दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम् |
सकलगुणनिधानं वानराणामधीशम्
रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि ||
शशिवेंद्र 'शशि' एक लेखक और विचारक हैं जो लगभग दो दशकों से शिक्षण, अनुसंधान और लेखन के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। अपने लेखन के माध्यम से वह भारतीय समाज की परंपराओं और रुढ़ियों की जटिलताओं में गहराई से जाते हैं। वह जाति प्रणाली और असमानताओं की आलोचना करते हैं और सांस्कृतिक न्याय और समानता के लिए मजबूती से वकालत करते हैं। शशि समानता और सुलभ न्याय के लिए वकालत करते हैं, साथ ही साथ महान सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाते हैं। ट्विटर: @Shashivendra84 सोशल मीडिया हैशटैग: #Ssps96
हे पूज्य धरा भारतभूमि प्रीति पूर्ण अभिनंदन है
निज माटी का अभिमान हमे ये माथे का चंदन है
किरदार बदलना पडता निज कर्तव्य निभाने को
सौ जीवन भी कम है इसका मोल चुकाने को।
रंचक नहीं डिगेंगे मां सर्वस्व समर्पित करने मे
यशो:लभस्व रहेगा ही जीवन जीने या मरने में
जीवन तो क्षणभंगुर है उसको अमर करेंगे हम
बलिदानी परिपाटी को उर से आज वरेंगे हम।
तेरी श्यामल काया मे अब इंच नही घटने देंगे
पुर्जा पुर्जा कट जायेंगे पर देश नहीं बंटने देंगे
बंटवारे के लंगूरों को ऐसा सबक सिखायेंगे
पीडादायक सबकों से वे चिल्लायेंगे थर्रायेंगे।
शिखंडी महाभारत का एक ऐसा योद्धा था जिसने राजा द्रुपद के घर जन्म लिया था। वह अग्निजन्मा बहन द्रौपदी और धृष्टद्युम्न का अग्रज था।
परिचय:- एक कथा के अनुसार वह काशी की राजकुमारी अम्बा थी जिसने गंगापुत्र भीष्म से अपनेअपमान का बदला लेने के लिए जन्म लिया था। यही कारण था कि भीष्म उसे कभी पुरूष नही मानते थे
अपने संकल्प की वीर पुरूष कभी नारी के समक्ष हथियार नही उठाते इसके अनुसार भीष्म ने शिखंडी के सामने भी हथियार रख दिए और फिर उसी रथ पर सवार अर्जुन ने भीष्म की छाती बाणों से छलनी कर दिया था।
भीष्म को इच्छा मृत्यु का वरदान था इस वरदान का धनी व्यक्ति किसी भी अवस्था मे सिर्फ अपनी इच्छानुसार ही मर सकता है।
आधुनिक युग मे छिपे हुए शिखंडी जो कायरता का प्रतीक है अपने प्रतिशोध के लिए अनुचित साधनों का प्रयोग करते हैं यही से यह कविता प्रारंभ होती है
अतुलित योद्धा, संकल्पित योगी ही क्षितिज को साधेगा।
ध्रुव सा अटल रहे सदा ही उसे विपदा में क्या बाधेगा।
आर्यावर्त का रूद्र आठवां बस अपनों से ही हारेगा।
छोड़ शिखंडी अहं को अपने तू क्या भीष्म को मारेगा।।01
वंशीधर परशुधर हलधर हर कोई उससे हारा होगा
जीतेगा जो इन सबसे वो अंतिम अपनो से ही हारेगा
छोड़ शिखंडी अहं को अपने तू क्या भीष्म को मारेगा।।02
युद्धक्षेत्र मे युद्धघोष से वीरों का अतुल बल जागेगा
उसके सन्मुख कौरव पांडव कोई याद ना आयेगा
एक अमर सुरसरि का बेटा मर स्वीकारा जायेगा
छोड़ शिखंडी अहं को अपने तू क्या भीष्म को मारेगा।।03
शिखंडी को संदेश :- भीष्म अजेय है अमर है उन्हे हराने का प्रयास निरर्थक है
भीष्म शब्द है एक विचार जो शपथ बनाया जाता है
जीवन मे सांसो की समिधा से उसे निभाया जाता है
विधि के वश मे नही रहा अब ऐसा वीर न आयेगा
छोड़ शिखंडी अहं को अपने तू क्या भीष्म को मारेगा।।04
आदेशित कर कालचक्र की दुर्धरता को विवश किया
ऐसा परम तपस्वी साधक जीवन सहज बितायेगा
छोड़ शिखंडी अहं को अपने तू क्या भीष्म को मारेगा।।05
जो अनंत बाजू मे बांधे कालगति से सहज चले
उसकी अनथक यात्रा मे धरती से अंबर हिले मिले
धरती के जीवित ध्रुव को कहां टाल तू पायेगा
छोड़ शिखंडी अहं को अपने तू क्या भीष्म को मारेगा।।06
उपसंहार:- यह एक विचारणीय प्रश्न है कि क्या कोई एक शिखंडी जो स्वयं रीढ़विहीन है और अपनी कायरता और छदमता से किसी वीर और पुरूषार्थी को मार सकता है?
क्या उसे समाप्त कर सकता है?
नही बिल्कुल नही!!!
भौतिक शरीर तो नश्वर है परंतु कीर्ति अमर रहती है और समय के समानान्तर चलती रहती है।
https://en.wikipedia.org/wiki/Shikhandi#:~:text=Shikhandi%2C%20whose%20natal%20female%20identity,causing%20the%20death%20of%20Bhishma.
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प्रश्न 1:- शिखंडी का पूर्व जन्म मे क्या नाम था
उत्तर:-
प्रश्न 2:- शिखंडी के पूर्व जन्म मे प्रेमी का क्या नाम था और वह किस राज्य के राजा थे ?
उत्तर:-
प्रश्न 3:- भीष्म का पूर्ववर्ती नाम क्या था और उनका नाम भीष्म क्यों पड़ा?
उत्तर:-
प्रश्न 4:-भीष्म के पिता का क्या नाम था?
उत्तर:-
*आपके प्रश्न भी आमंत्रित हैं
सुबह के चार बजे थे कि छत्तीसगढ के सीमांत जनपद का विधनू जंगल गोलियों की तडतडाहट से गूंज उठा था। कमांडेंट विभा सोरांव के नेतृत्व मे केन्द्रीय रिजर्व बल की यह टुकड़ी नक्सल आपरेशन पर थी। नक्सलियों से मुठभेड मे दोनो तरफ से फायरिंग चलते हुए काफी समय बीत गया था। अब सूरज दो लट्ठ उपर आसमान मे चढ़ आया था।
इस मुठभेड़ मे अब तक कितने नक्सली हताहत हुए कुछ पता नही पर सुरक्षाबलों के दो जवान गंभीर तौर पर घायल हो चुके थे। दुश्मनों की हरेक गोली विभा के हौसले को दोगुना कर देती थी। चारो तरफ से घिरे नक्सलियों के पास जब गोला बारूद खत्म होने लगा तो भागने के दुस्साहसिक प्रयास मे उन्हे मार गिराया गया।अंतिम नक्सली के कंधे पर विभा की गोली लगी और वो जमीन पर गिरा कराहने लगा। विभा दौड़कर उस तक पहुंची घायल नक्सली कराहता जा रहा था। जीत की खुशी मे डूबी विभा को अचानक उस कराहती आवाज ने गम के सागर मे डूबो दिया उसकी सारी खुशी गम मे बदल गई थी। कराहने वाली की आवाज मद्धम हो रही थी और विभा की धड़कनें तेज होती जा रही थी। ये वही है, उसने झट घुटनों के बल बैठ कर असित के चेहरे से नकाब हटाया था।
वो रो पड़ी। सुरक्षाबलों की मदद से सभी घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया। आपरेशन के बाद अभी तक असित को होश नही आया था। विभा उसके वार्ड का राउंड लगाकर आयी तो उसे यकीन नही हो रहा था कि दशकों से वो जिसका इंतजार कर रही थी वो इस हाल मे मिलेगा। वो बार बार खुद को कोसती जा रही थी, काश आखिरी गोली न चलाई होती। ऐसा कैसे हो सकता है, यूपीएससी की परीक्षा पास करने वाला इंसान नौकरी ज्वाइन ना करके नक्सलवाद का समर्थक कैसे हो गया? उसे यकीन नही हो पा रहा था।
उसे अब भी यूनिवर्सिटी की कैंटीन का वो कोना याद था जहां एक शर्मीला लड़का अकेले बैठा रहता था। यहां तक की उसे प्रेम का प्रस्ताव भी विभा ने स्वयं ही दिया था।
पर हां असित बहुत भावुक था, भेदभाव को बिल्कुल बर्दाश्त नही करता था इस मसले पर तो कितना आगबबूला हो जाता था वो।
वो खयालों मे खोयी ही थी की इंस्पेक्टर ने बताया कि असित को होश आ गया है। विभा अंदर वार्ड मे गयी बड़ी बड़ी आंखो और सुन्दर केश विन्यास वाला असित अब कितनी झुर्रियां थी उसके चेहरे पर अधपके बाल और आंखो मे अंतहीन बेचारगी भी।
नही तुम ये नही हो सकते तुम तो तथागत थे अंगुलीमाल कैसे बन गये, तुमसे किसी का अपमान तक होते नही देखा जाता था अब तुम हत्यारे कैसे हो सकते हो। खुद को असहज होता देख विभा बोली उसकी आंखो से आंसू बहने लगे थे।
असित भी कुछ बोलना चाह तो रहा था पर शारीरिक कमजोरी से उसके बोल ना निकले। बेबसी में आंसु निकल पड़े थे। दूसरों के बहकावे मे बहुत कर ली मनमानी पर अब नही, अब मुझे मेरा अधिकार चाहिए जो बरसों पहले अनायास मुझसे छीन लिया गया था, विभा दूसरे हाथ से अपने आंसू पोछते बोल पडी थी। उसके हाथों में अपना हाथ देता असित चुप लेटा था आंखो से अश्रुधार बहती ही जा रही थी उसमें पश्चात, प्रेम, विछोह सब साथ मिश्रित थे।
असित ने यह कभी नही सोचा था विभा उसकी इस भाँति प्रतीक्षा करेगी। उसे बहुत सी बातों का पश्चाताप था पर विभा के प्रति हुआ अन्याय उनमे सबसे भारी लग रहा था।
अस्पताल के वार्ड मे खड़ी विभा उसे प्रत्यक्ष "तथागत" लगी जो उस अंगुलीमाल का जीवन उद्धार कर रही थी।
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:- शशिवेन्द्र "शशि"
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दीन दयाल विरिद संभारी हरहू नाथ मम् संकट भारी।।
पुजारी जी ने इस चौपाई के साथ आज शाम के कीर्तन पर विराम लगाया था। सभा अब विसर्जित हो चुकी थी "एकादशी कब है पंडित जी" केशव भगत घुटने पर हाथ लगा कर उठते हुए बोले।
क्यो, भगत व्रत रखोगे क्या? पुजारी ने ठिठोली करते पूछा
"हां सोच रहा हूं, जबसे बुढिया गई है कोई व्रत त्यौहार नही मना है" भगत बोले
"सब राम जी की इच्छा है भगत" पुजारी ने एकादशी तिथि बताते हुए कहा
वैसे तो पुजारी और केशव भगत दोनो ही अपने घर मे अकेले थे। यदा कदा खाना भी साथ मे बना लेते थे।
आज पता नही क्यूं भगत को भूख नही लगी थी सो हल्की रात मे थोड़ा थोड़ा टहलने निकल पड़े थे। धीरे धीरे गांव से बाहर अपने खेतों की ओर निकल पड़े। ट्यूबवेल के पास एक चबूतरा बना रखा थोड़ी थकान लगी बस वही चबूतरे पर लेट गये मंद मंद बयार मे हल्की सी झपकी आ गई।
प्रेम की मां कह रही है आ जाओ रोटी खा लो लेकिन भगत आज पूरा खेत एक ही सांस मे जोत लेना चाहते थे। कल ही नया ट्रैक्टर जो लाये थे, गृहस्थ बड़ी मिन्नतों और संयम के बाद कुछ खरीद पाता है और जब बात ट्रैक्टर जैसे बड़े सौदे की हो फिर तो उत्साह चौगुना होता है। तब ट्रैक्टर ट्राली जोडकर पूरे मोहल्ले को बगही के मेला मे ले गये थे। नई साडी मे प्रेम की महतारी बडी चितभावन लग रही थी। केशव के हृदय मे रह रह कर उमंग उठ रही थी तब प्रेम तीन बरस का था।
अहा विधाता हो, क्या दिन थे। दर्द और पश्चाताप पिघल कर उनकी आंखो से द्रव रूप मे निकल पड़ा था। आंखे खोलने का मन नही हो रहा था। वहीं से पुरानी यादों मे चित्त खो गया रात गहराने के साथ ही नींद भी गहरी होती गयी। बड़ी देर तक यादों के समंदर मे गोते लगाते हुए भगत अचानक एक औरत के जल्दी जल्दी चलने की आवाज से सिहर गये थे; आधी रात मे कौन है भगत पांव दबाये उस आवाज की तरफ चल पड़े थे।
तब तक दो अलग आवाजें सुनाई दी, "हम यहां से कहीं दूर चल पडेंगे लेकिन अपने बच्चे को यहां न छोडूंगी" युवती बोली।
"तो क्या अनबयाही किसी बच्चे को साथ रखेगी कुलक्षिनी" दूसरी औरत बोली थी।
यह सुनकर भगत सारा माजरा समझ गये थे। एक नवजात बच्चे की आवाज सुनाई दे रही थी और यही उसके जीवन को समाप्त करने का वाद विवाद भी चल रहा था की एक पुरुष चीखा "मान जा नही तो तुझे भी यही दफन कर देंगे"।
"हमारी नाक पहले ही कटा चुकी हैं" उसने डपटते हुए कहा था
युवती बोली मै इसे लेकर कहीं और चली जाउंगी आप दोनो लोगो से कह देना मै मर गई। आप पर कोई लांछन नही आयेगा। युवती ने तर्क देते हुए विनती की थी। इस समय वह नवजात दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह अपनी जननी की गोद मे था। पुरूष ने गुस्से मे कहा "इसका बाप तो गांव छोड़कर भाग गया है और उसका बाप उल्टे हमे पुलिस केस मे फंसाने की धमकी दे रहा है।
दूसरी औरत रोने लगी थी पुरूष ने धमकाया चुप रह ये मैल मिटाने दे।
वह उस नवजात की तरफ बढ़ा ही था कि केशव झट कूदकर उनके बीच आ गया और उसकी लाठी पकड ली थी।
दोनो गुत्थम गुत्था थे पर नौजवान केशव मे खूब दम खम था उसने जोर लगाकर धम नीचे पटक दिया था। दूसरी औरत पीछे से केशव को मार रही थी पर केशव ने मजबूती से धर रखा था। इतनी देर मे वह जोर से चिल्ला पड़ा तो गांव से लोग लाठी डंडा लेकर दौड़ पड़े थे। सभी को पकडकर गांव मे लाया गया। यह लोग दूर किसी गाँव से आये थे। तय हुआ कल दिन के उजाले मे पंचायत मे फैसला होगा। गांव के बीच पीपल के तले बड़े बुजुर्ग बैठे। चर्चा शुरू हुई लडकी का परिवार उसके बच्चे को अपनाने को कत्तई तैयार नही था और लडकी भी अपने बच्चे को छोड़ने को तैयार नही थी। पंचो के समक्ष यह अजीबोगरीब समस्या थी। कोई समाधान होता ना देख लडकी के मां बाप अपने घर लौट गये साथ ही लड़की से नाता भी तोड़कर गये अब उसके पास क्या रास्ता था। पंचो ने उसकी इच्छा जानने के लिए पूछा।
लड़की ने हाथ जोड़कर कहा " पंचो जीवन बचाने वाला देवता होता है और प्राणों का स्वामी भी, मेरा जीवन तो किसी और के छल से नष्ट हो चुका है अब यदि मुझे आश्रय मिले तो बड़ा उपकार होगा, यह कह उसने अपना सिर पंचो के समक्ष जमीन पर झुका दिया था।
नौजवान केशव को लड़की की बातों ने खूब प्रभावित किया था उसने स्वयं पहल किया और लड़की ने सहर्ष उसे अपने जीवन स्वामी के रूप में स्वीकार कर लिया था। अपने जीवन की इस सच्चाई को दोहराते जब तक भगत की नींद खुलती आसमान मे हल्का उजाला हो चुका था।
:-शशिवेन्द्र "शशि"
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मुहावरेदार:- बंदर 🐒 क्या जाने अदरक का स्वाद शुक्रवार की बाजार मे थैले और जेब का भरसक संतुलन बनाने का प्रयास करते हुए मैं अगली ...