पूरा घर और घराडीं दूर तक फैला हुआ था। उसका दुआरा ही लगभग एक बीघा मे फैला था । सामने एक कुंआ था जिसमें से पूरा मुहल्ला पानी भरता था। घर का दुआरा सामने वाले रास्ते तक फैला था कई बार तो यह बारात रूकने के लिए भी पर्याप्त था। छोटी बारात वहीं रूक जाती थी लेकिन बारात का दरवाजे पर रूकना एक जिम्मेदारी भी होती थी। कही घराती के यहां से भिनही (सुबह) का चाय आने में देर हो गया तो अपने घर से 20-30 कप चाय झट से स्टोव पर बनवाकर भिजवा दिया जाता था। आखिर गांव की इज्जत खतरे में नही आना चाहिए।
और क्या यही तो होता है बडकवा होने का जिम्मेदारी भी। नही तो पश्चिम टोला में भी तो बहुत बडकवा लोग रहता था। बहुत पैसा वाला लेकिन क्या मजाल की गांव समाज के नाम पर एक ढेला तक खर्च कर दे।
लेकिन पिताजी बहुत इज्जतदार व्यक्ति थे वह अपने सौतेले भाई नारायन का भी बहुत जिम्मेदारी से ख्याल रखते थे। जबकि नारायन चाचा बहुत झक्की आदमी थे हम लोग उन्हें प्यार से 'नारायन चा' कहते थे । वह कई बार तो गांव में लोगों से झगडा तक कर लेते थे और प्राय: मार खाते खाते बचते थे । लोग केवल पिताजी का ख्याल और थोड़ा सा खौफ करके चुप रह जाते थे।
कई बार नारायन चा का ब्याह कराया गया लेकिन उनके झक्क के आगे कोई भी औरत उनके साथ टिक ही नही पायी और उन्हे छोड़कर भाग गयीं। इसका खामियाजा हुआ चाचा फिर से अकेले रह गये। इस अपमान और खीज में वे और भी ज्यादा चिड़चिड़े भी हो गये थे। वो मुझको बऊवा कहते थे। दुनिया में भगवान को कितना मानते थे पता नही लेकिन पिताजी के बाद यदि किसी की सुनते थे तो सिर्फ मेरी।
मिडिल की पढाई पूरी कर आगे पढने के लिए मुझे पटना जाना पडा था नारायन चा स्टेशन तक आये थे अपने ट्रेक्टर ट्राली से सामान लेकर। सब सामान उतरवाकर चुप पीछे खड़े थे बुशर्ट और पाजामा पहनकर। ट्रेन आने मे लेट था बार बार ट्रेक्टर देखने के बहाने थोड़ी थोड़ी देर में किनारे की तरफ जाते रहते थे सुर्ती का तलब जो लग जाता था। दरअसल पिताजी के सामने आज भी वह कोई अम्ल नही करते थे अपने बड़े भाई को ही अपना भगवान अपना देवता अपना राजा मानते थे।
गाड़ी में बैठते हुए मैने उनके चेहरे की ओर देखा था मैने उन्हें कभी ऐसा नही देखा था। 'नारायन चा' जैसे अब रो देंगे। मन किया उतरकर चाचा के गले से लग जाऊं लेकिन बेरवां छोटा स्टेशन था यहां ट्रेन कुछ ही मिनट के लिए रूकती थी मन मसोसकर मै वहीं से हाथ हिलाता रहा। थोडी देर में एक लंबी सीटी देकर ट्रेन चल पडी मै दूर तक खिड़की से उन्हें देखता रहा। पिताजी चाचा को वापस चलने के लिए कह रहें थे। शहर पहुंच कर मैने एक दो चिट्ठियां लिखी फिर पढाई और शहर के तामझाम में व्यस्त हो गया। दिन बीतने लगे दिन हफ्तों में और हफ्ते महीनों में फिर बरस बीतने लगे । इस बीच मै कभी कभार घर जाता रहा परंतु वह भी दो या तीन दिनों के लिए । अबकी दीवाली मे घर गया तो पता चला कि चाचा की तबियत खराब है शायद सांस की बीमारी है दमा के लक्षण बतायें हैं डाक्टर ने।
मां ने पिता जी के सामने ही कहा था चाचा से दूर से बात करना सामने से नही दमा के कीटाणु लग जाते हैं। यह छूत की बीमारी है। चाचा का बर्तन बिना उन्हें बताये अलग कर दिया गया था। आखिर खान पान से ही तो छूत फैलता है। मै शाम को गांव से घूमकर आया तो देखा चाचा लकड़ी वाली कुर्सी पर अपनी लोई ओढ़कर बैठे हैं खांसी आने पर मुंह उसी में ढांपकर खांस लेते थे बोलते बोलते दम फूलने लगता था।
चाचा बडे मन से कभी कभी हमारे दादा जी की पुरानी बातें सुनाते थे जब बैठे बैठे उकता जाते थे तो पश्चिम टोला के धारी महतो के यहां हो आते थे। संयोगवश जिस दिन ऐसा होता था उनकी खांसी रात में बढ जाती थी और अम्मा बाबूजी धारी को मन भर गरियाते थे। धारी दंपत्ति चाचा के अभिन्न मित्र थे जब इन्हें सीजन में कहीं मजदूर नही मिलते थे तो भी चाचा के रहते हमारी फसल सबसे पहले कट जाती थी।
हर साल चाचा के हिस्से के गन्ने का कुछ पैसा या तो गायब हो जाता या चोरी हो जाता था। मां थोड़ा बहुत भुनभुनाती लेकिन पिताजी हंसकर टाल जाते थे। कई लोग पुलिस में शिकायत की बात करते थे लेकिन चाचा किस्मत और नसीब का कहकर हर बार बात टाल देते थे। अबकी बार चाचा की हालत बहुत नाजुक हो गयी थी उन्हें लेकर पिताजी को शहर में आना पड़ गांव के झोलाछाप डाक्टर इलाज नही कर पा रहे थे। उन्हें शहर में एक मेडिकल कॉलेज में भर्ती करा दिया गया उनकी देखभाल के लिए धारी का छोटा बेटा जी-जान से लगा था। लेकिन गांजे की लत और अकेलेपन के दुख ने चाचा की जीवन-शक्ति बिल्कुल क्षीण कर दी थी। डाक्टर ने मरीज का हाल देखकर आगे के इलाज की बजाय उन्हें घर ले जाने की सलाह दी थी। निराश मन से सभी उन्हें घर की ओर ले चले। वापस लाते समय गांव के बाहर काली माता मंदिर के पास सड़क पर नया नया भराव हुआ था।
जैसे ही ट्रेक्टर का पहिया हिचकोले खाता हुआ उस पर चढा कि एक जोर का झटका लगा और पूरी ट्राली उछल पडी थी। इस अफराा-तफरी मेें रोगी के प्राण विहग पिंजरे से आजाद हो गये। रोना पीटना मच गया। कुछ दिन बाद चाचा का क्रियाकर्म पूरा होने के बाद जब कई दिन बीत गये तो शाम को अकेले लकड़ी की कुर्सी पर बैठे पिताजी नें उन्हें याद करते हुए कहा कि अब नारायन के खेतों की विरासत करानी पड़ेगी। मैं समझ नही पाया था बहुत दिनों बाद पता चला चाचा के खेत के दो हिस्से लगे थे। एक में मेरा नाम लिखाया गया था ।
कहीं कहीं से सुनने में आता था धारी की चिलम में चाचा का हिस्सा भी था और धारी का छोटा बेटा शक्लो सूरत पर हूबहू नारायन चा पर गई थी।
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