सोमवार, 28 सितंबर 2026

बेटी

क्या ये वक्त है बदला, क्या हालात बदले हैं
क्या तासीर बदली है खूब जज्बात बदले हैं
स्टोव की ज़द में पहले होती थी बस बहुएं
अब सास ससुर भी नीले ड्रम के खतरे है।।
बडा खानदान है उसका जो बेटी देता है तुम्हे
अपने से बडा समझे है तो बेटी देता है तुम्हें 
तुम यूं बेमुरूव्वत जी रहे घर की दहलीज मे
उसकी सिसकियों का सैलाब जला न दे तुम्हें ।।
खाली हाथ आया भाई तो आंख भर आयी
जो कुछ छिपाया था हथेली पर रख आयी
गुल्लक में छिपा दिये शौहर के चांटे सारे
वह भाई से मिली भी तो मुस्करा कर आयी।।
जमीं पे गिरे आंसू वो अब तेजाब हो गये
सिसकियां जो बदलीं तो अजाब हो गये
दहलीज में बैठे गिने वो चांदी के सिक्के
बेटी की ससुराल वाले बेनकाब हो गये।।

बाग से फूल हटाओगे तो माली क्या ही करेगा
हंसी चिड़िया मिटाओगे तो जंगल क्या ही करेगा
जिसकी मुस्कराहट पर सारी उम्र जिया उसने
उसकी गुड़िया जलाओगे तो बाप क्या ही करेगा।।


आंगन की गौरैया बचायी जालिम जमाने से
और तुम्हें सौंपी हो बड़ी मिन्नत से, मनाने से
वो भूचाल थाम कर  पी लेगा समंदर सारा 
खता न करना, बचना उसे आजमाने से।।
जख्म देना गर उसे तो बस बेपरवाह ना होना
ख्याल रखना उसका कभी लापरवाह न होना
बेटियां सबसे अजीम चीज होती हैं बाप की
जिंदा हो बाप तो बेटी रूलाकर चैन से न सोना।।

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शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

मुहावरेदार:- बंदर 🐒 क्या जाने अदरक का स्वाद

मुहावरेदार:- बंदर 🐒 क्या जाने अदरक का स्वाद

शुक्रवार की बाजार मे थैले और जेब का भरसक संतुलन बनाने का प्रयास करते हुए मैं अगली खरीदारी को बढा ही था कि श्रीमती जी का फोन आ गया
मैने एक ही झटके मे सब बता दिया जो खरीद चुका था और जो खरीदने वाला था ।
वो दूर दराज किसी कस्बे के दबंग थानेदार की तरह पूछती रही मै एक सीधे साधे ग्रामीण की तरह सकपकाता जवाब देता चला गया।
सब ठीक चल रहा था अचानक उसे अदरक का ध्यान आ गया
बोली तीन बार से अदरक नही ला रहे हो
मैने भी तपाक से जवाब दिया, ले लिया है, बताना भूल गया
काल काटकर मै अदरक वाले को ढूंढता आगे बढा वह कोने मे खडा था उसकी रेहडी पर बहुत कम भीड़ थी।
मैने जब दाम पूछा तो पता चला 400रू प्रति किलो
थकहार कर मुझे 100ग्राम खरीदना ही पडा
फिर वापस लौटते हुए अदरक मेरे दिमाग में कौंधने लगा

"बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद"

अक्सर घरों मुहल्लों चौक चौबारे और सामान्य बोलचाल में यह तंजपूर्ण मुहावरा चिपका दिया जाता है।

अदरक 🫚 जिसे संस्कृत में शुष्ठी भी कहते हैं। यह एक औषधीय पौधा है जिसका वानस्पतिक नाम जिंजिबर ऑफ़िसिनेल है और यह हमारे दक्षिण एशिया की देशीय उपज है लेकिन यह स्वभाव से अति कडवा और गर्म होता है। इसके गुण दोष का मूल्यांकन करें तो कहीं भी यह नही लगता कि यह किसी को पारितोषिक के तौर पर दिया जा सके।
हां यदि किसी से मित्रता बढानी हो तो उस खांसते या सिसकते व्यक्ति को मस्त अदरक की चाय पर आमंत्रित किया जा सकता है।
इसके अलावा पुराने टाइम मे जब कोका कोला पेप्सी जैसे ठंडे पेय पदार्थ नही थे तो हमसे जस्ट पहले वाली पीढी शायद कालेज कैंटीन मे अपनी महिला मित्र को जरूर अदरक की चाय ही पिला कर प्रपोज❤️ करती रही होगी।
केरोसीन वाले स्टोव पर तपते पतीले में उबलती चाय और उसमे कूट कूटकर डाली गयी अदरक उसके स्वाद को और तीक्ष्ण कर देती है। यह तीक्ष्णता हृदय की गहराईयों में उतरते हुए किसी का हाथ थामने को मजबूर कर देती होगी
और शायद यही वो पल है जब इजहार कर दिया जाता रहा होगा खैर
इसके अलावा अदरक का घरेलु उपयोग भी है जिसमें उसकी कतरनें उदर के रोगी को नमक से खिलायी जाती हैं तथा कच्चे अदरक की चटनी जो सिल बट्टे पर पिसी हुई मिल जाये तो बस अह हा हा.....भोजन करने वाले का मन तृप्त हो जाये।

फिलहाल बंदरों को तो न चाय बनानी आती है न ही वो सिल बट्टे का प्रयोग करना जानते हैं फिर उसे अदरक थमाने का क्या प्रयोजन रहा होगा।

जरूर मुहावरा बनाने वाले का बंदरों से कोई बैर रहा होगा तभी तो उसे अदरक जैसी कीमती चीज थमा कर व्यंग्य किया जाता है..........
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गुरुवार, 3 सितंबर 2026

जन्माष्टमी विशेष

सुबह-सुबह जैसे ही नींद खुली तो "ठाकुर जी" का बडा सलोना सा एक चित्र मेज पर रखा था


कैसी मनोहर तस्वीर है
माथे पर चंदन लगा हुआ है
जैसे किसी ने "Happy Birthday" वाला टीका माथे पर लगा दिया हो❤️🫡🙏

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गुरुवार, 27 अगस्त 2026

विरला संयोग

सुबह के मद्धम शोरगुल मे 'गोरखधाम सुपरफास्ट एक्सप्रेस' जैसे ही सरयू नदी के चौका घाट से आगे बढती है डिब्बे मे एक बुलंद आवाज गूंजती है

दीन दयाल विरिदु सम भारी
हरहू नाथ ममं संकट भारी

गेरूआ वस्त्र पहने हुए भरे पूरे शरीर वाले एक सूर लाठी की टेक लगाये चले आते हैं
धीरे धीरे आगे बढते हुए
किसी ने हाथ पकड़कर एक सिक्का दे दिया और किसी ने मुंह फेर लिया लेकिन वो बिना विचलित हुए चले जाते हैं
मै 12-15 वर्षो से यह संयोग देख रहा हूं

वही गाड़ी
वही गायक
वही मै
वही सरयू
वही चौपाई

बडा ही विरला संयोग है ।
मै हर बार इसमें अपना 10 रूपीय योगदान कर इस संयोग पर अचंभित रह जाता हूं

शनिवार, 22 अगस्त 2026

23rd August 2026

काँटा कठोर है तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है ।।।
मै कब कहता वो घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने।
परिश्रमी लोगों की असफ़लता पर धीरज बढाती ये पंक्तियां प्रेरणा का वो गीत है जो झुके हुए कंधों और शीश को पुन: प्रयास के लिए तैयार कर देती हैं.....

मंगलवार, 18 अगस्त 2026

मेरी शतरंज यात्रा

1996 रहा होगा शायद, मेरा दाखिला 9वीं कक्षा में होना था इसलिए मै अपने ननिहाल आ गया था। गर्मियों की छुट्टियां और दिन की दुपहरी साथ ही दोस्तों का न होना, सही मायने में नये दोस्त बनाने का अभी समय ही नही मिला था। सो हिन्दी की कहानियां पढते दिन कट रहे थे। लेकिन शतरंज का शौक हिलोंरे ले रहा था, कहाँ तो 5-6 घंटे दिन में खेल जाते थे यहा तो कोई मिल ही नही रहा। सो मैने अकेले खेलने का हुनर विकसित किया और एक दिन मैं अकेला दरवाजे पर छोटे वाले नीम के पेड के नीचे शतरंज लगाये खेल रहा था।

सिर झुकाये बोर्ड को निहारते मैं चाल चलने में मशगूल था कि अचानक एक आवाज गूंजी "का हो अकेले खेलत हव, आव एक बाजी हो जा"
मैने सिर उठाया तो देखा एकदम सफेद लकलकवा कुर्ता पाजामा पहने एक शख्स बढ़ी दाढी और आंखो पर मोटी फ्रेम का चश्मा लगाये आकर खाट पर बैठ गये। मैने रास्ते मे आते जाते तो देखा था लेकिन नाम और कोई फार्मल परिचय कभी नही हो सका था फिर मै खुद को इस खेल का एक शानदार खिलाड़ी मानता था। 
ऐसे कैसे कोई चुनौती दे और मै स्वीकार ना करूं हो ही नही सकता था, फिर क्या मैने भी यह आमंत्रण स्वीकार कर लिया। खेल शुरू हो गया, धीरे धीरे जैसे जैसे खेल आगे बढा मुझे समझ आने लगा मेरा प्रतिद्वंदी कोई साधारण खिलाड़ी नही है।
पर हमने भी आम के पेड़ों के साये में घास और पुआल पर बैठकर शतरंज खेला था 
बड़ी सख्त जान थे
आखिरी में जब मुकाबला बराबरी पर छूटा तो जनाब बोले "कल फिर खेलते हैं"
फिर क्या था
अब जो सिलसिला शुरू हुआ तो सुबह 9 बजे हम दोनो बैठते तो शाम के अंधेरे तक बात खत्म नही हो पाती फिर कल का वायदा
यूं जैसे प्रेमचंद की रचना 'शतरंज के खिलाड़ी' जीवंत हो उठी हो,
बैठने को हरी नीम की कोमल छाया, उसकी मंद मंद बहती हवा और खाने पीने की तो सुध नही बस एक बाजी फंस जाये तो कुछ घंटे गुजर जाते और कभी कभी तो एक ही बाजी पूरा पूरा दिन बिता देती थी।
दिन गुजरने लगे और मैने कई दांव और नये तजुर्बे सीखे
शतरंज में ऊंट से खेलना मेरा पसंदीदा शगल था और ऊंट से चाल फंसानी भी मैने यहीं सीखा था
यही सीखा मैने पिद्दी (सिपाही) की जाफरानी 'चाल'
👑 उलझन को उलझाना और सबसे बढकर सामने वाले का हावभाव देखकर खेल और खिलाड़ी का अनुमान लगाना।
धीरे धीरे और खिलाड़ी जुडने लगे 
जगह और खाट कम पडती 
फिर कुछ दिनों बाद मेरी क्लासेज भी शुरू हो गयी तो हम दोनो में तय हुआ कि सप्ताहिक दिनों में एक ही बाजी खेलेंगे और बची कसर सप्ताह के आखिरी दिन या छुट्टी के दिन निकालेंगे।
दिन बीतते गये हफ्ते महीने और साल बीत चले
मै स्नातक के लिए शहर आ गया पर शतरंज नही रूका
शब्बीर मास्साब से शतरंज में खूब सीखा और बाकायदा बासमय उसका प्रयोग भी किया और जीते भी 
कई टूर्नामेंटों में भाग लिया और जीतकर आये
लेकिन उन जीत, सीख और यादों के अलावा और सब वहीं पीछे छूट गया
वो नीम का पेड़, उमसभरी दुपहरी, हवा के झोंके और मेरा लड़कपन...........






रविवार, 21 जून 2026

आंसू

सिसकती रातों की मंजिल क्या है
लरजते आसुंओं से हासिल क्या है
जीते तो मिल ही जाती बादशाहत 
पर हार जाने पे मुकम्मल क्या है।।

थके तो हांफकर सो जाते जमीं पर
ओढ लेते इस दुनिया का सारा गम
बची है सांसे, अभी आजमा लेते हैं
हार उम्दा है तो फिर जाहिल क्या है।।

घबराने पे थाम लेना वो हाथ नाजुक 
फखत इक हिस्सा है उस कहानी का
जहां लबों तक न आ सकी हां उसकी
बड़ी हिम्मत से दांव था लगाया उसने।।

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बेटी

क्या ये वक्त है बदला, क्या हालात बदले हैं क्या तासीर बदली है खूब जज्बात बदले हैं स्टोव की ज़द में पहले होती थी बस बहुएं अब सास ससुर भी नीले ...