गुरुवार, 27 अगस्त 2026

विरला संयोग

सुबह के मद्धम शोरगुल मे 'गोरखधाम सुपरफास्ट एक्सप्रेस' जैसे ही सरयू नदी के चौका घाट से आगे बढती है डिब्बे मे एक बुलंद आवाज गूंजती है

दीन दयाल विरिदु सम भारी
हरहू नाथ ममं संकट भारी

गेरूआ वस्त्र पहने हुए भरे पूरे शरीर वाले एक सूर लाठी की टेक लगाये चले आते हैं
धीरे धीरे आगे बढते हुए
किसी ने हाथ पकड़कर एक सिक्का दे दिया और किसी ने मुंह फेर लिया लेकिन वो बिना विचलित हुए चले जाते हैं
मै 12-15 वर्षो से यह संयोग देख रहा हूं

वही गाड़ी
वही गायक
वही मै
वही सरयू
वही चौपाई

बडा ही विरला संयोग है ।
मै हर बार इसमें अपना 10 रूपीय योगदान कर इस संयोग पर अचंभित रह जाता हूं

शनिवार, 22 अगस्त 2026

23rd August 2026

काँटा कठोर है तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है ।।।
मै कब कहता वो घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने।
परिश्रमी लोगों की असफ़लता पर धीरज बढाती ये पंक्तियां प्रेरणा का वो गीत है जो झुके हुए कंधों और शीश को पुन: प्रयास के लिए तैयार कर देती हैं.....

मंगलवार, 18 अगस्त 2026

मेरी शतरंज यात्रा

1996 रहा होगा शायद, मेरा दाखिला 9वीं कक्षा में होना था इसलिए मै अपने ननिहाल आ गया था। गर्मियों की छुट्टियां और दिन की दुपहरी साथ ही दोस्तों का न होना, सही मायने में नये दोस्त बनाने का अभी समय ही नही मिला था। सो हिन्दी की कहानियां पढते दिन कट रहे थे। लेकिन शतरंज का शौक हिलोंरे ले रहा था, कहाँ तो 5-6 घंटे दिन में खेल जाते थे यहा तो कोई मिल ही नही रहा। सो मैने अकेले खेलने का हुनर विकसित किया और एक दिन मैं अकेला दरवाजे पर छोटे वाले नीम के पेड के नीचे शतरंज लगाये खेल रहा था।

सिर झुकाये बोर्ड को निहारते मैं चाल चलने में मशगूल था कि अचानक एक आवाज गूंजी "का हो अकेले खेलत हव, आव एक बाजी हो जा"
मैने सिर उठाया तो देखा एकदम सफेद लकलकवा कुर्ता पाजामा पहने एक शख्स बढ़ी दाढी और आंखो पर मोटी फ्रेम का चश्मा लगाये आकर खाट पर बैठ गये। मैने रास्ते मे आते जाते तो देखा था लेकिन नाम और कोई फार्मल परिचय कभी नही हो सका था फिर मै खुद को इस खेल का एक शानदार खिलाड़ी मानता था। 
ऐसे कैसे कोई चुनौती दे और मै स्वीकार ना करूं हो ही नही सकता था, फिर क्या मैने भी यह आमंत्रण स्वीकार कर लिया। खेल शुरू हो गया, धीरे धीरे जैसे जैसे खेल आगे बढा मुझे समझ आने लगा मेरा प्रतिद्वंदी कोई साधारण खिलाड़ी नही है।
पर हमने भी आम के पेड़ों के साये में घास और पुआल पर बैठकर शतरंज खेला था 
बड़ी सख्त जान थे
आखिरी में जब मुकाबला बराबरी पर छूटा तो जनाब बोले "कल फिर खेलते हैं"
फिर क्या था
अब जो सिलसिला शुरू हुआ तो सुबह 9 बजे हम दोनो बैठते तो शाम के अंधेरे तक बात खत्म नही हो पाती फिर कल का वायदा
यूं जैसे प्रेमचंद की रचना 'शतरंज के खिलाड़ी' जीवंत हो उठी हो,
बैठने को हरी नीम की कोमल छाया, उसकी मंद मंद बहती हवा और खाने पीने की तो सुध नही बस एक बाजी फंस जाये तो कुछ घंटे गुजर जाते और कभी कभी तो एक ही बाजी पूरा पूरा दिन बिता देती थी।
दिन गुजरने लगे और मैने कई दांव और नये तजुर्बे सीखे
शतरंज में ऊंट से खेलना मेरा पसंदीदा शगल था और ऊंट से चाल फंसानी भी मैने यहीं सीखा था
यही सीखा मैने पिद्दी (सिपाही) की जाफरानी 'चाल'
👑 उलझन को उलझाना और सबसे बढकर सामने वाले का हावभाव देखकर खेल और खिलाड़ी का अनुमान लगाना।
धीरे धीरे और खिलाड़ी जुडने लगे 
जगह और खाट कम पडती 
फिर कुछ दिनों बाद मेरी क्लासेज भी शुरू हो गयी तो हम दोनो में तय हुआ कि सप्ताहिक दिनों में एक ही बाजी खेलेंगे और बची कसर सप्ताह के आखिरी दिन या छुट्टी के दिन निकालेंगे।
दिन बीतते गये हफ्ते महीने और साल बीत चले
मै स्नातक के लिए शहर आ गया पर शतरंज नही रूका
शब्बीर मास्साब से शतरंज में खूब सीखा और बाकायदा बासमय उसका प्रयोग भी किया और जीते भी 
कई टूर्नामेंटों में भाग लिया और जीतकर आये
लेकिन उन जीत, सीख और यादों के अलावा और सब वहीं पीछे छूट गया
वो नीम का पेड़, उमसभरी दुपहरी, हवा के झोंके और मेरा लड़कपन...........






बेटी

क्या ये वक्त है बदला, क्या हालात बदले हैं क्या तासीर बदली है खूब जज्बात बदले हैं स्टोव की ज़द में पहले होती थी बस बहुएं अब सास ससुर भी नीले ...