बुधवार, 21 अक्टूबर 2026

चिरैयादह का मलेर

चिरैयादह वर्तमान पंजाब और हरियाणा की सीमा से लगी एक स्वतंत्र रियासत थी। यह मलेर राजपूतों की राजधानी थी। किंवदन्ती है कि एक मलेर दस दिलेर के बराबर होता था और प्रत्येक दिलेर एक सवाशेर के बराबर होता था । 
यह अनुपात कुछ इस प्रकार था कि एक सवाशेर एक पूर्णतया विकसित और पुष्ट शेर की शक्ति के सवैया के बराबर माना जाता था। उस समय चिरैयादह का शासन सुलखा मलेर के हाथ में था जो अपने पिता बिराल की चौथी पत्नी की सातवीं संतान था।
उसके जन्म से पहले ही अलूवा सिद्ध ने बता दिया था कि चिरैयादह का नया मेठ आने वाला था। चिरैयादह में राजा को मेठ कहा जाता था । उसकी मां किसी कुलीन राजवंश से नही थी बल्कि एक चरवाहे की बेटी थी जो अपनी भेडों की रक्षा के लिए निहत्थे ही भेडियों के झुंड से भिड़ जाते थे। माता के वंश का शायद जुझारूपन का यही गुण सुलखान के व्यक्तित्व में समा गया था। वह बचपन से ही बहुत जुझारू और गंभीर था। अपने भाई बहनों मे वह 11वें नंबर पर था लेकिन पिता का स्नेह इसे कभी नही मिला।
बलबन उस समय दिल्ली की गद्दी पर बैठा और उसने चहलगानी समाप्त कर अब एक नयी सैन्य पद्धति चलायी थी। जिसमें सेना में भर्ती होने के लिए अन्य राजाओं को सुल्तान की सेवा में अपने राज्य से युवा सैनिक देने पडते थे। चिरैयादह राज्य अपने निर्माण से ही स्वतंत्र रहा था उसे गुलाम बनाने का साहस कभी किसी भी शासन में नही रहा लेकिन बलबन को अब ज्यादा सैनिकों की आवश्यकता थी और अपने शासन के नवोदित काल में ही मलेरों के इतने मजबूत समूह को दिल्ली के इतने पास नही रहने देना चाहता था। यह कूटनीतिक दृष्टि से भी सुरक्षित नही प्रतीत होता था बल्कि उसे तो आश्चर्य था कि कैसे उसके पूर्ववर्ती शासको ने इनहे फलने फूलने दिया था। सो वह उन्हे छेड़ने का खतरा लेने को बाध्य था। चहलगानी के अमीर अब इल्बारी तुर्कों से नफरत करने लगे थे क्योंकि बलबन इसी वंश खानदान से था। जब एक तुर्की अमीर को भरे दरबार में घुटनों पर बैठकर सुल्तान को सिजदा और पाबोस करना पडता था तो वह अंदर तक शर्मसार हो जाता था और अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए वह किसी भी स्तर पर जाने को तैयार बैठा था लेकिन राज दरबार मे असंतोष का स्वर उठाने का किसी मे साहस न था।  बलबन की मजबूत लौह और रक्त की नीति इसके लिए जिम्मेदार थी। वह अपनी अवज्ञा करने वालों के साथ भयंकर रूप से निपटता था। इससे उसके विरोधियों के हौसले पस्त हो जाते थे और विरोध का स्वर उनके कब्र मे दब कर क्षीण हो जाता था। इतनी बर्बरता और कठोरता के आगे सभी डरे हुए थे । यहां तक कि सुल्तान के मंत्री सलाहकार भी डर डर कर सलाह देते थे। बलबन छोटे कद का एक कठोर शासक था यह उसके चेहरे से भी झलकता था जो बचपन मे ही चेचक के दाग से भर गया था और विकृत लगता था। सुल्तान की गद्दी पर बैठा इक डरावना व्यक्ति जिसकी हनक मात्र से बडे बडे योद्धाओं की छाती बैठ जाती थी परंतु बलबन मे ऐसा कोई अवगुण नही था जो राज्य के लिए नुकसानदायक हो। शायद ऐसा इसलिए कि प्रकृति ने उसे मंगोलों की चुनौती झेलने के लिए तैयार किया था। मंगोल उस समय की सबसे बडी चुनौती थे, चहलगानी अलग षड्यंत्र बुन रही थी। बलबन की राह आसान नही थी लेकिन अपनी इच्छाशक्ति से वो आगे बढ रहा था मंगोलों के छोटे छोटे हमले नाकाम किये जा रहे थे जो आने वाले किसी बडे युद्ध का संकेत भी थी। बलबन इसे भांप चुका था और वह अपनी सैन्य मजबूती मे लग गया था। हालांकि उसकी सेना में अलग अलग समूह थे सबपर उनकी वीरता का ठप्पा लगा था लेकिन मंगोलों के लिए यह पर्याप्त नही था। मंगोलों का सरदार रंहोर खान कद काठी और क्रूरता मे हूबहू दूसरा चंगेज खान था। दुधमुंहे बच्चे को पटककर मारने के उसके कई कुख्यात किस्से सुनाये जाते थे। उसपर नरभक्षण का संशय भी था यहां तक कि रात्रि में उसकी ही सेवा में तैनात परिचायकों के गायब होने की कई घटनायें हो चुकी थी। दबी जुबान से उसके निशा-राक्षस होने की बात सुनने में आती थी । वह मांस का ऐसा प्रेमी था कि जानवरों  के बच्चे का मुलायम मांस कच्चा खा जाता था। ऐसे भयानक और क्रूर शत्रु ने जब दिल्ली का रूख किया तो दिल्ली सल्तनत के अंदर भय इस कदर व्याप्त हुआ कि वणिक और व्यवसायी वर्ग अपना व्यवसाय छोड़कर पूरब मे बंगाल की तरफ जाने की योजना बनाने लगे । उनका मानना था कि रंहोर विप्लव करता हुआ दिल्ली और आसपास के इलाकों तक ही रहेगा यदि आगे भी बढ गया तो मध्यक्षेत्र तक जा सकेगा बंगाल का ध्यान नही करेगा। बलबन के पास इस बात की सूचना पहुँची तो वह पहले से ही आतंकित था अब उसकी रात की नींद भी गायब हो गयी थी। रोजाना सुबह शाम मंगोल टुकड़ी की सूचना मिलती, आज यहा तक आ पहुँचे परंतु जब मंगोल सेना सरहिंद तक आ गयी जो दिल्ली से महज चार दिन का सफर शेष रह गया तो बलबन की व्याकुलता बढ़ गयी। वैसे तो मंगोल कोई बहुत युद्ध के लिए प्रशिक्षित कौम नही थी परंतु युद्ध के बाद लूट-खसोट की इतनी तत्परता शायद ही किसी और कौम मे थी। यही एक वजह थी कि उनका प्रत्येक सदस्य लडने को आतुर एक खतरनाक योद्धा था और उसके हाथ मे पकड़ी गई हरेक चीज एक हथियार थी। वह समुद्र की एक बड़ी लहर की भांति थे जो अपने सामने आने वाली हरेक चीज को बहा ले जाती थी और पीछे तबाही का अवशेष छोड जाते थे। बलबन के पास इनकी कोई काट नही थी उसकी सेना मे रंहोर का इक अलग भय भी व्याप्त था ।
जो कच्चा मांस खा जाता हो उस दस्यु की शक्ति का क्या ही पारावार होगा।
बलबन और उसका पूरा सियासी खेमा इस पर विचार कर रहा था रतजगे हो रहे थे। आधी रात बीत चुकी थी कोई समाधान नही दिख रहा था। सबके हाथ माथा थामे हुए थे अचानक जलीग नुसाई जो बलबन का बावर्ची था कहवे का कुल्हड लेकर शाही कमरे मे हाजिर हुआ और सुल्तान के दस्तरखान पर रखते हुए बोला
"हुजूर जान की माफी हो तो कुछ अर्ज करूं"
बलबन ने बिना उसकी ओर देखे बोलने का इशारा किया 
"सुल्तान, इस मुसीबत को टालने के लिए पश्चिम की ओर क्यों नही देखते
जनाब, रंहोर को मलेर ही मार सकते है"। 
और इतना कह कर वह हुक्म लेकर चला गया
बलबन के पास अब तक इसका समस्या कोई हल न था लेकिन अब उसके पास था
लेकिन मलेरों को मनायेगा कौन........क्रमशः

(शशिवेंद्र 'शशि' के उपन्यास 'चिरैयादह का मलेर' का अंश)

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मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026

अनाहत

आज का शब्द 👑 'अनाहत'
(Unstruck, Unbeaten, Soundless)
अर्थ🔍है : जिसे आहत (चोटिल, आघातित या प्रहार) न किया गया हो; जो बिना किसी आघात या संघर्ष के स्वतः उत्पन्न हो।

इसके पर्यायवाची शब्द हैं:- 

• अनहद
• अक्षत
• अखंड
• अक्लिष्ट
• अनाहत नाद

साहित्यिक 📙संदर्भ:-

• संत कबीरदास और अन्य निर्गुण संतों की वाणी में 'अनहद' (अनाहत का प्राकृत रूप) शब्द का अत्यंत गहरा प्रयोग मिलता है। जब साधक का मन बाहरी कोलाहल से मुक्त होकर भीतर की ओर मुड़ता है, तब उसे उस शाश्वत आंतरिक संगीत (अनहद नाद) की अनुभूति होती है।

• यह शब्द उस अछूते, निर्मल और शाश्वत सत्य का प्रतीक है जिस पर समय या संसार के प्रहार अपनी कोई छाप नहीं छोड़ पाते।

झिलमिल झिलमिल झिगमग बाजे, अनहद का बाजा रे। 
गगन मंडल में बैठी के, संत करें रतिराजा रे॥
— संत कबीर
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बुधवार, 14 अक्टूबर 2026

ईष्ट

आज का शब्द है 👑 'ईष्ट'

Desired / Wished / Favorable / Beloved 

संस्कृत के 'इष्' (चाहना / कामना करना) धातु से बने इस शब्द का शाब्दिक अर्थ 'चाहा हुआ' या 'प्रिय' है।

अर्थ🔍: जो अत्यंत प्रिय हो, जिसकी कामना की गई हो, या जिसकी आराधना की जाए; आदरणीय, वांछित या आराध्य ।

इसके पर्यायवाची शब्द:

• वांछित / अभीष्ट 

• प्रिय / प्यारा 

• आराध्य / पूज्य 

• शुभ / अनुकूल 

नोट: उर्दू में इसके लिए 'मस्लूब', 'पसंदीदा', या 'महबूब / मुराद' का प्रयोग किया जाता है।

साहित्यिक संदर्भ 📙📙📙:

1️⃣ भारतीय परंपरा में 'इष्ट' या 'इष्टदेव' उस देवी-देवता या शक्ति को कहा जाता है जिसके प्रति व्यक्ति की अगाध निष्ठा, प्रेम और व्यक्तिगत समर्पण होता है।

2️⃣ काव्य और प्रेम-साहित्य में 'ईष्ट' या 'अभीष्ट' उस लक्ष्य या प्रियतम का प्रतीक है जिसे पाने के लिए कवि या नायक समस्त बाधाओं को पार करता है।

3️⃣ मनोविज्ञान में मनुष्य की गहरी इच्छाओं और आकांक्षाओं को उसका 'ईष्ट' कहा जा सकता है।

श्रद्धा के जिस अर्घ्य से, सजता है मन का घाट, 
वही ईष्ट बनकर तराशता, जीवन की हर एक बाट।

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मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026

बेतकल्लुफी

बेतकल्लुफी से बोते रहे नफरत की फसल।
मै परेशान हूं ये कटेगी औ घर ही तो आवेगी।।

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सोमवार, 28 सितंबर 2026

बेटी

क्या ये वक्त है बदला, क्या हालात बदले हैं
क्या तासीर बदली है खूब जज्बात बदले हैं
स्टोव की ज़द में पहले होती थी बस बहुएं
अब सास ससुर भी नीले ड्रम के खतरे है।।
बडा खानदान है उसका जो बेटी देता है तुम्हे
अपने से बडा समझे है तो बेटी देता है तुम्हें 
तुम यूं बेमुरूव्वत जी रहे घर की दहलीज मे
उसकी सिसकियों का सैलाब जला न दे तुम्हें ।।
खाली हाथ आया भाई तो आंख भर आयी
जो कुछ छिपाया था हथेली पर रख आयी
गुल्लक में छिपा दिये शौहर के चांटे सारे
वह भाई से मिली भी तो मुस्करा कर आयी।।
जमीं पे गिरे आंसू वो अब तेजाब हो गये
सिसकियां जो बदलीं तो अजाब हो गये
दहलीज में बैठे गिने वो चांदी के सिक्के
बेटी की ससुराल वाले बेनकाब हो गये।।

बाग से फूल हटाओगे तो माली क्या ही करेगा
हंसी चिड़िया मिटाओगे तो जंगल क्या ही करेगा
जिसकी मुस्कराहट पर सारी उम्र जिया उसने
उसकी गुड़िया जलाओगे तो बाप क्या ही करेगा।।


आंगन की गौरैया बचायी जालिम जमाने से
और तुम्हें सौंपी हो बड़ी मिन्नत से, मनाने से
वो भूचाल थाम कर  पी लेगा समंदर सारा 
खता न करना, बचना उसे आजमाने से।।
जख्म देना गर उसे तो बस बेपरवाह ना होना
ख्याल रखना उसका कभी लापरवाह न होना
बेटियां सबसे अजीम चीज होती हैं बाप की
जिंदा हो बाप तो बेटी रूलाकर चैन से न सोना।।

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शुक्रवार, 11 सितंबर 2026

मुहावरेदार:- बंदर 🐒 क्या जाने अदरक का स्वाद

मुहावरेदार:- बंदर 🐒 क्या जाने अदरक का स्वाद

शुक्रवार की बाजार मे थैले और जेब का भरसक संतुलन बनाने का प्रयास करते हुए मैं अगली खरीदारी को बढा ही था कि श्रीमती जी का फोन आ गया
मैने एक ही झटके मे सब बता दिया जो खरीद चुका था और जो खरीदने वाला था ।
वो दूर दराज किसी कस्बे के दबंग थानेदार की तरह पूछती रही मै एक सीधे साधे ग्रामीण की तरह सकपकाता जवाब देता चला गया।
सब ठीक चल रहा था अचानक उसे अदरक का ध्यान आ गया
बोली तीन बार से अदरक नही ला रहे हो
मैने भी तपाक से जवाब दिया, ले लिया है, बताना भूल गया
काल काटकर मै अदरक वाले को ढूंढता आगे बढा वह कोने मे खडा था उसकी रेहडी पर बहुत कम भीड़ थी।
मैने जब दाम पूछा तो पता चला 400रू प्रति किलो
थकहार कर मुझे 100ग्राम खरीदना ही पडा
फिर वापस लौटते हुए अदरक मेरे दिमाग में कौंधने लगा

"बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद"

अक्सर घरों मुहल्लों चौक चौबारे और सामान्य बोलचाल में यह तंजपूर्ण मुहावरा चिपका दिया जाता है।

अदरक 🫚 जिसे संस्कृत में शुष्ठी भी कहते हैं। यह एक औषधीय पौधा है जिसका वानस्पतिक नाम जिंजिबर ऑफ़िसिनेल है और यह हमारे दक्षिण एशिया की देशीय उपज है लेकिन यह स्वभाव से अति कडवा और गर्म होता है। इसके गुण दोष का मूल्यांकन करें तो कहीं भी यह नही लगता कि यह किसी को पारितोषिक के तौर पर दिया जा सके।
हां यदि किसी से मित्रता बढानी हो तो उस खांसते या सिसकते व्यक्ति को मस्त अदरक की चाय पर आमंत्रित किया जा सकता है।
इसके अलावा पुराने टाइम मे जब कोका कोला पेप्सी जैसे ठंडे पेय पदार्थ नही थे तो हमसे जस्ट पहले वाली पीढी शायद कालेज कैंटीन मे अपनी महिला मित्र को जरूर अदरक की चाय ही पिला कर प्रपोज❤️ करती रही होगी।
केरोसीन वाले स्टोव पर तपते पतीले में उबलती चाय और उसमे कूट कूटकर डाली गयी अदरक उसके स्वाद को और तीक्ष्ण कर देती है। यह तीक्ष्णता हृदय की गहराईयों में उतरते हुए किसी का हाथ थामने को मजबूर कर देती होगी
और शायद यही वो पल है जब इजहार कर दिया जाता रहा होगा खैर
इसके अलावा अदरक का घरेलु उपयोग भी है जिसमें उसकी कतरनें उदर के रोगी को नमक से खिलायी जाती हैं तथा कच्चे अदरक की चटनी जो सिल बट्टे पर पिसी हुई मिल जाये तो बस अह हा हा.....भोजन करने वाले का मन तृप्त हो जाये।

फिलहाल बंदरों को तो न चाय बनानी आती है न ही वो सिल बट्टे का प्रयोग करना जानते हैं फिर उसे अदरक थमाने का क्या प्रयोजन रहा होगा।

जरूर मुहावरा बनाने वाले का बंदरों से कोई बैर रहा होगा तभी तो उसे अदरक जैसी कीमती चीज थमा कर व्यंग्य किया जाता है..........
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गुरुवार, 3 सितंबर 2026

जन्माष्टमी विशेष

सुबह-सुबह जैसे ही नींद खुली तो "ठाकुर जी" का बडा सलोना सा एक चित्र मेज पर रखा था


कैसी मनोहर तस्वीर है
माथे पर चंदन लगा हुआ है
जैसे किसी ने "Happy Birthday" वाला टीका माथे पर लगा दिया हो❤️🫡🙏

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चिरैयादह का मलेर

चिरैयादह वर्तमान पंजाब और हरियाणा की सीमा से लगी एक स्वतंत्र रियासत थी। यह मलेर राजपूतों की राजधानी थी। किंवदन्ती है कि एक मलेर दस दिलेर के ...