सिसकती रातों की मंजिल क्या है
लरजते आसुंओं से हासिल क्या है
जीते तो मिल ही जाती बादशाहत
पर हार जाने पे मुकम्मल क्या है।।
थके तो हांफकर सो जाते जमीं पर
ओढ लेते इस दुनिया का सारा गम
बची है सांसे, अभी आजमा लेते हैं
हार उम्दा है तो फिर जाहिल क्या है।।
घबराने पे थाम लेना वो हाथ नाजुक
फखत इक हिस्सा है उस कहानी का
जहां लबों तक न आ सकी हां उसकी
बड़ी हिम्मत से दांव था लगाया उसने।।
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