सिर झुकाये बोर्ड को निहारते मैं चाल चलने में मशगूल था कि अचानक एक आवाज गूंजी "का हो अकेले खेलत हव, आव एक बाजी हो जा"
मैने सिर उठाया तो देखा एकदम सफेद लकलकवा कुर्ता पाजामा पहने एक शख्स बढ़ी दाढी और आंखो पर मोटी फ्रेम का चश्मा लगाये आकर खाट पर बैठ गये। मैने रास्ते मे आते जाते तो देखा था लेकिन नाम और कोई फार्मल परिचय कभी नही हो सका था फिर मै खुद को इस खेल का एक शानदार खिलाड़ी मानता था।
ऐसे कैसे कोई चुनौती दे और मै स्वीकार ना करूं हो ही नही सकता था, फिर क्या मैने भी यह आमंत्रण स्वीकार कर लिया। खेल शुरू हो गया, धीरे धीरे जैसे जैसे खेल आगे बढा मुझे समझ आने लगा मेरा प्रतिद्वंदी कोई साधारण खिलाड़ी नही है।
पर हमने भी आम के पेड़ों के साये में घास और पुआल पर बैठकर शतरंज खेला था
बड़ी सख्त जान थे
आखिरी में जब मुकाबला बराबरी पर छूटा तो जनाब बोले "कल फिर खेलते हैं"
फिर क्या था
अब जो सिलसिला शुरू हुआ तो सुबह 9 बजे हम दोनो बैठते तो शाम के अंधेरे तक बात खत्म नही हो पाती फिर कल का वायदा
यूं जैसे प्रेमचंद की रचना 'शतरंज के खिलाड़ी' जीवंत हो उठी हो,
बैठने को हरी नीम की कोमल छाया, उसकी मंद मंद बहती हवा और खाने पीने की तो सुध नही बस एक बाजी फंस जाये तो कुछ घंटे गुजर जाते और कभी कभी तो एक ही बाजी पूरा पूरा दिन बिता देती थी।
दिन गुजरने लगे और मैने कई दांव और नये तजुर्बे सीखे
शतरंज में ऊंट से खेलना मेरा पसंदीदा शगल था और ऊंट से चाल फंसानी भी मैने यहीं सीखा था
यही सीखा मैने पिद्दी (सिपाही) की जाफरानी 'चाल'
👑 उलझन को उलझाना और सबसे बढकर सामने वाले का हावभाव देखकर खेल और खिलाड़ी का अनुमान लगाना।
धीरे धीरे और खिलाड़ी जुडने लगे
जगह और खाट कम पडती
फिर कुछ दिनों बाद मेरी क्लासेज भी शुरू हो गयी तो हम दोनो में तय हुआ कि सप्ताहिक दिनों में एक ही बाजी खेलेंगे और बची कसर सप्ताह के आखिरी दिन या छुट्टी के दिन निकालेंगे।
दिन बीतते गये हफ्ते महीने और साल बीत चले
मै स्नातक के लिए शहर आ गया पर शतरंज नही रूका
शब्बीर मास्साब से शतरंज में खूब सीखा और बाकायदा बासमय उसका प्रयोग भी किया और जीते भी
कई टूर्नामेंटों में भाग लिया और जीतकर आये
वो नीम का पेड़, उमसभरी दुपहरी, हवा के झोंके और मेरा लड़कपन...........