जरूर अदरक की चाय ही पिला कर प्रपोज❤️ करती रही होगी।
केरोसीन वाले स्टोव पर तपते पतीले में उबलती चाय और उसमे कूट कूटकर डाली गयी अदरक उसके स्वाद को और तीक्ष्ण कर देती है। यह तीक्ष्णता हृदय की गहराईयों में उतरते हुए किसी का हाथ थामने को मजबूर कर देती होगी
और शायद यही वो पल है जब इजहार कर दिया जाता रहा होगा खैर
इसके अलावा अदरक का घरेलु उपयोग भी है जिसमें उसकी कतरनें उदर के रोगी को नमक से खिलायी जाती हैं तथा कच्चे अदरक की चटनी जो सिल बट्टे पर पिसी हुई मिल जाये तो बस अह हा हा.....भोजन करने वाले का मन तृप्त हो जाये।

फिलहाल बंदरों को तो न चाय बनानी आती है न ही वो सिल बट्टे का प्रयोग करना जानते हैं फिर उसे अदरक थमाने का क्या प्रयोजन रहा होगा।

जरूर मुहावरा बनाने वाले का बंदरों से कोई बैर रहा होगा तभी तो उसे अदरक जैसी कीमती चीज थमा कर व्यंग्य किया जाता है..........
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गुरुवार, 3 सितंबर 2026

जन्माष्टमी विशेष

सुबह-सुबह जैसे ही नींद खुली तो "ठाकुर जी" का बडा सलोना सा एक चित्र मेज पर रखा था


कैसी मनोहर तस्वीर है
माथे पर चंदन लगा हुआ है
जैसे किसी ने "Happy Birthday" वाला टीका माथे पर लगा दिया हो❤️🫡🙏

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गुरुवार, 27 अगस्त 2026

विरला संयोग

सुबह के मद्धम शोरगुल मे 'गोरखधाम सुपरफास्ट एक्सप्रेस' जैसे ही सरयू नदी के चौका घाट से आगे बढती है डिब्बे मे एक बुलंद आवाज गूंजती है

दीन दयाल विरिदु सम भारी
हरहू नाथ ममं संकट भारी

गेरूआ वस्त्र पहने हुए भरे पूरे शरीर वाले एक सूर लाठी की टेक लगाये चले आते हैं
धीरे धीरे आगे बढते हुए
किसी ने हाथ पकड़कर एक सिक्का दे दिया और किसी ने मुंह फेर लिया लेकिन वो बिना विचलित हुए चले जाते हैं
मै 12-15 वर्षो से यह संयोग देख रहा हूं

वही गाड़ी
वही गायक
वही मै
वही सरयू
वही चौपाई

बडा ही विरला संयोग है ।
मै हर बार इसमें अपना 10 रूपीय योगदान कर इस संयोग पर अचंभित रह जाता हूं

शनिवार, 22 अगस्त 2026

23rd August 2026

काँटा कठोर है तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है ।।।
मै कब कहता वो घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने।
परिश्रमी लोगों की असफ़लता पर धीरज बढाती ये पंक्तियां प्रेरणा का वो गीत है जो झुके हुए कंधों और शीश को पुन: प्रयास के लिए तैयार कर देती हैं.....

मंगलवार, 18 अगस्त 2026

मेरी शतरंज यात्रा

1996 रहा होगा शायद, मेरा दाखिला 9वीं कक्षा में होना था इसलिए मै अपने ननिहाल आ गया था। गर्मियों की छुट्टियां और दिन की दुपहरी साथ ही दोस्तों का न होना, सही मायने में नये दोस्त बनाने का अभी समय ही नही मिला था। सो हिन्दी की कहानियां पढते दिन कट रहे थे। लेकिन शतरंज का शौक हिलोंरे ले रहा था, कहाँ तो 5-6 घंटे दिन में खेल जाते थे यहा तो कोई मिल ही नही रहा। सो मैने अकेले खेलने का हुनर विकसित किया और एक दिन मैं अकेला दरवाजे पर छोटे वाले नीम के पेड के नीचे शतरंज लगाये खेल रहा था।

सिर झुकाये बोर्ड को निहारते मैं चाल चलने में मशगूल था कि अचानक एक आवाज गूंजी "का हो अकेले खेलत हव, आव एक बाजी हो जा"
मैने सिर उठाया तो देखा एकदम सफेद लकलकवा कुर्ता पाजामा पहने एक शख्स बढ़ी दाढी और आंखो पर मोटी फ्रेम का चश्मा लगाये आकर खाट पर बैठ गये। मैने रास्ते मे आते जाते तो देखा था लेकिन नाम और कोई फार्मल परिचय कभी नही हो सका था फिर मै खुद को इस खेल का एक शानदार खिलाड़ी मानता था। 
ऐसे कैसे कोई चुनौती दे और मै स्वीकार ना करूं हो ही नही सकता था, फिर क्या मैने भी यह आमंत्रण स्वीकार कर लिया। खेल शुरू हो गया, धीरे धीरे जैसे जैसे खेल आगे बढा मुझे समझ आने लगा मेरा प्रतिद्वंदी कोई साधारण खिलाड़ी नही है।
पर हमने भी आम के पेड़ों के साये में घास और पुआल पर बैठकर शतरंज खेला था 
बड़ी सख्त जान थे
आखिरी में जब मुकाबला बराबरी पर छूटा तो जनाब बोले "कल फिर खेलते हैं"
फिर क्या था
अब जो सिलसिला शुरू हुआ तो सुबह 9 बजे हम दोनो बैठते तो शाम के अंधेरे तक बात खत्म नही हो पाती फिर कल का वायदा
यूं जैसे प्रेमचंद की रचना 'शतरंज के खिलाड़ी' जीवंत हो उठी हो,
बैठने को हरी नीम की कोमल छाया, उसकी मंद मंद बहती हवा और खाने पीने की तो सुध नही बस एक बाजी फंस जाये तो कुछ घंटे गुजर जाते और कभी कभी तो एक ही बाजी पूरा पूरा दिन बिता देती थी।
दिन गुजरने लगे और मैने कई दांव और नये तजुर्बे सीखे
शतरंज में ऊंट से खेलना मेरा पसंदीदा शगल था और ऊंट से चाल फंसानी भी मैने यहीं सीखा था
यही सीखा मैने पिद्दी (सिपाही) की जाफरानी 'चाल'
👑 उलझन को उलझाना और सबसे बढकर सामने वाले का हावभाव देखकर खेल और खिलाड़ी का अनुमान लगाना।
धीरे धीरे और खिलाड़ी जुडने लगे 
जगह और खाट कम पडती 
फिर कुछ दिनों बाद मेरी क्लासेज भी शुरू हो गयी तो हम दोनो में तय हुआ कि सप्ताहिक दिनों में एक ही बाजी खेलेंगे और बची कसर सप्ताह के आखिरी दिन या छुट्टी के दिन निकालेंगे।
दिन बीतते गये हफ्ते महीने और साल बीत चले
मै स्नातक के लिए शहर आ गया पर शतरंज नही रूका
शब्बीर मास्साब से शतरंज में खूब सीखा और बाकायदा बासमय उसका प्रयोग भी किया और जीते भी 
कई टूर्नामेंटों में भाग लिया और जीतकर आये
लेकिन उन जीत, सीख और यादों के अलावा और सब वहीं पीछे छूट गया
वो नीम का पेड़, उमसभरी दुपहरी, हवा के झोंके और मेरा लड़कपन...........






रविवार, 21 जून 2026

आंसू

सिसकती रातों की मंजिल क्या है
लरजते आसुंओं से हासिल क्या है
जीते तो मिल ही जाती बादशाहत 
पर हार जाने पे मुकम्मल क्या है।।

थके तो हांफकर सो जाते जमीं पर
ओढ लेते इस दुनिया का सारा गम
बची है सांसे, अभी आजमा लेते हैं
हार उम्दा है तो फिर जाहिल क्या है।।

घबराने पे थाम लेना वो हाथ नाजुक 
फखत इक हिस्सा है उस कहानी का
जहां लबों तक न आ सकी हां उसकी
बड़ी हिम्मत से दांव था लगाया उसने।।

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शनिवार, 25 अप्रैल 2026

नारायन 'चा'

वृद्धाश्रम में सुबह की चाय पीते हुए शारदा बाबू नीम के पेड़ के नीचे वाले चबूतरे पर बैठ गये थे। सेवानिवृत्त होने के बाद धीरे धीरे यह तीसरा साल भी बीत चला पर बेटे बहू या पोते का चेहरा भी नही देख पाये थे। रिटायर होने के बाद उनके पास अमेरिका न जाकर वह सीधे यहां वृद्धाश्रम मे चले आये थे। पत्नी का स्वर्गवास हो चुका था और अपना गांव तो बरसों पहले छूट गया था। वहां बैठे बैठे सामने लाॅन मे घसियाली जमीन पर अनुलोम विलोम करते हुए अचानक सामने पेड पर एक बयां को अपना घोसला बुनते देखा तो उनकी यादें आज फिर ताजा हो गयीं। किस तरह आज से 40साल पहले वह अपने गांव से यहां शहर में अपनी किस्मत बनाने चले आये थे। गांव का वह पुराना खपरैल का घर उन्हें याद आ गया किस तरह उनके पिता स्व• जनार्दन बाबू उसे संभलवाते थे।
पूरा घर और घराडीं दूर तक फैला हुआ था। उसका दुआरा ही लगभग एक बीघा मे फैला था । सामने एक कुंआ था जिसमें से पूरा मुहल्ला पानी भरता था। घर का दुआरा सामने वाले रास्ते तक फैला था कई बार तो यह बारात रूकने के लिए भी पर्याप्त था। छोटी बारात वहीं रूक जाती थी लेकिन बारात का दरवाजे पर रूकना एक जिम्मेदारी भी होती थी। कही घराती के यहां से भिनही (सुबह) का चाय आने में देर हो गया तो अपने घर से 20-30 कप चाय झट से स्टोव पर बनवाकर भिजवा दिया जाता था। आखिर गांव की इज्जत खतरे में नही आना चाहिए।
और क्या यही तो होता है बडकवा होने का जिम्मेदारी भी। नही तो पश्चिम टोला में भी तो बहुत बडकवा लोग रहता था। बहुत पैसा वाला लेकिन क्या मजाल की गांव समाज के नाम पर एक ढेला तक खर्च कर दे।
लेकिन पिताजी बहुत इज्जतदार व्यक्ति थे वह अपने सौतेले भाई नारायन का भी बहुत जिम्मेदारी से ख्याल रखते थे। जबकि नारायन चाचा बहुत झक्की आदमी थे हम लोग उन्हें प्यार से 'नारायन चा' कहते थे । वह कई बार तो गांव में लोगों से झगडा तक कर लेते थे और प्राय: मार खाते खाते बचते थे । लोग केवल पिताजी का ख्याल और थोड़ा सा खौफ करके चुप रह जाते थे।
कई बार नारायन चा का ब्याह कराया गया लेकिन उनके झक्क के आगे कोई भी औरत उनके साथ टिक ही नही पायी और उन्हे छोड़कर भाग गयीं। इसका खामियाजा हुआ चाचा फिर से अकेले रह गये। इस अपमान और खीज में वे और भी ज्यादा चिड़चिड़े भी हो गये थे। वो मुझको बऊवा कहते थे। दुनिया में भगवान को कितना मानते थे पता नही लेकिन पिताजी के बाद यदि किसी की सुनते थे तो सिर्फ मेरी।
मिडिल की पढाई पूरी कर आगे पढने के लिए मुझे पटना जाना पडा था नारायन चा स्टेशन तक आये थे अपने ट्रेक्टर ट्राली से सामान लेकर। सब सामान उतरवाकर चुप पीछे खड़े थे बुशर्ट और पाजामा पहनकर। ट्रेन आने मे लेट था बार बार ट्रेक्टर देखने के बहाने थोड़ी थोड़ी देर में किनारे की तरफ जाते रहते थे सुर्ती का तलब जो लग जाता था। दरअसल पिताजी के सामने आज भी वह कोई अम्ल नही करते थे अपने बड़े भाई को ही अपना भगवान अपना देवता अपना राजा मानते थे।
गाड़ी में बैठते हुए मैने उनके चेहरे की ओर देखा था मैने उन्हें कभी ऐसा नही देखा था। 'नारायन चा' जैसे अब रो देंगे। मन किया उतरकर चाचा के गले से लग जाऊं लेकिन बेरवां छोटा स्टेशन था यहां ट्रेन कुछ ही मिनट के लिए रूकती थी मन मसोसकर मै वहीं से हाथ हिलाता रहा। थोडी देर में एक लंबी सीटी देकर ट्रेन चल पडी मै दूर तक खिड़की से उन्हें देखता रहा। पिताजी चाचा को वापस चलने के लिए कह रहें थे। शहर पहुंच कर मैने एक दो चिट्ठियां लिखी फिर पढाई और शहर के तामझाम में व्यस्त हो गया। दिन बीतने लगे दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनों में फिर बरस बीतने लगे । इस बीच मै कभी कभार घर जाता रहा परंतु वह भी दो या तीन दिनों के लिए । अबकी दीवाली मे घर गया तो पता चला कि चाचा की तबियत खराब है शायद सांस की बीमारी है दमा के लक्षण बतायें हैं डाक्टर ने।
मां ने पिता जी के सामने ही कहा था चाचा से दूर से बात करना सामने से नही दमा के कीटाणु लग जाते हैं। यह छूत की बीमारी है। चाचा का बर्तन बिना उन्हें बताये अलग कर दिया गया था। आखिर खान पान से ही तो छूत फैलता है। मै शाम को गांव से घूमकर आया तो देखा चाचा लकड़ी वाली कुर्सी पर अपनी लोई ओढ़कर बैठे हैं खांसी आने पर मुंह उसी में ढांपकर खांस लेते थे बोलते बोलते दम फूलने लगता था।
चाचा बडे मन से कभी कभी हमारे दादा जी की पुरानी बातें सुनाते थे जब बैठे बैठे उकता जाते थे तो पश्चिम टोला के धारी महतो के यहां हो आते थे। संयोगवश जिस दिन ऐसा होता था उनकी खांसी रात में बढ जाती थी और अम्मा बाबूजी धारी को मन भर गरियाते थे। धारी दंपत्ति चाचा के अभिन्न मित्र थे जब इन्हें सीजन में कहीं मजदूर नही मिलते थे तो भी चाचा के रहते हमारी फसल सबसे पहले कट जाती थी।
हर साल चाचा के हिस्से के गन्ने का कुछ पैसा या तो गायब हो जाता या चोरी हो जाता था। मां थोड़ा बहुत भुनभुनाती लेकिन पिताजी हंसकर टाल जाते थे। कई लोग पुलिस में शिकायत की बात करते थे लेकिन चाचा किस्मत और नसीब का कहकर हर बार बात टाल देते थे। अबकी बार चाचा की हालत बहुत नाजुक हो गयी थी उन्हें लेकर पिताजी को शहर में आना पड़ गांव के झोलाछाप डाक्टर इलाज नही कर पा रहे थे। उन्हें शहर में एक मेडिकल कॉलेज में भर्ती करा दिया गया उनकी देखभाल के लिए धारी का छोटा बेटा जी-जान से लगा था। लेकिन गांजे की लत और अकेलेपन के दुख ने चाचा की जीवन-शक्ति बिल्कुल क्षीण कर दी थी। डाक्टर ने मरीज का हाल देखकर आगे के इलाज की बजाय उन्हें घर ले जाने की सलाह दी थी। निराश मन से सभी उन्हें घर की ओर ले चले। वापस लाते समय गांव के बाहर काली माता मंदिर के पास सड़क पर नया नया भराव हुआ था।
जैसे ही ट्रेक्टर का पहिया हिचकोले खाता हुआ उस पर चढा कि एक जोर का झटका लगा और पूरी ट्राली उछल पडी थी। इस अफराा-तफरी मेें रोगी के प्राण विहग पिंजरे से आजाद हो गये। रोना पीटना मच गया। कुछ दिन बाद चाचा का क्रियाकर्म पूरा होने के बाद जब कई दिन बीत गये तो शाम को अकेले लकड़ी की कुर्सी पर बैठे पिताजी नें उन्हें याद करते हुए कहा कि अब नारायन के खेतों की विरासत करानी पड़ेगी। मैं समझ नही पाया था बहुत दिनों बाद पता चला चाचा के खेत के दो हिस्से लगे थे। एक में मेरा नाम लिखाया गया था ।
कहीं कहीं से सुनने में आता था धारी की चिलम में चाचा का हिस्सा भी था और धारी का छोटा बेटा शक्लो सूरत पर हूबहू नारायन चा पर गई थी।

शनिवार, 27 सितंबर 2025

घोड़े

                     शीर्षक - वफादार घोड़े:- 

🐎 आज के परिवेश मे राजनीतिक कार्यकर्ताओं की घोर निष्ठा और वफादारी अपनी स्वामिभक्ति के लिए विख्यात 'घोड़ों' को भी मात देती है। अपनी इच्छाओं को लज्जा और शर्म के आवरण मे समेटे एकनिष्ठ होकर अपने नायकों की सेवा करते इन कार्यकर्ताओं की इस वफादारी के बावजूद उन्हें प्राप्त क्या है ?
इसका आंकलन किये बगैर मै अपनी कविता आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूं, आशा करता हूं आपको पसंद आयेगी...............................................

घोड़े हां, हां ये घोड़े ही तो
करते हैं जंग की शुरुआत 
वर्ना राजाओं की फितरत
हंसते गलेमिल भूलने की है।01

घोड़े ही बैठे होते हैं तैयार
निज खूं बहाने को पागल
वर्ना इक राजा की दुश्मनी 
दिखी कभी किसी और से।02

ये दौड़ते है सरपट मैदां से
रौंदते है बेजा हरे भरे खेत
और मिटाते है खेत-खलिहां 
जो भरता है इनका भी पेट।03

आखिर मे जीतता है राजा
हारने पर हार जाते है घोड़े
जीत बनी राजा की खातिर 
चोटिल होने को बने हैं घोड़े।04

खुश होने पे पाते थोड़ी घास
गुस्से मे दमभर पाते हैं कोड़े
इनमें है वफादारी का सबब
आदत से ही मजबूर हैं घोड़े।05

भूल सहज कोड़ो के निशां
सारा बोझ सिर पे उठाते हैं
पूरी चोट देता हो सवार इन्हें 
उसे भी सिर पे ही बिठाते हैं।06

:- शशिवेंद्र 'शशि'
#Ssps96

रविवार, 24 अगस्त 2025

द्रोण पुस्तक के चतुर्थ सर्ग से

ये धृष्ट जयद्रथ खड़ा हुआ 
अपने दोषों से सजा हुआ 
थी कुटिल चाल दिखलाई
तेरे सुत की मौत करायी ।

सम्बंधी, नही क्षम्य है ये
आगंतुक नही गम्य है ये
इसको परिणाम दिखाना है
यमलोक इसे पहुंचाना है।

तो तान शरासन हे अर्जुन 
क्षत विक्षत इसे अभी कर दे
चल बान मार कर राक्षस को
इसके खूं से कुरूक्षेत्र रंग दे।

अभिमन्यु न सिर्फ भागिनेय मेरा
वो प्यारा शिष्य भी मेरा था।।
तु जनक तो हूं मैं उसका मामा
दो माताओं सम आंचल मेरा था।।


चक्रव्यूह रचा द्रोण ने जब
था कुटिल क्रुद्ध राजाओं से
उसमें कुंठा थी भरी इतनी 
क्या प्राप्त उसे विधवाओं से।।

यूं लिए हलाहल कुंठा का 
वो राज कुटुंब में बसता था
उसके के चरणों में शीश धरे
राज समाज सब रहता था।।

उसी राज कुमार का उसने
भीषण आखेट कराया है
शावक वधने की खातिर
गुरू का धर्म लजाया है।।।

एक वीर साधने में इनके
सब छक्के छूटे जाते हैं
खड़ग चलाते पीछे से
हितैषी तेरा बताते हैं।।

सब नियम ताख पर रख
उस बालक से लडे सात
इक के वश था नही वीर
कायरों की क्या ही बिसात।।

जिस घर का राजपुरोहित था
उस घर को वेध दिया उसने
सादर ही शीश जो झुकता था
झुकने पर काट लिया उसने।।

अब शीश कटेंगे कुरूओं के
संबंधी के या गुरूओं के
एक ही धर्म निभाना तुम
अरि का सर्वस्व मिटाना तुम।।

जी करता कालरूप धर लूं
पी जाऊं पाप धरा का सब
है क्षुब्ध चित्त मेरा इतना या
नरसिंह रूप धरूं क्या अब।।

शनिवार, 23 अगस्त 2025

महादेवी वर्मा को शब्दसुमन अर्पण !

महादेवी वर्मा को शब्दसुमन अर्पण!
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महादेवी वर्मा उस कलम सिद्ध साहित्यकार का नाम है जो बर्बरीक की भांति अपने एक ही रचना रूपी प्रहार से समकालीन साहित्य के तमाम दिग्गज साहित्यकारों का सादर अभिवादन करती और समान हैसियत के रचनाकारों के कंधे पर स्नेहपूर्ण भ्रातृसम हस्त रखती प्रतीत होती हैं।
उनकी रचना 'संस्मरण' दद्दा राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त से आरंभ होकर निराला, प्रेमचंद और सुंघनी साहू के तंग बनारस की गलियों से गुजरती पंत और सुभद्रा से सुखद चर्चा करती गुरूदेव रवीन्द्र के ऋषित्व को प्रणाम करती है, आगे बढ़कर राष्ट्रपिता बापू के स्मरण मे बाबू राजेंद्र प्रसाद की सादगी को श्रद्धा से स्पर्श करती पंडित नेहरू और राजर्षि टंडन तक अपनी स्मृतियों की गुल्लक का संचय दिखाती पूर्ण होती है।
गार्गी और अपाला जैसे भारतीय नारियों की दर्शन और साहित्य में सिद्धा परंपरा को आगे बढाती ऐसी विदुषी मनीषा की भावपूर्ण लेखनी को प्रणाम🙏

प्रतिज्ञा

इतिहास मे प्रतिज्ञा पर आधारित कई महान घटनायें हुई इन पर अनेकों रोचक वर्णन और कथायें आज भी मौजूद है। यहां तक की कई विद्वान 'भीष्म प्रतिज्ञा' को महाभारत जैसे भीषण युद्ध का परोक्ष आधार भी मानते हैं लेकिन प्रतिज्ञा का अर्थ महज वचनबद्ध होने मात्र से नही है वरन मन, कर्म और वचन से उस संकल्प को निभाने में हैं।
कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास 'प्रतिज्ञा' का नायक 'अमृतराय' अपने जीवन व्रत को आजीवन निभाने के लिए प्रतिबद्ध है जबकि इसमे वर्णित नायिकाओं ने साधारण परंतु अप्रतिम भारतीय नारी की झांकी प्रस्तुत की है। लाला अमृतराय अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद उसकी छोटी बहन 'प्रेमा' में नई जीवन संगिनी को देख ही रहे थे कि उन्हें इससे भी बडें एक लक्ष्य की दिशा मिल जाती है फिर वह एक संन्यासी की भांति सारा सुख और वैभव छोड़कर उस लक्ष्य के ही होकर रह जाते हैं। इस दौरान उन्हें कितने झंझावात यहां तक कि अपने लंगोटिया यार दाननाथ से भी भयंकर विरोध झेलना पड़ता है, ससुराल वालों की उपेक्षा और ताने सुनने पडते हैं लेकिन वो अपने संकल्प से टस से मस नही होते। कमलाप्रसाद आधुनिकता की चाशनी में लिपटा एक विषैला करेला है जो ढकोसलेबाजी में नंबर वन है और नैतिकता और आदर्श से कोंसो दूर किन्तु अपनी पत्नी सुमित्रा के ताने और उलाहनों से पीड़ित उसका मन अंतत: हारकर सुमित्रा की ही शरण लेता है। 
मुंशी प्रेमचंद जैसा कालजयी कथाकार अपने शब्दों से एक ऐसी श्रृंखला तैयार करता है जिसकी एक एक कड़ी को पकड़ता हुआ पाठक अपनी उत्सुकता के गहरे समुद्र को पार कर लेता है उदाहरणत:----

पृथ्वी ने श्यामवेष धारण कर लिया और बजरा लहरों पर थिरकता हुआ चला जाता था। उसी बारे की भांति अमृतराय का हृदय भी आंदोलित हो रहा था, दाननाथ ने निस्पंद बैठे हुए थे, मानो वज्राहत हो गये हों। सहसा उन्होने कहा-- भैया तुमने मुझे धोखा दिया।

रविवार, 29 दिसंबर 2024

फिसलता वक्त ⏳️

अब तक बड़ी शिद्दत से जी है जिंदगी
खुदा से इतर करी न किसी की बंदगी
आयेगी मौत तो न झुकेंगी मेरी नजरें
शुक्र है जो न की हसीनों से दिल्लगी।।१


झूठ के मुंह पर हमेशा उसे झूठ कहा
वक्त बदला तो दौर अब अपना न रहा
हम तो नजाकत में पले थे बचपन से
बदलते मौसम के थपेड़े कभी न सहा।।२

इल्म हुआ बेशक इन थपेड़ो की चोट से
सुरखुरु करने का ये कुदरती अंदाज है
शुक्रिया कहने को अब रहता ही कौन
खत्म हो तमाशा तो क्या शाकीन बचते हैं?३

गिरते गिरते भी संभल पाने का हुनर
डूबने पे तैरकर निकल जाने का हुनर
समो लेना समंदर का तूफां आगोश में
मुफलिसी से सीखा हमने अजीम हुनर।।४

हमने डंसते आस्तीनो का सांप देखा है
गोया जीत चुके बाजी की मात देखा है
देखा, दूसरों के जज्बात ठुकराते लोग
गैर की आफत मे कहकहे लगाते लोग।।५

अपना जुगनू तो दम भर उछालते हैं
दूजे का हो आफ़ताब खाक बताते हैं
सब्र औ सुकुं बचा ही कहां दुनिया में
मशविरा देकर यहां माल कमा जाते हैं।।६

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रविवार, 15 दिसंबर 2024

पकड़ी का पेड़:- धरोहर

 


मेरे गांव मे एक पुराना 'पकड़ी' का पेड़ है जो हमारी कई पीढियों से यूं ही अडिग अचल खड़ा है। वो मेरे गांव के पश्चिमी छोर पर मौन खड़ा सैकड़ो पंक्षियों का बसेरा है। छोटे बड़े किसान अपनी फसल की मड़ाई करते हैं वहां उसने देखा है अनगिनत बदलती हुई ऋतुएं, बदलते हुए मुख्तार और अप्रतिम भाईचारा ।

उसने देखा है 'कर्बला के मेले' में ताजिए के पास ढोलक बजाता संदीप, जलेबी बनाते पुजारी, सब्जी बेचते रामकिशुन और कागज के बनावटी घोड़े को नचाते जवाहर और भी ऐसे अनेकों लोग जो शायद अखबार नही पढ़ते इसीलिए बराबर शरीक होते है एक दूसरे के दुख सुख में उनके तीज त्यौहार में। पर एक दिन जब पूरी हो जाएगी उसकी उम्र तो वो भी चला जाएगा अपने साथियों की तरह, सूख जायेंगी उसकी डालियाँ रह जाएगा शेष कि उस 'पकड़ी के पेड़ ने एक युग एक पूरा युग जिया सिर तानकर, कमर पर हाथ रखकर ...........

सारे पुराने पेड़ सूखे और मिट भी गये हैं
नये दरख्तों की बदली बदली सी छांव है
खतम हुए पंच पंचायते थी जिनके जिम्मे
अब पहले सरीखा न रहा मेरा गांव है।

अंधेरे मे खड़ा अपनी कमर पर हाथ रख
पुरानी पकड़ी का पेड़ वैसे ही अकड़ता है
दूर दूर फैली शोहरत थी मेरे गांव की बड़ी 
शायद इसी गुमां ने उसे रोक कर रखा है।

परिन्दों के आशियाने उसकी शाखों पे हैं
ये बोझ शायद उसे थक कर जाने न देता
गटठर लिए किसान सुस्ताते छांव में यहां
ये हौसला उसे विदा कर सूखने न देता हो

डरता हूं उसके साथ के सैकड़ो पीपल और नीम 
छोड़ कर चले गये वजूद अपना यादें ही बच रही
इसकी शाखें उन परिन्दों का आखरी सहारा हैं
पर मिट जायेगी इकदिन मेरे गांव की ये धरोहर।।



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रविवार, 8 दिसंबर 2024

'द्रोण' पुस्तक के अंश का संकलन, एक कविता के रूप मे


यह कविता मेरी पुस्तक द्रोण के अंश का संकलन है। यह संकलन मैंने बांग्लादेश मे हो रहे हिन्दू नरसंहार के विरुद्ध रोष वश लिखा है

पांडवों की थी पीड़ा दैनिक 
मरते थे दस सहस्त्र सैनिक
भीषण पर्वत कब हारेगा 
बढ़ कौन समय को मारेगा ।।1

गंभीर विषय ये देख हरि 
थे विवश बड़े ये सोच हरि 
न कहिं बची कोई युक्ति शेष 
यही चिंता हरि की थी विशेष।।2

विधि लेखन क्या गलत होगा
या इसमे परिवर्तन होगा 
सब जान मंद मुस्काते हैं 
हरि इसका आनंद उठाते हैं ।।7

अर्जुन लहराता क्यूँ गैरों पर
कायर बन फिरता अपनों पर
जब सारी हुयी युक्ति असफल
समझाने की हर आस विफल।।16

क्षण छोड़ सारथी की पदवी
और दिया सुदर्शन तान वही
रथ छोड़ा और अश्व छोड़े 
प्रभु भीष्म का वध करने दौड़े।।29

एक कवि कूटनीति ना समझाता हो पर उसे लेखन और दर्द, पुकार, चीत्कार और प्रेम ज्यादा समझ आता है 
#bangladesh 

चिरैयादह का मलेर

चिरैयादह वर्तमान पंजाब और हरियाणा की सीमा से लगी एक स्वतंत्र रियासत थी। यह मलेर राजपूतों की राजधानी थी। किंवदन्ती है कि एक मलेर दस दिलेर के ...