काँटा कठोर है तीखा है, उसमें उसकी मर्यादा है ।।।
मै कब कहता वो घटकर प्रांतर का ओछा फूल बने।
परिश्रमी लोगों की असफ़लता पर धीरज बढाती ये पंक्तियां प्रेरणा का वो गीत है जो झुके हुए कंधों और शीश को पुन: प्रयास के लिए तैयार कर देती हैं.....
शशिवेंद्र 'शशि' एक लेखक और विचारक हैं जो लगभग दो दशकों से शिक्षण, अनुसंधान और लेखन के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। अपने लेखन के माध्यम से वह भारतीय समाज की परंपराओं और रुढ़ियों की जटिलताओं में गहराई से जाते हैं। वह जाति प्रणाली और असमानताओं की आलोचना करते हैं और सांस्कृतिक न्याय और समानता के लिए मजबूती से वकालत करते हैं। शशि समानता और सुलभ न्याय के लिए वकालत करते हैं, साथ ही साथ महान सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाते हैं। ट्विटर: @Shashivendra84 सोशल मीडिया हैशटैग: #Ssps96
क्या ये वक्त है बदला, क्या हालात बदले हैं क्या तासीर बदली है खूब जज्बात बदले हैं स्टोव की ज़द में पहले होती थी बस बहुएं अब सास ससुर भी नीले ...
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें