शनिवार, 25 अप्रैल 2026

नारायन 'चा'

वृद्धाश्रम में सुबह की चाय पीते हुए शारदा बाबू नीम के पेड़ के नीचे वाले चबूतरे पर बैठ गये थे। सेवानिवृत्त होने के बाद धीरे धीरे यह तीसरा साल भी बीत चला पर बेटे बहू या पोते का चेहरा भी नही देख पाये थे। रिटायर होने के बाद उनके पास अमेरिका न जाकर वह सीधे यहां वृद्धाश्रम मे चले आये थे। पत्नी का स्वर्गवास हो चुका था और अपना गांव तो बरसों पहले छूट गया था। वहां बैठे बैठे सामने लाॅन मे घसियाली जमीन पर अनुलोम विलोम करते हुए अचानक सामने पेड पर एक बयां को अपना घोसला बुनते देखा तो उनकी यादें आज फिर ताजा हो गयीं। किस तरह आज से 40साल पहले वह अपने गांव से यहां शहर में अपनी किस्मत बनाने चले आये थे। गांव का वह पुराना खपरैल का घर उन्हें याद आ गया किस तरह उनके पिता स्व• जनार्दन बाबू उसे संभलवाते थे।
पूरा घर और घराडीं दूर तक फैला हुआ था। उसका दुआरा ही लगभग एक बीघा मे फैला था । सामने एक कुंआ था जिसमें से पूरा मुहल्ला पानी भरता था। घर का दुआरा सामने वाले रास्ते तक फैला था कई बार तो यह बारात रूकने के लिए भी पर्याप्त था। छोटी बारात वहीं रूक जाती थी लेकिन बारात का दरवाजे पर रूकना एक जिम्मेदारी भी होती थी। कही घराती के यहां से भिनही (सुबह) का चाय आने में देर हो गया तो अपने घर से 20-30 कप चाय झट से स्टोव पर बनवाकर भिजवा दिया जाता था। आखिर गांव की इज्जत खतरे में नही आना चाहिए।
और क्या यही तो होता है बडकवा होने का जिम्मेदारी भी। नही तो पश्चिम टोला में भी तो बहुत बडकवा लोग रहता था। बहुत पैसा वाला लेकिन क्या मजाल की गांव समाज के नाम पर एक ढेला तक खर्च कर दे।
लेकिन पिताजी बहुत इज्जतदार व्यक्ति थे वह अपने सौतेले भाई नारायन का भी बहुत जिम्मेदारी से ख्याल रखते थे। जबकि नारायन चाचा बहुत झक्की आदमी थे हम लोग उन्हें प्यार से 'नारायन चा' कहते थे । वह कई बार तो गांव में लोगों से झगडा तक कर लेते थे और प्राय: मार खाते खाते बचते थे । लोग केवल पिताजी का ख्याल और थोड़ा सा खौफ करके चुप रह जाते थे।
कई बार नारायन चा का ब्याह कराया गया लेकिन उनके झक्क के आगे कोई भी औरत उनके साथ टिक ही नही पायी और उन्हे छोड़कर भाग गयीं। इसका खामियाजा हुआ चाचा फिर से अकेले रह गये। इस अपमान और खीज में वे और भी ज्यादा चिड़चिड़े भी हो गये थे। वो मुझको बऊवा कहते थे। दुनिया में भगवान को कितना मानते थे पता नही लेकिन पिताजी के बाद यदि किसी की सुनते थे तो सिर्फ मेरी।
मिडिल की पढाई पूरी कर आगे पढने के लिए मुझे पटना जाना पडा था नारायन चा स्टेशन तक आये थे अपने ट्रेक्टर ट्राली से सामान लेकर। सब सामान उतरवाकर चुप पीछे खड़े थे बुशर्ट और पाजामा पहनकर। ट्रेन आने मे लेट था बार बार ट्रेक्टर देखने के बहाने थोड़ी थोड़ी देर में किनारे की तरफ जाते रहते थे सुर्ती का तलब जो लग जाता था। दरअसल पिताजी के सामने आज भी वह कोई अम्ल नही करते थे अपने बड़े भाई को ही अपना भगवान अपना देवता अपना राजा मानते थे।
गाड़ी में बैठते हुए मैने उनके चेहरे की ओर देखा था मैने उन्हें कभी ऐसा नही देखा था। 'नारायन चा' जैसे अब रो देंगे। मन किया उतरकर चाचा के गले से लग जाऊं लेकिन बेरवां छोटा स्टेशन था यहां ट्रेन कुछ ही मिनट के लिए रूकती थी मन मसोसकर मै वहीं से हाथ हिलाता रहा। थोडी देर में एक लंबी सीटी देकर ट्रेन चल पडी मै दूर तक खिड़की से उन्हें देखता रहा। पिताजी चाचा को वापस चलने के लिए कह रहें थे। शहर पहुंच कर मैने एक दो चिट्ठियां लिखी फिर पढाई और शहर के तामझाम में व्यस्त हो गया। दिन बीतने लगे दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनों में फिर बरस बीतने लगे । इस बीच मै कभी कभार घर जाता रहा परंतु वह भी दो या तीन दिनों के लिए । अबकी दीवाली मे घर गया तो पता चला कि चाचा की तबियत खराब है शायद सांस की बीमारी है दमा के लक्षण बतायें हैं डाक्टर ने।
मां ने पिता जी के सामने ही कहा था चाचा से दूर से बात करना सामने से नही दमा के कीटाणु लग जाते हैं। यह छूत की बीमारी है। चाचा का बर्तन बिना उन्हें बताये अलग कर दिया गया था। आखिर खान पान से ही तो छूत फैलता है। मै शाम को गांव से घूमकर आया तो देखा चाचा लकड़ी वाली कुर्सी पर अपनी लोई ओढ़कर बैठे हैं खांसी आने पर मुंह उसी में ढांपकर खांस लेते थे बोलते बोलते दम फूलने लगता था।
चाचा बडे मन से कभी कभी हमारे दादा जी की पुरानी बातें सुनाते थे जब बैठे बैठे उकता जाते थे तो पश्चिम टोला के धारी महतो के यहां हो आते थे। संयोगवश जिस दिन ऐसा होता था उनकी खांसी रात में बढ जाती थी और अम्मा बाबूजी धारी को मन भर गरियाते थे। धारी दंपत्ति चाचा के अभिन्न मित्र थे जब इन्हें सीजन में कहीं मजदूर नही मिलते थे तो भी चाचा के रहते हमारी फसल सबसे पहले कट जाती थी।
हर साल चाचा के हिस्से के गन्ने का कुछ पैसा या तो गायब हो जाता या चोरी हो जाता था। मां थोड़ा बहुत भुनभुनाती लेकिन पिताजी हंसकर टाल जाते थे। कई लोग पुलिस में शिकायत की बात करते थे लेकिन चाचा किस्मत और नसीब का कहकर हर बार बात टाल देते थे। अबकी बार चाचा की हालत बहुत नाजुक हो गयी थी उन्हें लेकर पिताजी को शहर में आना पड़ गांव के झोलाछाप डाक्टर इलाज नही कर पा रहे थे। उन्हें शहर में एक मेडिकल कॉलेज में भर्ती करा दिया गया उनकी देखभाल के लिए धारी का छोटा बेटा जी-जान से लगा था। लेकिन गांजे की लत और अकेलेपन के दुख ने चाचा की जीवन-शक्ति बिल्कुल क्षीण कर दी थी। डाक्टर ने मरीज का हाल देखकर आगे के इलाज की बजाय उन्हें घर ले जाने की सलाह दी थी। निराश मन से सभी उन्हें घर की ओर ले चले। वापस लाते समय गांव के बाहर काली माता मंदिर के पास सड़क पर नया नया भराव हुआ था।
जैसे ही ट्रेक्टर का पहिया हिचकोले खाता हुआ उस पर चढा कि एक जोर का झटका लगा और पूरी ट्राली उछल पडी थी। इस अफराा-तफरी मेें रोगी के प्राण विहग पिंजरे से आजाद हो गये। रोना पीटना मच गया। कुछ दिन बाद चाचा का क्रियाकर्म पूरा होने के बाद जब कई दिन बीत गये तो शाम को अकेले लकड़ी की कुर्सी पर बैठे पिताजी नें उन्हें याद करते हुए कहा कि अब नारायन के खेतों की विरासत करानी पड़ेगी। मैं समझ नही पाया था बहुत दिनों बाद पता चला चाचा के खेत के दो हिस्से लगे थे। एक में मेरा नाम लिखाया गया था ।
कहीं कहीं से सुनने में आता था धारी की चिलम में चाचा का हिस्सा भी था और धारी का छोटा बेटा शक्लो सूरत पर हूबहू नारायन चा पर गई थी।

शनिवार, 27 सितंबर 2025

घोड़े

                     शीर्षक - वफादार घोड़े:- 

🐎 आज के परिवेश मे राजनीतिक कार्यकर्ताओं की घोर निष्ठा और वफादारी अपनी स्वामिभक्ति के लिए विख्यात 'घोड़ों' को भी मात देती है। अपनी इच्छाओं को लज्जा और शर्म के आवरण मे समेटे एकनिष्ठ होकर अपने नायकों की सेवा करते इन कार्यकर्ताओं की इस वफादारी के बावजूद उन्हें प्राप्त क्या है ?
इसका आंकलन किये बगैर मै अपनी कविता आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूं, आशा करता हूं आपको पसंद आयेगी...............................................

घोड़े हां, हां ये घोड़े ही तो
करते हैं जंग की शुरुआत 
वर्ना राजाओं की फितरत
हंसते गलेमिल भूलने की है।01

घोड़े ही बैठे होते हैं तैयार
निज खूं बहाने को पागल
वर्ना इक राजा की दुश्मनी 
दिखी कभी किसी और से।02

ये दौड़ते है सरपट मैदां से
रौंदते है बेजा हरे भरे खेत
और मिटाते है खेत-खलिहां 
जो भरता है इनका भी पेट।03

आखिर मे जीतता है राजा
हारने पर हार जाते है घोड़े
जीत बनी राजा की खातिर 
चोटिल होने को बने हैं घोड़े।04

खुश होने पे पाते थोड़ी घास
गुस्से मे दमभर पाते हैं कोड़े
इनमें है वफादारी का सबब
आदत से ही मजबूर हैं घोड़े।05

भूल सहज कोड़ो के निशां
सारा बोझ सिर पे उठाते हैं
पूरी चोट देता हो सवार इन्हें 
उसे भी सिर पे ही बिठाते हैं।06

:- शशिवेंद्र 'शशि'
#Ssps96

रविवार, 24 अगस्त 2025

द्रोण पुस्तक के चतुर्थ सर्ग से

ये धृष्ट जयद्रथ खड़ा हुआ 
अपने दोषों से सजा हुआ 
थी कुटिल चाल दिखलाई
तेरे सुत की मौत करायी ।

सम्बंधी, नही क्षम्य है ये
आगंतुक नही गम्य है ये
इसको परिणाम दिखाना है
यमलोक इसे पहुंचाना है।

तो तान शरासन हे अर्जुन 
क्षत विक्षत इसे अभी कर दे
चल बान मार कर राक्षस को
इसके खूं से कुरूक्षेत्र रंग दे।

अभिमन्यु न सिर्फ भागिनेय मेरा
वो प्यारा शिष्य भी मेरा था।।
तु जनक तो हूं मैं उसका मामा
दो माताओं सम आंचल मेरा था।।


चक्रव्यूह रचा द्रोण ने जब
था कुटिल क्रुद्ध राजाओं से
उसमें कुंठा थी भरी इतनी 
क्या प्राप्त उसे विधवाओं से।।

यूं लिए हलाहल कुंठा का 
वो राज कुटुंब में बसता था
उसके के चरणों में शीश धरे
राज समाज सब रहता था।।

उसी राज कुमार का उसने
भीषण आखेट कराया है
शावक वधने की खातिर
गुरू का धर्म लजाया है।।।

एक वीर साधने में इनके
सब छक्के छूटे जाते हैं
खड़ग चलाते पीछे से
हितैषी तेरा बताते हैं।।

सब नियम ताख पर रख
उस बालक से लडे सात
इक के वश था नही वीर
कायरों की क्या ही बिसात।।

जिस घर का राजपुरोहित था
उस घर को वेध दिया उसने
सादर ही शीश जो झुकता था
झुकने पर काट लिया उसने।।

अब शीश कटेंगे कुरूओं के
संबंधी के या गुरूओं के
एक ही धर्म निभाना तुम
अरि का सर्वस्व मिटाना तुम।।

जी करता कालरूप धर लूं
पी जाऊं पाप धरा का सब
है क्षुब्ध चित्त मेरा इतना या
नरसिंह रूप धरूं क्या अब।।

शनिवार, 23 अगस्त 2025

महादेवी वर्मा को शब्दसुमन अर्पण !

महादेवी वर्मा को शब्दसुमन अर्पण!
―――――――――――――――――――――


महादेवी वर्मा उस कलम सिद्ध साहित्यकार का नाम है जो बर्बरीक की भांति अपने एक ही रचना रूपी प्रहार से समकालीन साहित्य के तमाम दिग्गज साहित्यकारों का सादर अभिवादन करती और समान हैसियत के रचनाकारों के कंधे पर स्नेहपूर्ण भ्रातृसम हस्त रखती प्रतीत होती हैं।
उनकी रचना 'संस्मरण' दद्दा राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त से आरंभ होकर निराला, प्रेमचंद और सुंघनी साहू के तंग बनारस की गलियों से गुजरती पंत और सुभद्रा से सुखद चर्चा करती गुरूदेव रवीन्द्र के ऋषित्व को प्रणाम करती है, आगे बढ़कर राष्ट्रपिता बापू के स्मरण मे बाबू राजेंद्र प्रसाद की सादगी को श्रद्धा से स्पर्श करती पंडित नेहरू और राजर्षि टंडन तक अपनी स्मृतियों की गुल्लक का संचय दिखाती पूर्ण होती है।
गार्गी और अपाला जैसे भारतीय नारियों की दर्शन और साहित्य में सिद्धा परंपरा को आगे बढाती ऐसी विदुषी मनीषा की भावपूर्ण लेखनी को प्रणाम🙏

प्रतिज्ञा

इतिहास मे प्रतिज्ञा पर आधारित कई महान घटनायें हुई इन पर अनेकों रोचक वर्णन और कथायें आज भी मौजूद है। यहां तक की कई विद्वान 'भीष्म प्रतिज्ञा' को महाभारत जैसे भीषण युद्ध का परोक्ष आधार भी मानते हैं लेकिन प्रतिज्ञा का अर्थ महज वचनबद्ध होने मात्र से नही है वरन मन, कर्म और वचन से उस संकल्प को निभाने में हैं।
कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास 'प्रतिज्ञा' का नायक 'अमृतराय' अपने जीवन व्रत को आजीवन निभाने के लिए प्रतिबद्ध है जबकि इसमे वर्णित नायिकाओं ने साधारण परंतु अप्रतिम भारतीय नारी की झांकी प्रस्तुत की है। लाला अमृतराय अपनी पत्नी की मृत्यु के बाद उसकी छोटी बहन 'प्रेमा' में नई जीवन संगिनी को देख ही रहे थे कि उन्हें इससे भी बडें एक लक्ष्य की दिशा मिल जाती है फिर वह एक संन्यासी की भांति सारा सुख और वैभव छोड़कर उस लक्ष्य के ही होकर रह जाते हैं। इस दौरान उन्हें कितने झंझावात यहां तक कि अपने लंगोटिया यार दाननाथ से भी भयंकर विरोध झेलना पड़ता है, ससुराल वालों की उपेक्षा और ताने सुनने पडते हैं लेकिन वो अपने संकल्प से टस से मस नही होते। कमलाप्रसाद आधुनिकता की चाशनी में लिपटा एक विषैला करेला है जो ढकोसलेबाजी में नंबर वन है और नैतिकता और आदर्श से कोंसो दूर किन्तु अपनी पत्नी सुमित्रा के ताने और उलाहनों से पीड़ित उसका मन अंतत: हारकर सुमित्रा की ही शरण लेता है। 
मुंशी प्रेमचंद जैसा कालजयी कथाकार अपने शब्दों से एक ऐसी श्रृंखला तैयार करता है जिसकी एक एक कड़ी को पकड़ता हुआ पाठक अपनी उत्सुकता के गहरे समुद्र को पार कर लेता है उदाहरणत:----

पृथ्वी ने श्यामवेष धारण कर लिया और बजरा लहरों पर थिरकता हुआ चला जाता था। उसी बारे की भांति अमृतराय का हृदय भी आंदोलित हो रहा था, दाननाथ ने निस्पंद बैठे हुए थे, मानो वज्राहत हो गये हों। सहसा उन्होने कहा-- भैया तुमने मुझे धोखा दिया।

रविवार, 29 दिसंबर 2024

फिसलता वक्त ⏳️

अब तक बड़ी शिद्दत से जी है जिंदगी
खुदा से इतर करी न किसी की बंदगी
आयेगी मौत तो न झुकेंगी मेरी नजरें
शुक्र है जो न की हसीनों से दिल्लगी।।१


झूठ के मुंह पर हमेशा उसे झूठ कहा
वक्त बदला तो दौर अब अपना न रहा
हम तो नजाकत में पले थे बचपन से
बदलते मौसम के थपेड़े कभी न सहा।।२

इल्म हुआ बेशक इन थपेड़ो की चोट से
सुरखुरु करने का ये कुदरती अंदाज है
शुक्रिया कहने को अब रहता ही कौन
खत्म हो तमाशा तो क्या शाकीन बचते हैं?३

गिरते गिरते भी संभल पाने का हुनर
डूबने पे तैरकर निकल जाने का हुनर
समो लेना समंदर का तूफां आगोश में
मुफलिसी से सीखा हमने अजीम हुनर।।४

हमने डंसते आस्तीनो का सांप देखा है
गोया जीत चुके बाजी की मात देखा है
देखा, दूसरों के जज्बात ठुकराते लोग
गैर की आफत मे कहकहे लगाते लोग।।५

अपना जुगनू तो दम भर उछालते हैं
दूजे का हो आफ़ताब खाक बताते हैं
सब्र औ सुकुं बचा ही कहां दुनिया में
मशविरा देकर यहां माल कमा जाते हैं।।६

#ग़ज़ल #गजल #UrduPoetry #HindiPoetry #Shayari #GhazalLovers #PoetryInMotion #UrduGhazal #HindiGhazal #GhazalQuotes #GhazalLove #ShayariLovers #PoetryLovers


रविवार, 15 दिसंबर 2024

पकड़ी का पेड़:- धरोहर

 


मेरे गांव मे एक पुराना 'पकड़ी' का पेड़ है जो हमारी कई पीढियों से यूं ही अडिग अचल खड़ा है। वो मेरे गांव के पश्चिमी छोर पर मौन खड़ा सैकड़ो पंक्षियों का बसेरा है। छोटे बड़े किसान अपनी फसल की मड़ाई करते हैं वहां उसने देखा है अनगिनत बदलती हुई ऋतुएं, बदलते हुए मुख्तार और अप्रतिम भाईचारा ।

उसने देखा है 'कर्बला के मेले' में ताजिए के पास ढोलक बजाता संदीप, जलेबी बनाते पुजारी, सब्जी बेचते रामकिशुन और कागज के बनावटी घोड़े को नचाते जवाहर और भी ऐसे अनेकों लोग जो शायद अखबार नही पढ़ते इसीलिए बराबर शरीक होते है एक दूसरे के दुख सुख में उनके तीज त्यौहार में। पर एक दिन जब पूरी हो जाएगी उसकी उम्र तो वो भी चला जाएगा अपने साथियों की तरह, सूख जायेंगी उसकी डालियाँ रह जाएगा शेष कि उस 'पकड़ी के पेड़ ने एक युग एक पूरा युग जिया सिर तानकर, कमर पर हाथ रखकर ...........

सारे पुराने पेड़ सूखे और मिट भी गये हैं
नये दरख्तों की बदली बदली सी छांव है
खतम हुए पंच पंचायते थी जिनके जिम्मे
अब पहले सरीखा न रहा मेरा गांव है।

अंधेरे मे खड़ा अपनी कमर पर हाथ रख
पुरानी पकड़ी का पेड़ वैसे ही अकड़ता है
दूर दूर फैली शोहरत थी मेरे गांव की बड़ी 
शायद इसी गुमां ने उसे रोक कर रखा है।

परिन्दों के आशियाने उसकी शाखों पे हैं
ये बोझ शायद उसे थक कर जाने न देता
गटठर लिए किसान सुस्ताते छांव में यहां
ये हौसला उसे विदा कर सूखने न देता हो

डरता हूं उसके साथ के सैकड़ो पीपल और नीम 
छोड़ कर चले गये वजूद अपना यादें ही बच रही
इसकी शाखें उन परिन्दों का आखरी सहारा हैं
पर मिट जायेगी इकदिन मेरे गांव की ये धरोहर।।



#hindi #hindipoem #poetry #memory #life 

नारायन 'चा'

वृद्धाश्रम में सुबह की चाय पीते हुए शारदा बाबू नीम के पेड़ के नीचे वाले चबूतरे पर बैठ गये थे। सेवानिवृत्त होने के बाद धीरे धीरे यह तीसरा साल...