शनिवार, 12 नवंबर 2022

सीख

अखिलेश के पिता रामबदन मंझोले किसान थे आराम से साल भर का खाना पीना और शेष खर्चे पूरे हो जाते थे । आस पास के 5-10 गांव समाज मे प्रतिष्ठा भी थी।


अखिलेश 12वीं की पढाई पूरी कर चुका था नौकरी हेतु समय की मांग थी की एक प्रतिष्ठित व्यवसायिक कोर्स किया जाये पर कोर्स की मोटी फीस और हास्टल का खर्च कुल मिलाकर 10 लाख पार कर जायेगा। अखिलेश ने परिवार के लोगों को समझाने के लिए कोर्स के फायदे मे खूब कसीदे पढ़े इतना तो कॉलेज की सुन्दर काउंसलर ने भी नही किया था। पिता थोड़ी हीला हवाली के बाद तैयार हो गये पर समझाया  "बेटा रहने मे रहो बहने मे ना बहो"  पर अखिलेश को महंगे कॉलेज से पढाई पूरी करने के बाद कम सैलरी वाली नौकरी मिली थी। शायद मंदी की वजह से, कोई क्या करे जब पूरे विश्व मे ही मंदी हो गई थी।




दूर अहमदाबाद मे नौकरी लगी घर आना जाना कम हो पाता था धीरे धीरे 5 वर्ष गुजर गये शादी हो गई बाल बच्चे भी हो गये। माता पिता भी एक एक कर स्वर्ग सिधार गये थे। गत पांच वर्षों मे अखिलेश का प्रोमोशन तो हुआ लेकन वेतन मे कुछ खास वृद्धि नही हुई। दोनो बच्चो की पढ़ाई और परिवार का खर्च सब मिलाकर हाथ मे कुछ भी न बचता था। एक दिन एक सहकर्मी से चर्चा के दौरान शेयर मार्केट का पता चला हालांकि इस बारे मे थोड़ी बहुत जानकारी पहले से थी पर उसने जैसा बताया वो अलग ही था जैसे वो सैलरी को हाथ भी नही लगाता हर साल विदेश घूमने जाता है। बडा आकर्षक प्रस्ताव है अखिलेश ने कुछ दिन शेयरों का अध्ययन किया फिर लगा दिया दांव। पहले दिन पट्ठे ने 3000 का मुनाफा बनाया। दलाल का कमीशन काट कर भी अच्छा फायदा बन गया और करना ही क्या हैं बस कुछ मिनटों का काम, उसने खुद को समझाया। बस फिर क्या खेल शुरू नित्य प्रति थोड़े बहुत लाभ हानि से घबराना नही है यह तो रोमांच है इस खेल का। बरस बीतते गये अखिलेश का तजुर्बा और लगन उसे आगे बढाती रही। एक मित्र की पार्टी मे जिसने हाल ही मे एक भव्य बंगला खरीदा था।नौकरो के लिए भी ऐसी सुविधाएं जो अखिलेश के अपार्टमेंट्स मे न थीं। 



असंतुष्टि बड़ी खतरनाक हो जाती है जब वह स्व धिक्कार का रूप लेती है व्यक्ति को अंतिम सीमा का उल्लंघन नही करना चाहिए। पार्टी से लौटते हुए उस पर एक ही धुन सवार थी पैसा। कहां से आये पैसा, पूरी रात इस उधेड़बुन मे बीती। सुबह आफिस के रास्ते मे मनी मंत्र का एक वीडियो में वक्ता कह रहा था "यदि आपने अपने पैसे को कम रिटर्न वाली जगह पर फंसा रखा है तो आपको आपकीआने वाली पीढियां माफ नही करेंगी"

य। बात उसके हृदय मे बस गई बाकी के शब्द नही सुने हां खेत और घर की जमीन का क्या ही रिटर्न है। गांव के एक चाचा अच्छी कीमत देने के लिए कह भी रहे थे। आज ब्रोकर की खबर थी देश की एक बहुप्रतिष्ठित कंपनी  "आई पी ओ" लाने वाली थी। बस चाचा को फोन किया और आनन फानन मे सौदा हो गया। जल्दी जल्दी मे जो घाटा हुआ वो शेयर पूरा कर देंगे।

कंपनी का खूब नाम था घाटे मे जाने का सवाल ही नही यही मौका है अभी नही तो कभी नही यही सोच कर अखिलेश ने पूरी जमा रकम और कुछ उधार के पैसे भी लगा दिए। दाम खूब चढे और धीरे धीरे चढते गये। रोज का बढ़ता पैसा आंखो को खूब सुख देता था। पर विश्व से आने वाली खबरें थोड़े-बहुत परेशान करती थीं कोई संक्रामक बीमारी से विश्व मे लाक डाउन लग रहा है। अब इस महामारी का डर भारत मे भी बढ़ गया। यहां भी लाक डाऊन लग गया जो धीरे धीरे बढ़ाकर 3माह कर दिया गया। धंधा आमदनी सब चौपट विदेशी निवेशको के पैसा निकासी से शेयर मार्केट धड़ाम। शायद बंदी के बाद दशा बदले लेकिन कंपनी नये आयाम के लिए इतने बड़े घाटे को बर्दाश्त नही कर पायी और यह नया आयाम बंद करने का निर्णय ले लिया। अखिलेश अपना बहुत कुछ गंवा चुके थे काश पिता की "सीख" मान ली होती


#Ssps96

:-शशिवेन्द्र "शशि"

शुक्रवार, 11 नवंबर 2022

मोल-की :- (एक अनिर्णीत निर्णय की खूबसूरत कहानी) #hindistories

जहां माथे पर कोई कर्ज नही और हरे भरे खेतों मे लहलहाती फसल के साथ ही दरवाजे पर दुधारू पछाही गाय बंधी रहती हो उस किसान के घर का सुख तो देवताओं के स्वर्ग जैसा है। जैताराम चौधरी के 80 किले खेत थे और चार बेटों संग भरा पूरा परिवार। हरियाणे के सुखी मानस मे से एक था वो। बड़े बेटे की दिल्ली मे नौकरी लगी तो वो सपरिवार दिल्ली रहने लगा। दो छोटे बेटे एक साथ ही हरियाणा पुलिस मे लग गये उनका भी शादी ब्याह हो लिया बाल बच्चों समेत वे भी ड्यूटी पर ही रहते। चौथा बेटा जयपाल बहुत मेहनती था पर कम पढ़ा लिखा तो घर और खेत संभालने की जिम्मेदारी उसकी ही थी। उसकी शादी भी नज़दीक में कैथल मे हुई।

नई बहू घरेलु कामकाज से सामंजस्य न बिठा पाई तो कुछ दिनो का टकराव और घर में क्लेश शुरू हो चला। एक दिन वह रहस्मय ढंग से घर से गायब हो गई। कोई सुराग नही कहां गई, बहुत छानबीन हुई पर कोई पता नहीं। बड़ी मुश्किल से उसके मायके वालों और थाने से पीछा छूट पाया था। बेटे के इसी दुख मे जयपाल की मां बीमार पड़ी और उसकी मौत हो गयी। इस पूरे मामले में जैताराम पर कर्ज भी खूब हो गया था। यहां तक की खेत तक बेचने की नौबत आ गई। लेकिन किसी तरह पेट काट काट कर जैता फिर से गाड़ी को पटरी पर वापस ले आये थें। इस मामले को कुछ बरस बीत चुके थे लेकिन अब पूरे इलाके मे यह बात आग की तरह फैल गई। तलाकशुदा जवान बेटा कभी कभी खुद को बड़ा अपमानित महसूस करता था। उसके साथ के सभी लड़को की शादी हो चुकी थी गृहस्थी मौज मे चल रही है । यहां ताने और व्यंग्य सुनते सुनते जयपाल से ज्यादा जैता थक चुके थे।

इलाके मे वैसे भी लड़कियों की संख्या कम थी कोई बेटी देने को राजी नहीं था। जवान लड़का उसकी रोटी पानी कौन करेगा, यह सोच कर चौधरी ने कई जगह उसकी शादी की बात चलाई पर परिणाम सिफ़र रहा। थक हार कर एक बिचौलिए से संपर्क किया और उसके जरिए पूरब से एक लड़की खरीद कर जयपाल की शादी करा दी गई। लड़की के माता पिता से संपर्क कर बिचौलिए यह काम आसानी से करा देते थे और इधर के लिए यह आम बात थी। नई बहू के गांव मे आते ही उसे गांव की रीति के अनुसार नाम मिल गया "मोलकी"

गांव मे लिंगानुपात कम होने की वजह से अक्सर बहुएं बाहर से खरीद कर लायी जाती थीं।

इस मोलकी नाम के पीछे बड़ा खास उद्देश्य था जैसे ब्याह कर सम्मानित तरीके से लाई गई और मोल खरीदी गई मे सरे आम भेद बताना। भीड़ मे अपने पराये का अंतर बताना और साथ ही साथ अगले को भी उसकी औकात मे रखने का एक तरीका भी था। नई बहू की भाषा और व्यवहार दोनो बिलकुल अलग था। 

वो गुमसुम सी रहती थी किसी बात पर कभी कोई आपत्ति नहीं करती। यूं लगता जैसे वो किसी बात से अवाक रहती थी किसी उलझन में लगती थी फिर भी बात व्यवहार मे बहुत शांत रहती थी। जल्दी ही उसने एक बेटे को जन्म दिया जो हलका सांवला सा था पर बड़ी बड़ी आंखो वाला बड़ा ही आकर्षक लगता था। उसका नाम किशोर रखा गया। धीरे धीरे समय बीतता गया लड़का बड़ा होनहार था वो कभी भी घरवालों को शिकायत का मौका नही देता जबकी जैताराम के बाकी नाती पोते अपना रास्ता भटक चले थे जो न भी भटके वे औसत दर्जे के ही थे। किशोर दसवीं मे भी अव्वल दर्जे मे पास हुआ था जिले मे उसके नाम की बड़ी चर्चा थी मजिस्ट्रेट ने खुद उसे सम्मानित किया था। अबकी बार हरियाणा राज्य की सरकार ने घोषणा की थी 12वीं की परीक्षा मे प्रथम तीन परीक्षार्थियों को विशेष पुरस्कार दिये जायेंगे। आज बारहवीं के परिणाम आने वाले थे। सभी परीक्षार्थी थोड़े बहुत नर्वस थे जाने क्या होगा। किशोर इन बातों से दूर घर और खेती के कामों मे मां के साथ लगा हुआ था। गेहूं की नयी फसल का भूसा आ गया था सुबह से उसे ढो ढोकर मां बेटा किनारे भैंसों के चारे वाले कमरे मे रख रहे थे। लगभग पूरा दिन इसमें बीत चुका था शाम के करीब चार बजने को आये किशोर भैंसो को चारा डालने जा रहा था की उसका एकमात्र दोस्त अजेश दूर से ही उसे आवाज लगाता हुआ दौडा चला आ रहा है। अरे भाई कमाल हो गया है तू टाॅप कर गया है। अजेश ने अखबार निकाला और परिणाम दिखाया किशोर ने मां की तरफ देखा गौरवान्वित मां सजल नेत्रों से उसे देख रही थी। झट उसने मां के पैर छुए, शाम तक दरवाजे पर लोगों का जमावड़ा लग गया डीएम स्वयं आने वाले थे।

बरामदे मे बैठे मजिस्ट्रेट ने किशोर को शाबासी देते हुए कहा आज से एक हफ्ते बाद मुख्यमंत्री तुम्हे सम्मानित करेंगे और जिले को जोड़ने वाली तुम्हारी गांव की सड़क का नामकरण तुम्हारे नाम पर होगा। यह रहा सहमति पत्र इसे भर दो बेटा।

किशोर ने भर कर पत्र वापस लौटाया तो मजिस्ट्रेट ने फार्म चैक किया तो समझाते हुए बोले बेटा लगता है नाम गलत भर दिया है। तुम्हारा नाम तो किशोर है न?

नहीं सर मेरा वास्तविक नाम इस गाँव मे यही है "मोलकी का"

मतलब, मजिस्ट्रेट के मुंह से निकला

मतलब ब्याह के लिए मोल खरीदी गई औरत से जना गया बच्चा जो की मै हूं, आलोचनात्मक और दर्द भरी मुस्कान के साथ किशोर बोला।

पूरी भीड़ यह बातचीत सुनकर निस्तब्ध निरूत्तर खडी थी जबकि थोड़ी दूरी पर "मोलकी" अपनी बहुप्रतीक्षित जीत पर मंद मंद मुस्कुरा रही थी।

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शशिवेन्द्र "शशि"

SHASHIVENDRA SHAHI

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गुरुवार, 10 नवंबर 2022

जीउतिया

 जीउतिया

जीवित्पुत्रिका व्रत में मां निर्जल व्रत रखकर संतान की लंबी आयु एवं स्वस्थ, समृद्ध जीवन की कामना करती हैं। इसे मध्य पूर्व भारत मे "जीउतिया" के नाम से जाना जाता है। बल्लभ की मां हर साल श्रद्धापूर्वक यह व्रत करती थीं। बड़ी मान और मनौतियों के बाद इकलौता पुत्र पैदा हुआ, बचपन से ही उसकी इच्छा सेना मे जाने की थी हालांकि माता का विरोध था लेकिन इकलौता पुत्र अपनी आकाक्षांए पूरी करवा कर ही लेता हैं। 

भर्ती रैली मे बल्लभ भी चयनित हुये। पिता तो समझते थे कि जीवन मृत्यु तो विधाता के हाथ मे हैं लेकिन मातृभूमि की सेवा सबसे बड़ा पुण्य हैं। वो बड़े खुश थे पर मां इन बातों को नही समझती और बड़ी अनिच्छा से प्रशिक्षण पर जाते पुत्र को विदा किया था।


जोशीले बल्लभ ने कड़े प्रशिक्षण हेतु खुद को तैयार किया और सफलतापूर्वक प्रशिक्षण पूरा कर भारत चीन सीमा पर तैनात हुए थे।

पठारी क्षेत्र की प्रतिकूल जलवायु के बावजूद सैन्य खान पान और अनुशासित शैली से स्वास्थ्य ठीक था। 1962 के बाद से अब तक चीन से हमारी सरकार के संबंध औसत ही रहें अचानक जब पिछले कुछ वर्षों मे सीमा पर चीनी सक्रियता बढ़ गई है तो सैन्य टकराव के आसार बढ़ने लगे। अतः परिणामस्वरूप भारत सरकार ने सीमा पर चौकसी बढ़ा दी सीमा का स्थायी रेखांकन न होना भी टकराव के मुख्य कारणों मे से एक था।

लद्दाख की एक चौकी "तेनांगसा" पर 20 जवानों की एक सैन्य टुकड़ी तैनात थी।



रात के लगभग दो बजे होगें, एक सिपाही अभय बोला दो तीन दिनो से चीनी पक्ष मे कोई हरकत नही है बिल्कुल शांत हैं, पता नही लौट गये क्या?

शायद उन्हे समझ आ गया है की पडोसियों से मिलकर रहने मे ही भलाई है दूसरे सिपाही गोतराम ने कहा।

नही जवान, चीनी दुश्मन और पहाड़ी नदी का कभी भरोसा नहीं करना, मुत्थू उस्ताद अपनी टूटी फूटी हिन्दी में बोला

(फौज मे जवान टुकड़ी मे अपने वरिष्ठ सिपाही को उस्ताद बोलते हैं)

एक सीमित हंसी के बाद पहरे वाले जवानों के अतिरिक्त बाकि सब थोड़ी झपकी लेने लगे, करीब आधे घंटे बाद हुई चहल पहल से उनकी नींद टूटी और सामने नदी पार कर 50 से ज्यादा चीनी आते दिखाई दिए।

यह इनके हाथों मे क्या है किसी ने धीरे से कहा, हथियार?

नही अरे नही, जवान मेहरसिंह ने फिर समझाते हुए कहा

सीमा समझौते मे हथियार साथ न रखने की बाध्यता है।

फिर हल्की रौशनी मे देख पाना भी मुश्किल हो रहा था।

थोड़ा नजदीक आने पर पता चला डंडे और राॅड है।

मुत्थू नफरी का उस्ताद था झट रेडियो पर पड़ोसी टुकड़ी को इत्तला दी गई इतनी देर मे चीनी और नजदीक आ गये।

मुत्थू अंग्रेजी का जानकार था दो सैनिको को साथ ले बात करने को आगे बढ़ा पर चीनी सैनिक ने आव देखा न ताव और बिना एक भी शब्द बोले प्रहार कर दिया।

एक डंडा मुत्थू के सिर पर लगा वो वहीं जमीन पर गिर गया बाकी भारतीय सैनिक अब नहीं रूक सकते थे। चीनियों पर टूट पड़े पर अब संख्या और कम रह गई जबकि चीनी पचास से ज्यादा थे और डंडो से लैस।

अरे देख क्या रहे हो मारों इन्हें, गोतराम ने गाली देते हुए ललकारा फिर क्या हिन्दुस्तानी जवान चीनियों पर वीरभद्र की भांति टूट पड़े।



इन चीनियों की इतनी औकात मेहरसिंह दहाड़ा, हर भारतीय सिपाही 4-5 चीनियों से जूझ रहा था। कुछ को नीचे बहती नदी मे फेंका गया किसी की गर्दन तोड़ी गई बल्लभ के कबड्डी और कुश्ती वाले दांव भरपूर काम आये। 

एक चीनी की गर्दन पर लात रख दी दो को कांख मे दबा लिया, खाते पीते घर का अकेला लड़का चाल चलन से भी ठीक और बजरंगी की भांति शक्तिशाली पट्ठे ने दर्जन भर से ज्यादा दुश्मनों को लपेट दिया पर संख्या मे अधिक चीनियों ने भी खूब उत्पात काटा। थोड़ी ही देर बाद सारे चीनी खामोश कर दिए गये और बल्लभ को मिलाकर भारतीय पक्ष से भी मात्र तीन लोग बचे थे। चोट और थकान से मूर्छित होकर जमीन पर पड़े जवानों की मदद को दूसरी नफरी पहुंच चुकी थी। घायल तीनो जवानों को तुरंत अस्पताल भेजा गया और शहीदों के शवों को मुख्यालय ले जाने का इंतजाम किया गया।



मां अगले दिन सुध बुध खोयी सी अस्पताल के अंदर पहुंची जहां घायल बल्लभ सोया हुआ था मां ने जीउतबंधन बाबा का धागा उसके माथे पर रख दिया। 

रोते हुए बोली "हमरे बच्चा के रक्षा जीउतबंधन बाबा करिहें" संघर्ष वाली रात की शाम को ही जीवित्पुत्रिका व्रत मे बरियार वृक्ष पूजकर आयी थी। उसमें ईश्वर से प्रार्थना की थी

हे बर, हे बरियार जाके भगवान श्री रामचंद्र जी से कहो, बल्लभ के माई "जीउतिया" व्रत रखी हैं

#Ssps96 

 शशिवेन्द्र "शशि"

बुधवार, 9 नवंबर 2022

व्यथा

 व्यथा

अंजू की खांसी रूकने का नाम न ले रही थी छोटी बहन मंजू ने दवा पिलाई पर बेअसर कोई फ़ायदा नहीं। कल भी दिन भर खांसती रही यह रोग का आखिरी चरण हैं। डाक्टर ने भी घर पर ही रखने की सलाह दी है।

लाला अमरपाल के दो बेटियों मे मंजू छोटी थी जन्म के समय ही मां के गुजर जाने के बाद जब से होश संभाला बड़ी बहन अंजू ही उसकी देखभाल करती रही थी। 

लाला व्यापार के चक्कर मे हफ्तों बाहर रहते थे तब दोनो बहनें एक दूसरे का सहारा बन दिन गुजारती थीं।

समय बीता अंजू की शादी हुई शैलेन्द्र बड़े हंसमुख और खुशमिजाज थे खूब ठिठोली करते थे। बेटे बेटियों से भरे पूरे इस खुशहाल परिवार मे बस मां की कमी झलकती थी उनकी याद बरबस आंखे नम कर जाया करती। जब लाला की भी आंखे भर जाती तो अंजू संभालती बाबा पुरूष भी कहीं रोया करते है रोने पर तो महिलाओं का एकाधिकार हैं इस ठिठोली से सब हंस पडते। लेकिन जबसे अंजू को फेफड़े के कैंसर का पता चला है पूरे घर की हंसी गायब हो गई है। रही सही कसर आज शैलेन्द्र की मां के फोन ने पूरी कर दी। बहुत बुरा भला कहा, निष्ठुर कह रहीं थी कि बीमार लड़की से शादी करा दी, भला ऐसा कोई कैसे कह सकता है। उसे क्या पता पिता को किस कद़र अजीज होती हैं बेटियां और भला ये परमात्मा को क्या हो गया है। हमारे हिस्से मे सिर्फ घोर दुख और अपनों का विछोह ही लिखा हैं। 

ऐसा भी कहीं होता है क्या कोई अपनी बेटी को कैंसर जैसी बीमारी से.... यह बोलकर लाला फफक कर रो पड़े थे अचानक कमरे मे से अंजू की कराहती आवाज आयी बाबा पुरूष भी कहीं....


हां हां चल मै रो थोड़े रहा हूं, लाला झट आंसू पोछते हुए उसके कमरे की तरफ भागे। एक बहादुर योद्धा की तरह उसके सामने खड़े हो गये। उसने क्षण भर देखा और कहा बाबा शर्त लगा लो रो रहे थे आप। इस कला में विधाता ने स्त्री को एकाधिकार दिया है मां और बेटी के तौर पर दोनो ही समान रूप से अपने पुत्र और पिता के गूढ़तम मनोभावों को ताड़ जाती हैं। पुरूष इन दोनो से ही अपनी भावनाएं नहीं छिपा सकता हैं।

मां जी क्या कह रही थी बाबा?

अब तो लाला का मन चीत्कार उठा एक बच्चे  की भांति जोर जोर से रोने लगे। अंजू ने अपना बायां हाथ सिर झुकाए पिता के कंधे पर रखा "ठीक ही तो है बाबा उनका इकलौते लड़के का जीवन अधर मे हैं हर मां ऐसा ही सोचती हैं मुझे भी तो अपने बच्चों की ही चिंता हैं"। लाला के मन में सैकड़ो प्रश्न थे उससे लड़ने का जी करता था सामान्य दिन होते तो भयंकर तर्क और तकरार होती पर आज, वो भी अपनी ही बिटिया से जो कुछ दिनों की..  खैर, आंसू पोछ कर आगे बढ़ लिए।

उसने फिर टोका, बाबा बताओ तो क्या  कह रही थीं?

लाला टालना चाहते थे पर उसकी जिद के आगे विवश थे। गहरा दर्द उस धधकती आग की तरह है जो फौलाद को भी आकार बदलने पर मजबूर कर देती है इसी तरह लाला एक ही सांस मे पूरी बात बोल गये,

बोले उसकी मां अपने बेटे की जिन्दगी खराब करने का मुआवज़ा चाहती हैं वो चाहती है तेरी बहन शैलेंद्र से शादी करले। बच्चों का वास्ता दे रही है अंजू मौन हो गयी उसे एक हिचकी सी आई और आंखे खुली रह गई थी लाला जोर से चीखे लेकिन प्राणपंछी अंतिम प्रयाण को निकल चुका था।

अंत्येष्टि के क्रिया कर्म की समाप्ति के बाद पुनः शैलेन्द्र  की मां आ धमकी लाला सिर पर हाथ रखे किंकर्तव्यविमूढ़ बैठे थे। समधन ने लाला से पूछा बताओ कौन करेगा इन बच्चों की देखभाल ।

मै और आप तो टूटे डाल के पंछी आज गिरे या कल कोई ठिकाना नहीं फिर इनका ठौर क्या रहेगा कौन थामेगा इनका हाथ।



मैं थामूंगी अब मेरी जिम्मेदारी हैं ये, बातें बढता देख मंजू कमरे से बाहर आयी, आरोप प्रत्यारोप का दौर रूक गया। उसके इस आश्वासन पर सभी खुश थे सभी को उसके मुख पर हर्ष प्रतीत हुआ जबकि पिता की चिंता अंजू के चेहरे की हल्की मुस्कान के पीछे छिपी "व्यथा" 

#Ssps96


सोमवार, 7 नवंबर 2022

मानववाद

असी पंजाबी ते तुस्सी कौन? 

कपूर साब के लिए यह पसंदीदा डायलॉग था। उनका पूरा नाम जसवंत कपूर था। अमृतसर के एक गाँव से आये थे पिता अंग्रेजो की सेना मे थे तो घर का अनुशासन कड़ा रहा। वहीं से शिक्षा पूरी करने के बाद एक सरकारी महकमें मे ही पोस्टिंग हो गयी पर ट्रांस्फर सरकारी नौकरी मे होने वाला एक भयानक हादसा हैं। दुर्भाग्य से यही इनके साथ भी हुआ और वे शीघ्र  ही दिल्ली भेज दिए गये। दिल्ली के सरस्वती विहार मे एक अपार्टमेंट् खरीद कर सैटल होना पड़ा। 

जब से होश संभाला था एक ही ख्वाहिश थी आस्ट्रेलिया जाने की हालांकि खुद तो कभी अवसर नही मिला बस यह सपना अपनी इकलौती बेटी गोल्डी पर लाद दिया। सारी पुस्तैनी जायदाद और जीवनभर की कमाई जोड़कर बेटी को पढ़ने भेज दिया। 

सरकारी सेवा से रिटायर होने के बाद अपनी रेजीडेंशियल सोसाइटी के अध्यक्ष चुन लिए गये। अब सोसाइटीज के चुनाव ठहरे पक्षपात से भरे हुए और इनमे हर तरह के दांव तो चले ही जाते हैं, मसलन क्षेत्रवाद, भाषावाद, जातिवाद। कपूर साब भी इससे अछूते नही रहे बल्कि उनकी मान्यता और प्रबल हो गयी थी कि जैसे भारत के पश्चिमी सीमा की रक्षा हेतु इस प्रदेश ने सबसे ज्यादा बलिदान दिए हैं अतः पूरे भारत को यहां के निवासियों को सर्वोच्चता का सम्मान एक टैक्स की भांति देना चाहिए। समय के साथ उनका यह क्षेत्रीय अहंकार बढ़ता गया और अब तो ऐसे पारखी हो चले थे कि सामने वाले के बात करने के लहजे से झट उसका जन्म और पालन पोषण का स्थान तक बता देते थे।

इस बार भी सोसाइटीज के चुनाव घोषित थे पर मुसीबत थी प्रतिद्वंदी राम प्रकाश जो की उत्तर प्रदेश से था। उसने बोली भाषा और क्षेत्रीय समानता दिखा कर सारे मध्य और पूरब भारत से आये सोसाइटी रेजिडेंट्स को अपनी तरफ मिला रखा हैं। पाजी अलग ही तरीके से नमस्कार करता है जाने किस ग्रह की भाषा मे दांत निपोरकर बात करता हैं।

कपूर साब को चुनाव से पहले ही नतीजों का पता था लेकिन हथियार क्यूं डाला जायें जो होगा देखा जायेगा, अंत तक लडेंगे चुनाव मे फैसला तो वोट ही करते हैं



दोपहर तक ही मतदान के नतीजे आ गये कपूर साब चुनाव हार गये। पिछले कई वर्षों से "आर डब्ल्यू ए" के अध्यक्ष रहे अब रिटायर भी हो चुके थे खालीपन उस कांटे की तरह होता है जो अंदर ही अंदर चुभता रहता है अब पूरा दिन घर मे ही बीतने लगा कुछ दिन तक तो ठीक चला लेकिन धीरे धीरे अब कुढ होने लगी थी बात बात पर गुस्सा हो जाते। कोई कामवाली बाई हफ्ते भर से ज्यादा ना टिकती या तो छोड़ देती या भगा देते थे।

गोल्डी को पढाई पूरी करने के बाद नौकरी मिल गई थी और वो अगले महीने आ रही हैं खबर यहां तक तो ठीक थी लेकिन उसने शादी कर ली हैं।

कब और किससे ? कपूर साब ने चौंक कर पूछा

लड़का साफ्टवेयर इंजीनियर है, बिहार से है उसका नाम अमित झा।



अंतिम शब्दों ने जैसे कपूर साब पर बिजली गिरा दी हो फोन कट कर दिया था, समझ नही आ रहा था
 क्या करेंगे कैसे, किस किस को समझायेंगे

नाती नातिन कैसे दिखेंगे

क्या बोलेंगे कैसे बोलेंगे

हमारी बेटी तो गोरी सुन्दर है वो जरूर सांवला होगा कैसे अपने मे  मिलायेंगे।

साथ के कितने लोगो पर क्या क्या कटाक्ष नही किया था शर्मा की बेटी ने जब शादी की थी तो बहाने से उनके घर का पानी तक छोड़ दिया था।

इसी उधेड़बुन मे लगे रहे पूरी रात नींद नही आयी थोड़ी देर के लिए आयी तब तक सुबह हो चली थीं बाल्कनी मे आकर खड़े हुए सामने पार्क मे रामप्रकाश और कुछ लोग योग कर रहे थे।

अचानक रामप्रकाश से नजर मिली उसने अभिवादन किया कपूर साब ने भी हाथ उठा कर उत्तर दिया। उसने नीचे आने का इशारा किया झट चप्पल पहनी नीचे चले गये बिना किसी अंतर्विरोध के।

वहां और लोग भी थे उनके साथ थोड़ी देर तक बाते हुई लौटने तक कपूर साब के मन के सारे वाद मिट चुके थे सिर्फ एक बच रहा था "मानववाद"

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शशिवेन्द्र "शशि"

उत्पीड़न:- रफा दफ़ा

जब शहर मे मोहन की क्लर्क के तौर पर नौकरी लगी तो उन्होने अपने बचपन के मित्र नेवास को नगर निगम मे नौकरी दिलाकर उनके इस अहसान चुकाया था। घर के इकलौते मोहन दशको पहले जब नौकरी की तलाश मे इस शहर में आये तो उनकी बूढी मां समेत खेतों और पशुओं की देखभाल करते थे नेवास। शादी ब्याह से लेकर तीज त्यौहार तक सब कुछ मे भाग लेते थे दोनो के परिवार, यहां पराये शहर मे दोनो ही एक दूसरे के असल संबंधी थे हालांकि यह रिश्तों का नही वरन नेह का नाता था।

गांव मे मोहन का दूध का पैतृक व्यवसाय था जो उनकी पीढियों से यह काम जमाया गया था जबकि नेवास गांव के अनुसूचित जाति से थे। शहर मे मां की अंत्येष्टि के बाद जब मोहन ने तीर-धनुष लिया तो उनको किसी और को छूना आदि निषेध था तब नेवास ने घर के दूसरे मुखिया के तौर पर सहयोग किया और जब निवास की पत्नी गर्भ से थी तो मोहन की बीबी ने जेठानी के तौर पर सारा भार अपने कंधे पर ले लिया। दिन राजी खुशी बीतते जा रहे थे दोनो के ही एक एक बेटे थे जो बड़े हो चले थे। निवास का बेटा अनिरुद्ध कॉलेज मे शिक्षक के तौर पर भर्ती हुआ था अच्छी तनख्वाह मिली तो चलने के लिए एक मोटर कार ले आया नौसिखिए को अभी तीसरा दिन ही था स्कूल मे गाड़ी से जाने का प्रभाव भी अलग वापस लौटते हुए मोहन के बेटे आर्यन के जिम के आगे खडी कुछ गाडियो को ठोक दिया। नौजवान खून उपर से ग्राहको का रिपेयर के लिए पैसे मांगने का दबाव होने पर आर्यन अकारण हुए इस नुकसान से आग बबूला हो गया उसने अनिरुद्ध को खूब खरी खोटी सुनाई, अपराध बोध मे घबराया घर का इकलौता अनिरुद्ध ऐसी बातें सुनने का आदी न था उपर से शिक्षकपद के सम्मान को धक्का लगने का अंदेशा और सरेआम हुई बेइज्जती वो बर्दाश्त न कर पाया।

तैश मे भरकर बोला कितना पैसा हुआ बता, अभी दे देता हूं।

आर्यन भी गुस्से मे भर गया था सोचा इसे अब छोटे बड़े का लिहाज भी नही रहा जरूर इसे सबक सिखाना पड़ेगा, उसने जोर से अनिरुद्ध का कालर पकड़ कर आगे की तरफ खींच लिया और दोनों में हाथापाई शुरू हो गया थी शोर सुनकर भीड़ जुट गई ज्यों मीठेपन से चींटिया बरबस  खींची चली आती है।

टकराव बढ़ा तो जिम् वाले आर्यन और उसके साथियों ने कोमल काया वाले मास्टर जी को बुरी पीट दिया। अनिरुद्ध किसी तरह से जान बचाकर भागा और थोडी दूर जाकर अपने तथाकथित जातीय व्हाटसप ग्रुप के एक नेता को मदद के लिए फोन किया। दरअसल नेता जी बड़े परोपकारी थे पहली मुलाकात मे ही सहयोग का वादा किया था। बोले जाति के किसी व्यक्ति पर होने वाले अत्याचार पर पीछे नही हटेंगे चाहे सर क्यूं न कटाना पड़े।थोड़ी देर मे ही जिम के बाहर भीषण संघर्ष शुरू हो गया कहीं कांच टूटा किसी को चोटें आयीं। गुस्साई भीड़ ने कार और जिम को भी नही बख्शा नजदीकी रेहड़ी खोमचेवालों पर भी जमकर गुस्सा उतारा गया।

मामला थाने पहुंचा विरोधी को ठीक से सबक सिखाने का प्रण किये अनिरुद्ध को नेता जी की सलाह पर हरिजन उत्पीडन एक्ट बिल्कुल सही दांव लगा।

नेता ने थाने की सेटिंग की और मात्र 50हजार मे ही आर्यन सलाखों के पीछे। जरूर नेता ने बड़ी सिफारिश की थी अन्यथा दारोगा ने 2 लाख रूपये की मांग की थी।

इतनी ही देर में दूसरे पक्ष के लोग भी आ गये जमकर नारेबाजी शुरू हुई परन्तु जिन्दाबाद मुर्दाबाद के नारों के बीच भी लोगो का सहयोगात्मक रवैया बना रहा कोई व्यक्ति किसी भी पक्ष से नारे लगा लेता था आवाज कम होने पर सामूहिक नारेबाजी होती थी। इस जीत के तुरंत बाद आयोजन हेतु नेता के सुझाए ठिकाने पर मुर्ग और दारू की दावत दी गई, खर्चा पहली बार शराब चखे अनिरुद्ध के माथे आया तक़रीबन 50 हजार और देने मे ही निपटान हो पाया। इंसान अपमान और सम्मान खातिर कभी भी धन की परवाह नही करता सीमा से बाहर जाकर खर्च करता है।

देर रात खबर मिली तो नेवास को साथ ले मोहन थाने पहुंचे, थानेदार की मिन्नते, मान मनौवल सब बेअसर क्यूंकि अब तो जमानत कोर्ट से ही मिलेगी और यह रात तो कैदी की जेल में हीं बीतेगी।

यहां अनिरुद्ध का मोबाइल भी बंद आ रहा था दोनो वहीं थाने के कैम्पस मे ही बेंच पर बैठे रहे जैसे इन दोनो के जन्म पर अस्पताल परिसर मे बैठना पड़ा था।

सुबह जमानत के कागज तैयार हुए दोनो अपमानित युवक अपने अपने घर पहुंचे अपना निर्दोष होना और दूसरे का सारा दोष नमक मिर्च लगाकर बताया। माता का हृदय वात्सल्य की आग पर सहस्रों गुना तेजी से पिघलता है फिर वो गलत सही सब कुछ बहा ले जाता है। बरसों का प्रेम, सहयोग, समर्पण और एक दूसरे की खातिर रतजगे सब कुछ भूलकर दोनो महिलाओं मे खूब झगड़ा हुआ एक दूसरे को नीचा दिखाने हेतु दोनो ने अपनी अपनी सास और गांव से दी गई सूचनाओं का भी जमकर प्रयोग किया। जातिगत टिप्पणी, पुरखों के काम काज आदि कुछ भी शेष नही बचा। इस बीच मुहल्ले वालों को भी खूब मसाला मिला तीन दशकों से परिवार की तरह रहने वालों मे टकराव का सुख भला कौन जाने देगा।

इधर डीएस पी कार्यालय के बाहर दोनो बुजुर्ग चुप बैठे थे समय बिताने के लिए बीडी सुलगा सुलगा कर अपनी झुंझलाहट को मिटने की कोशिश कर रहे थे 

हालांकि साहब तो आज सुबह 10 बजे ही आ जाते है लेकिन नौसरिया चौकी पर एक जातीय संघर्ष हो गया है जिसमें अनुसूचित जाति के एक लड़के को बहुत मारा गया है। वह अस्पताल मे जिंदगी और मौत से जूझ रहा है। पहले साहब उसी के परिवार से मिलेंगे, सिपाही ने कहा था।

कहीं आप जिम वाले झगड़े की बात तो नही कर रहे :- नेवास ने टोका

हां वही, क्या हुआ था सुना हमारी जाति के लड़के को बहुत मारा है (सिपाही ने खैनी रगडते हुए कहा)

नहीं साहब, दो चचेरे भाइयों मे झगड़ा हुआ गलती से वे दोनों मूर्ख थाने आ पहुंचे :-मोहन ने समझाते हुए कहा

इतनी देर मे रौबदार अंदाज मे काला चश्मा लगाए डीएस पी जतनसिंह आ गये थे। आते ही उन्होंने दोनों को अपने सामने बुलाया

हमारा कोई उत्पीड़न नही हुआ है साहेब, यह तो एक घरेलु झगड़ा है जिसको हम बरसो से ऐसे ही आपस मे बात चीत से ही सुलझा लिया करते हैं आप को कष्ट हुआ हमें माफ करें ( नेवास ने हाथ जोड़कर डी एस पी से निवेदन करते हुए कहा)

कृप्या इसे यही खत्म करें दोनो मित्र हाथ जोड़कर बोले, सिंह साहब प्रोन्नति से आये तजुर्बे वाले अधिकारी थे उन्हें हर दौर का असल तजुर्बा  था वो झट सारा माजरा समझ गये। तत्काल उन्होने सबके लिए चाय मंगाई अपने दौर की कुछ पुरानी बातें शुरू हुई और हंसी के कहकहे के साथ केस रफा दफा हो गया।

ट्विटर #Ssps96 

:- शशिवेन्द्र "शशि" 

रविवार, 6 नवंबर 2022

अधूरा वादा: संस्मरण

"भरारा" स्टेशन पर गाड़ी आज थोड़ी ज्यादा देर तक रूकी, नीलेश खिड़की से अपने गांव जाने वाले रास्ते को निहार रहा था। नरकट और सरपत के झुरमुटों से ढकी पगडण्डी और हल्की हवा से हिलते पत्ते जैसे सिर हिला हिला कर उसको विदा कर रहे हों

बरसों पहले पिता जी वहीं एक छोटी सी गुमटी पर इंतजार करते हुए मिलते थे, कुर्ता पाजामा पहने, पान से लाल होंठ मुस्कराते हुए, चरण स्पर्श करने के बाद वहां जुटे लोगों का अभिवादन और फिर बाप बेटे अपनी पुरानी बुलेट पर गांव तक उस पगडण्डी का 4 कोस का सफर लचकते हिलते डुलते पूरा करते थे, पहुंचने तक सांझ हो जाती थी, गाड़ी से उतरते ही ओसारे मे लालटेन जलाती मां दीखती पर घर मे घुसने से पहले कुल देवी को प्रणाम करके ही आगे बढ़ना होता था, मां आगे बढ़कर आंचल से ढक कर ढेरों आशीर्वाद देते हुए अंदर ले जाती थी।

बातें शुरू होती तो खाते-पीते, सोने तक खूब बातें पिछली पुरानी, विस्मृत, शरारती, ठिठोली खत्म ही न होने वाली पर पिता जी के सामने गंभीरतापूर्वक फिर जाने कब नींद आ जाती और सुबह नींद खुलती तब तक पूरा गांव जग जाता था।

पूरे घर मे उत्सव का माहौल रहता बाहर से मित्र और संबंधी भी मिलने आते थे, कुशल क्षेम के साथ ही दावत पर भी बुलाया जाना लेकिन इतने दिनो तक शहर का खाना फिर मां के हाथ के खाने का मौका कौन छोड़ दे।

सीधे मना भी नही कर सकते सो रोज मां को दो तीन लोगो के लिए अतिरिक्त खाना बनाना पडता था।

मां खुश रहती थीं, पूरा घर पुलकित रहता था लेकिन न जाने क्यूं छुटटियों के दिन जल्दी बीत जाते और लौटने की तैयारी शुरू हो जाती अभी तो ठीक से बातें भी ख़त्म नही हुई, वहां मंदिर मे जाना था, मामा के घर भी जाना है।

मां अबकी बार कैसे होगा लेकिन अगली बार जब आउंगा तब जरूर चलेंगे, यही अधूरा वादा हर बार करके नीलेश लौटता था मां चुप रह जाती थीं। अब जबकि बहुत कुछ बदल गया, ना पिता जी रहे ना ही वो गुमटी, रह गया तो सिर्फ नीलेश का बहुप्रतीक्षित वादा, वो भी आधा, अधूरा, अपूर्ण..........

ट्विटर #Ssps96

 :-शशिवेन्द्र "शशि"



मुहावरेदार:- बंदर 🐒 क्या जाने अदरक का स्वाद

मुहावरेदार:- बंदर 🐒 क्या जाने अदरक का स्वाद शुक्रवार की बाजार मे थैले और जेब का भरसक संतुलन बनाने का प्रयास करते हुए मैं अगली ...