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सोमवार, 6 मार्च 2023

अतीत:- विछोह का पश्चाताप #hindipoetry


पलट कर बोल भी तो सकता था मै

पर चुप रहकर मान लेना बेहतर था

हाल-ए-दिल खोल भी सकता था मैं

पर मौन होकर आंसू पीना बेहतर था।।01



उन्हे अंदाजा था मेरे शर्माने पन का

जिससे वो थोड़ी घबरायी सी रहती थी

कहते कहते कभी रूकती फिर कहती 

डरी थी सहमी सी कहती फिर डरती थी।।02

इक सफ़र:- जिसमे किधर गया हूं मैं


सच तो उनका वह डर हुआ ही आखिर

बनते बनते सब बिखर ही गया आखिर

रहा शेष ही क्या उस कारवां मे आखिर

चिता मे शेष बची रही राख हो आखिर।।03


कमबख्त इस डर ने ही बिगाड़ा काम सारा 

इसने ही रूसवां कराया था नाम हमारा

जितना ही इससे बचते थे उतना ये डराता

नामुराद गाहे बगाहे खुद ही चला आता।।04



कांपते हाथों से इकबार थाम लिया मैने

रोका उनने भी नही था नजरें नीचे कर के

पसीने की बूंदे हिलते होठ पर आवाज नही

सुख मधुर संगीत का और कोई साज नही।।05

बुलेट मेरी


बंद आंखे आज भी उस सुख को देखती हैं

जिन आंखो को समझने का हुनर था अपना

धडल्ले निकलते है अब उस गली से कूंचे से

कभी जिनकी महक से था वास्ता अपना।।06


ये जिन्दगी गुजरती ट्रेन के बाद का स्टेशन

कोई और अब इंतजार करता नही मिलता

कांच का ही बना होगा इंसानी दिल शायद

जख्म-ए-दिल को कोई रफूगर नही सिलता।।07



:- SHASHIVENDRA SHASHI
         शशिवेंद्र "शशि"

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रविवार, 6 नवंबर 2022

अधूरा वादा: संस्मरण

"भरारा" स्टेशन पर गाड़ी आज थोड़ी ज्यादा देर तक रूकी, नीलेश खिड़की से अपने गांव जाने वाले रास्ते को निहार रहा था। नरकट और सरपत के झुरमुटों से ढकी पगडण्डी और हल्की हवा से हिलते पत्ते जैसे सिर हिला हिला कर उसको विदा कर रहे हों

बरसों पहले पिता जी वहीं एक छोटी सी गुमटी पर इंतजार करते हुए मिलते थे, कुर्ता पाजामा पहने, पान से लाल होंठ मुस्कराते हुए, चरण स्पर्श करने के बाद वहां जुटे लोगों का अभिवादन और फिर बाप बेटे अपनी पुरानी बुलेट पर गांव तक उस पगडण्डी का 4 कोस का सफर लचकते हिलते डुलते पूरा करते थे, पहुंचने तक सांझ हो जाती थी, गाड़ी से उतरते ही ओसारे मे लालटेन जलाती मां दीखती पर घर मे घुसने से पहले कुल देवी को प्रणाम करके ही आगे बढ़ना होता था, मां आगे बढ़कर आंचल से ढक कर ढेरों आशीर्वाद देते हुए अंदर ले जाती थी।

बातें शुरू होती तो खाते-पीते, सोने तक खूब बातें पिछली पुरानी, विस्मृत, शरारती, ठिठोली खत्म ही न होने वाली पर पिता जी के सामने गंभीरतापूर्वक फिर जाने कब नींद आ जाती और सुबह नींद खुलती तब तक पूरा गांव जग जाता था।

पूरे घर मे उत्सव का माहौल रहता बाहर से मित्र और संबंधी भी मिलने आते थे, कुशल क्षेम के साथ ही दावत पर भी बुलाया जाना लेकिन इतने दिनो तक शहर का खाना फिर मां के हाथ के खाने का मौका कौन छोड़ दे।

सीधे मना भी नही कर सकते सो रोज मां को दो तीन लोगो के लिए अतिरिक्त खाना बनाना पडता था।

मां खुश रहती थीं, पूरा घर पुलकित रहता था लेकिन न जाने क्यूं छुटटियों के दिन जल्दी बीत जाते और लौटने की तैयारी शुरू हो जाती अभी तो ठीक से बातें भी ख़त्म नही हुई, वहां मंदिर मे जाना था, मामा के घर भी जाना है।

मां अबकी बार कैसे होगा लेकिन अगली बार जब आउंगा तब जरूर चलेंगे, यही अधूरा वादा हर बार करके नीलेश लौटता था मां चुप रह जाती थीं। अब जबकि बहुत कुछ बदल गया, ना पिता जी रहे ना ही वो गुमटी, रह गया तो सिर्फ नीलेश का बहुप्रतीक्षित वादा, वो भी आधा, अधूरा, अपूर्ण..........

ट्विटर #Ssps96

 :-शशिवेन्द्र "शशि"



मुहावरेदार:- बंदर 🐒 क्या जाने अदरक का स्वाद

मुहावरेदार:- बंदर 🐒 क्या जाने अदरक का स्वाद शुक्रवार की बाजार मे थैले और जेब का भरसक संतुलन बनाने का प्रयास करते हुए मैं अगली ...