शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

ताकि जीवन बचा रहे

ताकि जीवन बचा रहे
वृक्ष लगाओ तन्मयता से
नव पीढ़ी पर्यावरण बचाये
अपनी पूरी क्षमता से।।1
कैसा कठिन रहेगा जीवन
गर नदिया मे पानी ना हो
कैसे गुजर करोगे प्यारे
घर मे रखा अन्न भी ना हो।।2

कौवा बुलबुल मोर हंस और
बगुले क्या तुम्हे नही रिझाते
पेड़ो पर बेठे बंदर क्या 
दांत दिखा न तुम्हे चिढ़ाते।।3

कैसा दुर्दिन होगा सोचो
आंगन मे गौरैया ना आए
कितना नीरस होगा बोलो
वृक्षों पर कोयल ना गाये।।4

चीतल खरहा हिरन भालू 
मरे पड़े क्या देख सकोगे
पुरखों ने जो तुमको सौंपा
उससे बुरा इतिहास लिखोगे।।5
इसे मिटाओ आगे बढ़कर
पर्यावरण बचाओ भाई
समझ बूझकर भेज रहा
"ओजोन दिवस" की तुम्हे बधाई।।6
:- शशिवेन्द्र "शशि"



गुरुवार, 7 सितंबर 2023

दरख्त से बना घर

जिस पेड़ की शाखों से मेरा आलीशान मकां बना है
उस दरख्त का मेरे घर के दरवाजे पर आना मना है।।


तो दूर गांव से ही अपनी दुआ के असर भेजती है मां
नये घर की इस मालकिन से मेरी मां का तनी तना है।।

हम अपने पुराने घर मे जैसे चाहते हैं वैसे रह लेते हैं
अम्मा के आंचल जैसा वो अब भी छोटा नही पड़ता।।

शहर की आलीशां कोठी मे बोझ है और घुटन भी है
दिल लगाकर बनाया जरूर है पर अंजानी कमी सी है।।

जगाने को घर में अलार्म है पर वो मजा नही आता
दरवाजे को बुहारते हुए कहां अब कोई है जगाता।।

न भाई बहनों की तकिए की तकरार, न जंग होती है
नही लड़ता है छुटका अब न ही मुनिया ही रोती है।।

अब तो आगे सोने को छुटकू की जिद भी न होती
कितने बदले है रिश्ते जरूरतें और खासकर हम

मनाना भी नही पड़ता उसे चंदा को मामा बता करके
न ही वो जिद करता है कभी फोन पर आ करके।।

दीवाली मे हुई थी बात अब परसों होली भी आ गई
कहां रोजाना फोन कर किसी को परेशां करे कोई।।

शायद यह अदब़, यह शऊर सीखा है मैने शह़र से
बेवजह बिना बात क्यूं किसी का वक्त बर्बाद करें।।

बचपन मे बदनाम लोगों को सुनता देखता था मैं
फलां की बेरूखी के किस्से को गौर से गुनता था मैं।।

मेरी छुटपन की बुद्धि तब फ़ैसला कर नही पाती
कैसे मां को अलग रखकर जिन्दगी जी हैं जाती।।

बड़ा होकर समझा हूं दुनियादारी के ये घने दांव
मैने भी है आजमाया मां को अलग रखने का रोग।।

सिमट गये हैं रिश्ते ये जिंदगी या हम इंसा बदले हैं
बदलते दौर मे सब कुछ बदल तरक्की को चले हैं।।

संवाद:- रिश्तों को निभाने मे हम अपने पूर्वजों से बहुत पीछे हैं। यकीं मानिए लंबा चौड़ा और भरा पूरा परिवार एक वरदान की तरह होता है। जड़ों से जुड़े रहिए 
इस कविता मे लिखी गई बातें मेरे निजी जीवन से भले ही ताल्लुक न रखती हों लेकिन एक लेखक के तौर पर समाज में इस तरह का अपभ्रंश मैं नियमित तौर पर देख रहा हूं। आप सभी भी रिश्तों मे आये इस तरह के अवमूल्यन को देखते होंगे।

बुधवार, 6 सितंबर 2023

वक्त:- रेतीली नदी

उजले बालों को देखकर ये ख्याल आता है
जहां मे मुस्ससलल क्या है वक्त के सिवा
गुमां बेकार है दौर को अपना बताने का
वक्त की दरिया मे बह जाते है सब निशां।।1

जिनका हुकुक कायम कभी अहले वतन में
दो गज़ मिट्टी मयस्सर नही उसे क़ब्रे दफ़न में
उम्र भी तो मुट्ठीभर रेत ही कहते हो साहेब
नही ये कम बीते जो जिन्दगी चैन ओ अमन से।।2

लिखने बैठो तो सब दुशवारिया टूट पड़ती हैं
किसी ने यादों की बाल्टी सिर पे उलट दी है
छुटपन के वो वादे इरादे अब भी याद आते हैं
आम की डाली पकड़ कसमें जो हम खाते थे।।3

खो गये वो मेरे दोस्त या सयाने हो बदल गये
मेरे मुहल्ले के वो सारे सामियाने भी जल गये
गली कच्ची रही नही तो लड़के कंचे खेले कैसे
तरक्की ने शायद उनकी ये खुशियां लूट ली है।।4


दौर बदलेगा, कल मेरा तो आज तुम्हारा होगा
बड़ी शिद्दत से हर दौर के कुछ सानी भी होंगे
पर्दा गिरा तो उनके किरदार भी बदल जायेंगे
इस उठापटक मे एक मशविरा ग़र तुम मानो।।5

संजो लेना उसे जेहन मे जो ख़ुशनुमा गुजारा है
जब कभी भी बैठोगे इस रेतीली नदी के किनारे
और उठाओगे इसकी रेत को पानी समझ़कर के
फिसल जायेगी यह, फिसलना इसकी फितरत में है।।6

शुक्रवार, 12 मई 2023

प्रेमचंद:- युगदृष्टा लेखक


बनारस जिले के सुदूर गांव के खेतों मे पककर तैयार हुई अपने डंठल से लटकती गेहूं की बाली जब हवा के हल्के झोंके पर हिलती है तो उसकी खनखनाहट कथा सम्राट प्रेमचंद की मधुर याद को मिश्रित करती हुई दूर तक जाती हैं मानो सुन्दर कथाओं में निज वर्णन किये जाने हेतु उस अद्भुत कथाकार का आभार प्रकट कर रही हों।

सुबह खेत की मेड़ों पर पड़ी ओस जब नंगे पैरों मे छोटे छोटे तिनके संग लटपटाती हैं, दरवाजे पर बंधी पछाही गाय आज भी जब रंभाती है या बाबूजी की पीढ़ी का कोई बड़ा बुजुर्ग लकड़ी वाली पुरानी कुर्सी पर बैठकर अपनी पढ़ाई के समय की बातें साझा करता है तो इस वार्ता मे प्रेमचंद की प्रासंगिकता स्वयं परिलक्षित होने लगती हैं।


[1] प्रेमचंद महज एक कथाकार नही थे वरन् आधुनिक हिन्दी जगत की एक संपूर्ण प्रेरक प्रणाली थे। जिनके अलग अलग रूप उनकी रचनाओं मे प्रदर्शित होते रहते हैं।लेखक के तौर पर वह बड़ी संजीदगी से समाज मे व्याप्त कुरीतियों पर प्रहार करते थे। उनकी रचनायें पढ़कर नजरअंदाज कर पाना किंचित भी संभव नही था। जिस प्रकार उत्तम चरित्र के लोग उन्हे यूं पढते जैसे उनकी ही प्रशंसा की जा रही है तो ठीक इसके विपरीत कामी खल और दोषी उन्हे पढ़कर लजाते भी हैं जैसे अगली कृति उनको ही धिक्कारने के लिए लिखी गई हो।

[2] एक युगदृष्टा के तौर पर आने वाले समय के गुण दोषों का भी उनको खूब ज्ञान था। जैसे गोदान उपन्यास में हुए दो प्रेम विवाहों में गोबर और झुनिया तथा मातादीन और सिलिया अलग-अलग जाति के जरूर है। जहां मातादीन ब्राह्मण है जो तथाकथित जाति व्यवस्था में ऊपर जबकि सिलिया चमार वर्ण व्यवस्था में नीचे है। उस दौर में ऐसे उदाहरण मजबूत और क्रांतिकारी लेखन की झलक प्रस्तुत करते है। ऐसे आंदोलनकारी झलक को आज के समाज में भी देखा जा सकता है।

[3] आलोचक:- व्यंग्य उनका सबसे बड़ा और अचूक हथियार था जिस प्रकार एक लुहार लोहे को पिघलाकर उसपर हथौड़े की चोट करता है ठीक वैसे ही समाज की बेढंगे रीति रिवाज़ पर प्रेमचंद का प्रहार चलता रहता था

पंच परमेश्वर की बूढी खाला की दुर्दशा का वर्णन करते हुए

"जब तक दानपत्र की रजिस्ट्री न हुई थी, तब तक खालाजान का खूब आदर-सत्कार किया गया; उन्हें खूब स्वादिष्ट पदार्थ खिलाये गये। हलवे-पुलाव की वर्षा- सी की गयी; पर रजिस्ट्री की मोहर ने इन खातिरदारियों पर भी मानों मुहर लगा दी। जुम्मन की पत्नी करीमन रोटियों के साथ कड़वी बातों के कुछ तेज, तीखे सालन भी देने लगी। जुम्मन शेख भी निठुर हो गये। अब बेचारी खालाजान को प्राय: नित्य ही ऐसी बातें सुननी पड़ती थी।

बुढ़िया न जाने कब तक जियेगी। दो-तीन बीघे ऊसर क्या दे दिया, मानों मोल ले लिया है ! बघारी दाल के बिना रोटियॉँ नहीं उतरतीं ! जितना रुपया इसके पेट में झोंक चुके, उतने से तो अब तक गॉँव मोल ले लेते"

[4] एक शिक्षक के तौर पर प्रस्तुत उनकी रचनाये न्याय नीति और संबंधो के स्वस्थ निर्वहन की वकालत करती हैं। "पंच परमेश्वर" के अपमानित जुम्मन शेख जब पंच चुने जाते हैं तो

"अपने उत्तरदायित्व का ज्ञान बहुधा हमारे संकुचित व्यवहारों का सुधारक होता है। जब हम राह भूल कर भटकने लगते हैं तब यही ज्ञान हमारा विश्वसनीय पथ-प्रदर्शक बन जाता है।

पत्र-संपादक अपनी शांति कुटी में बैठा हुआ कितनी धृष्टता और स्वतंत्रता के साथ अपनी प्रबल लेखनी से मंत्रिमंडल पर आक्रमण करता है: परंतु ऐसे अवसर आते हैं, जब वह स्वयं मंत्रिमंडल में सम्मिलित होता है। मंडल के भवन में पग धरते ही उसकी लेखनी कितनी मर्मज्ञ, कितनी विचारशील, कितनी न्याय-परायण हो जाती है। इसका कारण उत्तर-दायित्व का ज्ञान है। नवयुवक युवावस्था में कितना उद्दंड रहता है। माता-पिता उसकी ओर से कितने चितिति रहते है! वे उसे कुल-कलंक समझते हैंपरन्तु थौड़ी हीी समय में परिवार का बौझ सिर पर पड़ते ही वह अव्यवस्थित-चित्त उन्मत्त युवक कितना धैर्यशील, कैसा शांतचित्त हो जाता है, यह भी उत्तरदायित्व के ज्ञान का फल  है"

[5] परिवारिक व्यक्ति के तौर पर ऐसी गहन विचारशीलता जो चार वर्ष के हामिद से ऐसा घना जिम्मेदारी का दृष्टांत प्रस्तुत कराती है जो बड़े सख्त दिल वालों की भी आंखों में आंसू ला दे

"अमीना ने छाती पीट ली. यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया न पिया. लाया क्या, चिमटा!

सारे मेले में तुझे और कोई चीज़ न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया ?

हामिद ने अपराधी भाव से कहा,‘तुम्हारी उंगलियां तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैंने इसे लिया.’

बुढ़िया का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है. यह मूक स्नेह था, ख़ूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ. बच्चे में कितना त्याग, कितना ‍सद्‌भाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना जब्त इससे हुआ कैसे? वहां भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही. अमीना का मन गद्‌गद्‌ हो गया"

[6] उनके साहित्य में मानवीय पक्ष बड़ा ही सबल है। इसमें मानवीय संवेदनाओ, मूल्यों और जुड़ाव का ऐसा ताना बाना मिलता है जो बरबस ही पाठक को आनंद के समुद्र मे गोते लगाने के लिए स्वतंत्र करता है। कभी भावुकता का चरमोत्कर्ष तो कभी दुख का पारावार पर यथार्थ और कल्पना का संतुलन इतना जबरदस्त की पाठक देर तक उसकी गूढ़ता का मौज लेता रहे। गांभीर्यता ऐसी की पात्र के साथ पाठक भी अवाक् की यह क्या ही हो गया। "मंत्र" के भगत का वर्णन करते हुए

"बूढ़ा कई मिनट तक मूर्ति की भांति निश्चल खड़ा रहा. संसार में ऐसे मनुष्य भी होते हैं, जो अपने आमोद-प्रमोद के आगे किसी की जान की भी परवाह नहीं करते, शायद इसका उसे अब भी विश्वास न आता था. सभ्य संसार इतना निर्मम, इतना कठोर है, इसका ऐसा मर्मभेदी अनुभव अब तक न हुआ था. वह उन पुराने जमाने की जीवों में था, जो लगी हुई आग को बुझाने, मुर्दे को कंधा देने, किसी के छप्पर को उठाने और किसी कलह को शांत करने के लिए सदैव तैयार रहते थे. जब तक बूढ़े को मोटर दिखाई दी, वह खड़ा टकटकी लगाए उस ओर ताकता रहा. शायद उसे अब भी डॉक्टर साहब के लौट आने की आशा थी"

[7] गृहस्थ के रूप में एक संन्यासी की भांति प्रेमचंद ने अपने व्यक्तिगत जीवन को सदैव मूल्यपरक श्रेष्ठता के साथ जिया। लगातार आने वाली बाधाओं के बावजूद वह कभी भी अपने पथ से डिगे नही बल्कि एकनिष्ठ हो लेखन मे लगे रहे। दायित्वबोध एवं अकिंचन भाव का उत्कृष्ट समन्वय उनके लेखों मे झलकता रहता हैं 

"मंत्र" कहानी का एक प्रसंग हैं

"भगत के लिए यह जीवन में पहला अवसर था कि ऐसा समाचार पा कर वह बैठा रह गया हो. अस्सी वर्ष के जीवन में ऐसा कभी न हुआ था कि सांप की ख़बर पाकर वह दौड़ न गया हो. माघ-पूस की अंधेरी रात, चैत-बैसाख की धूप और लू, सावन-भादों की चढ़ी हुई नदी और नाले, किसी की उसने कभी परवाह न की. वह तुरन्त घर से निकल पड़ता था—नि:स्वार्थ, निष्काम! लेन-देन का विचार कभी दिल में आया नहीं. यह सा काम ही न था. जान का मूल्य कौन दे सकता है? यह एक पुण्य-कार्य था. सैकड़ों निराशों को उसके मंत्रों ने जीवन-दान दे दिया था"

[8] तत्कालीन स्त्री विमर्श में औपनिवेशिक काल के भारतीय समाज मे स्त्रियों की दशा चिंतनीय थी। प्रेमचंद के प्रेरक लेखन से स्त्री विमर्श को व्यापक स्तर पर एक नई दिशा प्राप्त हुई। दहेज की कुरीति पर प्रहार करते अपने उपन्यास "निर्मला" मे उन्होने एक पिता की चिंताओ पर लिखा 

"बाबू उदयभानुलाल थे तो वकील, पर संचय करना न जानते थे. दहेज उनके सामने कठिन समस्या थी. इसलिए जब वर के पिता ने स्वयं कह दिया कि मुझे दहेज की परवाह नहीं, तो मानों उन्हें आँखें मिल गई. डरते थे, न जाने किस-किस के सामने हाथ फैलाना पड़े, दो-तीन महाजनों को ठीक कर रखा था. उनका अनुमान था कि हाथ रोकने पर भी बीस हजार से कम खर्च न होंगे. यह आश्वासन पाकर वे ख़ुशी के मारे फूले न समाये"

[9] प्रेमचंद का दलित विमर्श:- उनके साहित्य मे समाज के निचले तबके शोषित वंचित वर्ग के लिए विशेष स्थान दिखता है। प्रत्येक पीडित और कमज़ोर के प्रति स्नेह उनके लेखन प्रस्फुटित होता है जबकि शोषण-दमन के विरूद्ध क्रोध कलम के ही जरिए परंतु बहुत ही तन्मयता के साथ प्रवाहित होती है और इसका प्रमुख माध्यम है व्यंग्य, जैसे गोदान मे कर्ज और शोषण के जाल मे फंसे एक किसान के संघर्ष और उसके अंत की कहानी  

"पंडित जी भोजन कर रहे थे, पर कौर मुँह में फँसा हुआ जान पड़ता था। आखिर बिना दिल का बोझ हल्का किए, भोजन करना कठिन हो गया। बोले - अगर रुपए न दिए, तो ऐसी खबर लूँगा कि याद करेंगे। उनकी चोटी मेरे हाथ में है। गाँव के लोग झूठी खबर नहीं दे सकते। सच्ची खबर देते तो उनकी जान निकलती है, झूठी खबर क्या देंगे"


इस प्रकार प्रेमचंद समग्र रूप से पीडित और उत्पीड़क दोनो ही वर्ग को साधते हुए एक आदर्श समाज का दृश्य प्रस्तुत करते हैं। उनकी रचनाओं की प्रासंगिकता आरंभ से ही उच्चस्तरीय है जबकि आधुनिक दौर मे वह दिनों दिन सत्य होती प्रतीत हो रही हैं।

शशिवेन्द्र "शशि"

#Ssps96

#hindistories #hindi #stories #hindistory #hindipoetry #hindiwriting #hindimotivation #poetry #story #love #hindipoems #hindilines #storytelling #hindiwriter #hindikavita #hindiquotes #writer #writersofinstagram #hindikahaniya #hindishayari #india #motivation #kahani #hindipoem #hindikahani #instagram #kahaniya #moralstories #hindiwriters #life

रविवार, 23 अप्रैल 2023

मरूस्थल का दिरहम



खेतों से गेहूं कट चुका था तेज चौमुखिया हवा पेड़ पौधों के सिर यूं हिला रही थी मानो वो स्कूल का हेडमास्टर छोटी बच्चियों की गुंथी हुई चोटियों पर हल्की सी धौल लगाता मुस्कुराकर आगे चला जा रहा हो। उसकी इस हरकत से देर तक बच्चियां खिलखिलाती रही हों। सूरज लट्ठ भर उपर आसमान मे चढ़ आया था लेकिन उसकी गर्मी जरा भी महसूस न हो रही।आसमान मे बादलों के टुकड़े जो मौसम को यदा कदा सुहावना बना रहे थे। मनोज अपने घर से कुछ दूर आगे बढ़ा तो गांव से खेतों की ओर बाहर जाने वाली पगडंडी पर लगी भीड़ देख उधर को बढ़ चला। भीड़ के अंदर घुसता आगे चला आया तो देखा भीड़ दम साधे थोड़ी दूरी पर एक गेहुवन सांप को देख रही है। वह अपनी गर्दन उठाये पूरे क्षेत्र का मुआयना कर रहा था। गर्वीला काला सांप अपना शरीर पूरी क्षमता से तान कर यूं लग रहा हो जैसे तक्षक नाग का ही अवतार हो। उसके क्रिया कलापों मे कहीं भी रत्तीभर भय का आभास नही था बल्कि कुछ फरलांग दूरी से पर उसकी फुंफकार से देखने वालों के बदन मे सिहरन पैदा हो जाती थी।
कोई उसे कालिया नाग बताता जिसके माथे पर श्रीकृष्ण के खड़ाऊ के निशान है तो कोई नागराज भीड़ मे तो सभी अपनी चलाते है। किसी के पास दूसरे को मानने से ज्यादा अपनी बात मनवाने के तर्क ज्यादा थे। मनोज देर तक यही गप्प सुनता रहा थोड़ी देर मे सांप तो चला गया पर अपने पीछे कई दिनों का एक मुद्दा छोड़ गया। दोपहर होने को आ गई लेकिन चर्चा खत्म न हुई थी। वहीं पेड़ के नीचे बैठे चर्चा सुनते मनोज की आंख लग आई थी। जब आंख खुली तो उसके पिता रामसनेही कांधे पर गमछा डाले उसे तेज आवाज मे उलाहना दे रहे थे और घर भेज रहे थे। मनोज चुप उठा और घर की ओर चल पड़ा। दरअसल इकलौते बेटे का निठल्लापन पिता को वैसे ही अखरता है जैसे शिकारी की एकल आखिरी गोली भी निशाना चूक जाये। 

लौट आया चिराग

मनोज ने किसी तरह ग्यारहवीं तक पढाई की थी बारहवीं का बोर्ड न पास कर सके तीसरी बार मे हथियार डालकर तौबा कर लिया। आखिर बड़े बड़े लोगों के पास क्या डिग्री है जो अरबपति और खरबपति बने हुए हैं पैसे के लिए पढ़ाई जरूरी नही वो तो नौकरी की जरूरत है। चाकर बनने के लिए पढ़ो हम तो इतना पैसा कमायेंगे कि आस पास दस पचास गांव मे किसी पर नही होगा।

मनोज की घर पे खूब सम्मान था घर का इकलौता चिराग जो था सभी उसकी नींद सोते जागते थे। मां तो उसकी खातिर एक पैर पर रहती उसकी सारी ख्वाहिशें पूरी करती उसकी चले तो चांद भी ला कर रख देती लेकिन पिता को दुनिया की कठोरता का भान था उन्होने देख रखा था पैसा नही होने पर लोग कदम कदम पर अपमानित होते हैं। वह हमेशा चिंतित रहते थे खूब समझाते पर मनोज पर जैसे कोई असर ही नही होता। वो एक कान से सुनता दूसरे से निकाल देता। समय बीतता गया और शादी ब्याह की बातें चलने लगी लेकिन पुश्तैनी सम्पत्ति पर लड़के को दहेज भले मिल जाये पर सम्मान नही मिल पाता हैं। दो तीन शादियां आयीं और सारी बातें हो जाने के बाद भी कुछ दिन बाद बताने का कहकर गये फिर कोई बात आगे न बढ़ पायी। अब शादी के लिए आने वालों के प्रति मनोज के मन मे एक आशंका सी हो गई थी एक तो लड़की के पिता ने सबके सामने ही बड़ी कटु बात कह दिया मामला हाथापाई तक पहुंच गया था। अपने दरवाजे की बात न होती तो आज तो मनोज क्या कर गुजरता लेकिन मामा और पिता ने बीच बचाव कर लिया। अंत में मामा और पिता के बीच भी झगड़ा हो गया आखिर मामा की ही अगुवाई मे यह शादी आयी थी।

नये संबंधो का श्रीगणेश

मनोज को निठल्ला कहना पिता के मन को ये बात नागवार गुजरी थी और उन्होने भी आज पहली बार मनोज के तरफ से रिश्ते के लिए आये लोगों को खूब बुरा भला कहा था यहीं से बात बिगड़ी तो मामा बीच बचाव मे कूदे तो पिता ने उन्हें भी रपट दिया था। कैसे भननाते भुनभुनाते भागे थे मामा। लेकिन इसका खामियाजा ये हुआ की और कोई ढंग का रिश्ता नही आया । अंत मे थक हारकर समस्या की जड़ को समझा गया और, परिवार के तीनो सदस्यों की एकमत राय बनी की मनोज की नौकरी लग जाये तो शादी हो जायेगी। अब शादी छोड़ नौकरी की बात चलायी जाने लगी पिता ने कितने जानने वालों से निहोरा किया पर हरेक जगह बात नही बनती जहां बनती वहां मनोज का मन नही लगता। कहीं कही तो पैसे भी देने पड़े थे पर कुछ भी बनता ना देख खुद का व्यापार आगे बढ़ाने का प्रयास किया लेकिन मेहनत और अनुशासन के बिना व्यापार मे भी तरक्की कहां है। अब कोई और रास्ता ना देख पिता पुत्र बड़े परेशान थे।

नौकरी और अकूत पैसा कमाने की ऐसी जरूरत इंसान को बाहर देश मे जाकर अवसर तलाशने को प्रेरित करती है। पड़ोस के गांव का ही एक व्यक्ति पैसे लेकर खाड़ी देशों मे नौकरी लगवाता है और वहां रूपये तो चलते ही नही बल्कि दिरहम चलता है। खाना पीना सब फ्री है दूध दही की नदियां बहती हैं और सोना चांदी हीरे जवाहरात सब बहुत सस्ता भी है। बस फिर क्या अब तो मनोज को वहीं जाना था। इकलौता लड़का परदेश जायेगा यह सुनकर मां बाप का कलेजा मुंह को आ गया लेकिन उसकी जिद के आगे एक न चली। आखिर खेत गिरवी रखकर दलाल को पैसे दिए गये यह तय हुआ जब मनोज पैसे भेजेगा तो पहले खेत ही छुड़ायेगें।



अंजाना बंधन

सब कुछ ठीक ठाक रहा और मनोज कुछ दिनों मे ही अरब की धरती पर पहुंच गया। वहां जिस फैक्ट्री मे काम की बात तय हुई थी वहां अचानक कोई वैकेंसी न होने की वजह से नौकरी न लग पायी। बाहर मुल्क मे इतना खर्चा होता है खाली बैठे तो कौन खिलायेगा कुछ दिन के ना नुकुर के बाद एक शेख के यहां भेड़ों को चराने का काम मिला। दूर रेगिस्तान के किनारे जो हरियाली थी उसमे भेड़ों को रखा गया था। पहले भेड़ों की देखभाल मे चार लोग रहते थे अब धीरे धीरे सिर्फ दो लोग रह गये थे मनोज उनमे से एक था। एक बार कुछ भेड़ें कही से गिनती मे कम पड़ रही थी तो शेख ने मनोज के साथी की चमड़ी उधेड़ दी हंटर से पीटा था। अब तो डर से रात में भी भेड़ों की गिनती बराबर आती थी।

मोल-की :- (एक अनिर्णीत निर्णय की खूबसूरत कहानी)

कभी कोई भेड़ ब्या जाती तो उसके बच्चे को टोकरे मे लाद कर सिर पर रखकर चलना पड़ता था। खाड़ी देश मे काम करने का ये सुख मनोज रो रोकर उठाता था और अपनी तनख्वाह सीधे पिता के पास भेजता रहता था।

धीरे धीरे मनोज अपना नसीब समझ चुका था और उससे समझौता भी करने लगा था। सूखे प्रदेश मे ताड़ के पेड़ के नीचे बैठा मनोज सामने से गर्म आती हवा को अपने चेहरे पर महसूस कर रहा था। तेज धूप से रैत मे बनती मरीचिका सामने बरसते पानी का अहसास हो रहा था।

वहां बैठे मनोज यह सोच रहा था अपने खेत मे कुदाल चलाने के बजाय ये दिरहम का लालच उसे इतनी दूर मरूस्थल में खींचकर ले आया ।


शशिवेन्द्र "शशि"

SHASHIVENDRA SHASHI

हमारे साथ जुड़े

#Ssps96

#travel

#socialmedia 

#bedtimestories 

#google 

#fun 

#goodstory 

#consciousliving 

#higherconsciousness 

#storiestotell 

#positivity 

#positivestories 

#story 

#positivequotes 

#bestofstories 

#moralvalues 

#positivevibe 

#morality 

#higherawareness 

#moralofthestory 

#bestofeverything 

#truthbetold 

#higherself 

#laugh 

#moralsandvalues

#community 

#posts 

शनिवार, 22 अप्रैल 2023

बस अब बस करो:-

किसी परिवार की पुश्तैैनी इज्जत को बनाए रखने के लिए उस परिवार के सभी सदस्य जिम्मेदार होते है।
इस जिम्मेदारी को सभी सदस्य सतर्कता से निभाएं इसी क्रम मे एक पात्र दूसरे पात्र को समझा रहा है:- 

अवसर भरी दुनिया मे बेपरवाह सोये हो
माना बाप के गुजरने पर बेइंतहा रोये हो
गुजर फिर भी तो करना ही पडेगा बोलो
बेजां इस दारू के नशे मे क्यों खोये हो।01

लडखड़ाने से अपनी साख को बट्टा लगता है
दरकती घर दीवार का न ईंट कंकड़ बचता है
यही कर्ज चुकाया तुने बाप के अहसानों का
जो उनके नाम से था जीता वह तुमपे हंसता है।।02

ये आखिर हुआ कैसे मुझे कुछ तो समझाओ
मेरे भाई बिरादर मेरे, आओ मेरे करीब आओ
घर के छोटे हो तुम तो दर्द भी छोटा ही होगा
हुई बहुत बेजा जगहंसाई ना अब कराओ।।03

जिसकी दहलीज पर शराब थी आ नही सकती
नशीली छाया रात क्या दिन मे भी नही दिखती
तुम्हारी हिम्मत थी जो ये मजाल कर गये ऐसे
वर्ना यूं कौड़ियों मे शेर की इज्जत नही बिकती।।04


करो याद हम उस बुलंद हवेली के हिस्से हैं
जिसकी अदावत के अहल रूहानी किस्से हैं
अचानक बहके कैसे तुम सबक भूल आये
हम तुम उस बाप के दोनो हाथों के जैसे हैं।।05

भूलो जो गलत हुआ अब उस पर मिट्टी डालो
निकलो इस कुफ्र से बाहर हमें भी निकालो
तुम्हें शराबी सुनकर हमें अच्छा नही लगता
यूं लगता दिल मे एक धधकता गर्म शोला हो।।06


सोचा कभी क्यों वीरवा अब गुस्से में रहता है
आंगन की मुटरी का गला बातों मे भरता है
कहीं हरकतों से घर का कोना तो न थर्राता
या सदमें मे बैठी मां के देख आंसू सहमता है।।05

मिटेगा आधा ग़र तो हवेली आधी ही बचेगी
जुबानें हर हालात मे इसको जली ही कहेंगी
चलो फेंक दो बोतल कही न ये फेंक दे तुमको
इज्जत घर की मिल्कियत सदा आबाद रहेगी।।07

हो चुका खुद को मिटाना बाकि नही कुछ भी
गुलशन-ए-आशियां का एक खंभा हो तुम भी
इसे गुलज़ार करने का अब तो कोई सबब करो
बड़ा होकर मै जोडूं हाथ बस; अब बस करो।।08

:- शशिवेन्द्र "शशि"
SHASHIVENDRA SHASHI 




मंगलवार, 18 अप्रैल 2023

नये संबंधो का श्रीगणेश



रात का तीसरा पहर और आंखो मे नींद का नामो निशान नही। बस खिड़की से दूर आसमान मे चांद की रौशनी से नहाया पूरा इलाका दूर से चकवे की आवाज कही इस नीरवता को और मधुर बना रही थी। कुसुम अपनी बड़ी बड़ी आंखो मे अपने किसी प्रिय के स्वप्न लिए प्रतीक्षारत यामिनी सी बिस्तर पर अधलेटी सी थी। तकिये पर सिर को टिकाये नेत्र खिड़की से बाहर देख रहे थे। 

यौवन मूर्ति स्त्री मे भगवान अप्रतिम धैर्य भी देता है वह अपने संकेतों से ही अपने मनोभाव को प्रदर्शित करती है न कि शब्दों से।
ठीक वैसे ही कुसुम का भी अपने इस अंजाने प्रिय से अनूठा लगाव था। कहने को तो वो अंजाना परंतु जैसे सबसे ज्यादा जान पहचान उसी से हो। उसके लिए कुछ भी कर गुजरने के भाव पैदा होते पर घर की मर्यादा और लाज के आवरण को पार न करने के प्रति सदैव सचेत भी रहती। इसी उधेडबुन मे रात का चौथा पहर शुरू हो चला था। कुसुम ने थोड़ी थकान महसूस की और वहीं लेटे हुए उसे नीद लग गई। 
सुबह मां की आवाज से जगी तो देखा पापा भी वहीं कमरे मे चाय लिए बैठे हैं। एक हलकी मुस्कुराहट से घर के सभी सदस्यों ने उसके जागने का स्वागत किया।
कुसुम थोड़ी शर्माते हुए वहां से उठकर जाने लगी तो पिता ने टोकते हुए कहा "कुसु आज चाय मैने बनायी है, पी कर देख"
आती हूं पापा कहकर वह जल्दी से चहकती हुई कमरे से बाहर निकल गई।
बिटिया घर की वो गौरैया होती है जो समूचे घर के उदासी के दाने चुनकर प्यार ही प्यार बखेर देती है।
मां ने कनखियों से पापा की तरफ देखते हुए कुसुम को आवाज लगायी "अरे, इलायची वाली चाय बनाई है तेरे पापा ने अपनी लाडो के लिए" बाद के शब्दों को हल्के व्यंग्यात्मक अंदाज मे कहा था।
"वो बाथरूम से बोली आती हूं मां" आवाज मे वही कशिश और शहद सी मीठास। इस आवाज से समूचा घर प्रफुल्लित हो जाता था।
कुछ पलों के लिए माता पिता अतीत की यादों मे खो गये। वर्षों पहले किस तरह उनके जीवन मे रंग भरने एक नन्ही सी परी आई थी। उसने चारो तरफ उनकी इस नन्ही बगिया को ढेरों सुनहले रंगो से इस कद़र भर दिया की घर का जर्रा जर्रा उसकी खूशबू से महकता रहता है। वो कुछ देर के लिए सहेलियों के यहां चली जाये या कालेज चली जाये तो घर मे एक अलग ही माहौल हो जाता था।


पिता थोड़ी थोड़ी देर मे पूछने लगते अरे क्या हुआ कुसु आयी, उससे बात हुई क्या?
मां भी थोड़ी थोड़ी देर मे बात करके बेटी का हाल चाल लेती। अपने बच्चों की परवाह ही प्रत्येक मां बाप को खास बनाती है। छोटी बड़ी हर बात की चिंता से मां बाप अपने बड़े होने का हक भी जनाते हैं।
कुसुम वापस रूम मे आयी तो मां उसकी तरफ देख मुस्कुराते बोली "चाय बड़ी खास है आज की, और यह एक ट्रेनिंग भी है। तुम्हारे पापा का कहना है कि तुम भी ऐसी ही चाय बनाना"।
पापा सरकारी मुलाजिम थे। वह मानते थे कि चाय पर तो बड़े बड़े मसले हल हो जाते है और आज तो बेटी को देखने के लिए कुछ लोग आने वाले हैं।
बेटी की शादी मे उसका बाप खुशी और चिंता, कष्ट और सुख जैसे अनेकों परस्पर विपरीत भावों मे सना होता हैं। एक तरफ अपनी जिम्मेदारी निभाने का गर्व तो दूसरी तरफ अपने कलेजे के टुकड़े से बिछड़ना। जिस घर मे उसके होने से आनंद भरा रहता हो उसके जाने के बाद कैसा लगेगा यहां। दिन भर उसकी बातें उसी से करने की आदत पर अब लगाम लगानी पड़ेगी। यही सब ठानकर पिता अंदर ही अंदर खुद को समझा रहे थे। खुद को सख्त पुरुष होने का अहसास न करने पर स्वयं को आईना दिखा रहे थे। तभी यह मजबूती कहीं दरक सी गई और उनकी आंखो से आंसूओं का रिसाव होने ही वाला था कि खुद को संभालते हुए खांसने के बहाने बाहर निकल आये।
कदाचित पिता ही कन्या के जीवन का वह प्रथम पुरूष होता है जिससे प्रेम की होड़ लगती है। बेटियां पिता को सबसे ज्यादा प्यार करती हैं जबकि पिता इस प्रतियोगिता का विजेता होता है उसके पास लुटाने को अविरल प्रेम होता है।
चाय की चुस्कियों के साथ चर्चा शुरू हुई तो पिता ने धीरे से अपने फोन मे उस घर के होने वाले सबसे खास मेहमान की फेसबुक प्रोफाइल खोल कर मां के हाथ में पकड़ा दिया।

जनाब ने अलग अलग वेश भूषा मे फोटो लगा रखी थी। कही पर्वत पर कहीं झरने मे नहाते तो कहीं रेस्टोरेंट में खाते हुए और सबसे मजेदार की कहीं मुंह बनाते तो कहीं आंखे मिलाते। पहली झलक में तो साहब मजाकिया लग रहे थे पर चेहरे की कटिंग सुन्दर थी और एक अलग गांभीर्य भाव दिख रहा था। एक अलग आकर्षण उनके मुखमंडल पर, कुसुम ने छिप कर देख ही लिया था।
पिता ने कहा "अनंत" नाम है और यहीं विश्वविद्यालय के फिजिक्स विभाग में सहायक प्रोफेसर है।
उन्हें बेटी के संकोच का पूरा भान था अतः मर्यादा का अह्सास करते कुछ काम से मम्मी को भी बाहर ले गये थे। 
अरे वाह रे फिजिक्स तुझे तो मै बड़ी नीरस समझती थी पर तुने ऐसा सरस कहां छिपा रखा था, कुसुम मन मे विचार करती फोटो को निहारती रही।

#यह भी पढ़ें:- लौट आया चिराग

छोटा भाई उसे छेड़ते हुए बोला बहन अभी कुछ दिन तो ये चाय और पी ले फिर तुझसे पैसे लुंगा मैं। अभी तक कुसुम उसे अपनी बातों से करारा जवाब दे चुकी होती पर जाने कहां खोई थी किस सोच मे डूब रही है।

ला मैं भी तो देखूं भाई ने उसके हाथ से फोन लेते हुए कहा। अरे ये बंदर की तरह उकडूं क्यों बैठा है। चिढ़ाते हुए बोला।

इसके पेट मे दर्द है क्या ? आने दे पूछता हूं इससे।

कुसुम को जाने क्यों अनंत के लिए "इससे" जैसा शब्द उचित नही लगा वह फट बोल पड़ी थी "वो बड़े हैं तुमसे आप कहो"

भाई अवाक रह गया। उसे तो बहन के साथ मिलकर अनंत की खिंचाई करनी थी पर वह तो आज विपरीत बातें कर रही हैं। भाई कुछ कहता इससे पहले कुसुम कमरे से बाहर जा चुकी थी। थोड़ी देर मे चाचा चाची आ गये फूआ और मौसी भी पहुंच गये घर में 10-15 लोगों का जमावड़ा लग गया। ग्यारह बजे तक अनंत के परिवार के लोग भी आ गये थे। नाश्ते पानी के बाद बातें शुरू हुई। 

बातें क्रमशः बड़ों की फिर औरतों और बच्चों की, बाद में बागवानी, खेत, गांव,घर यहां तक की घर पर पाले गये कुत्तों की भी खूब चर्चा हुई। फिर अनंत की मां ने कहा तो अब एक बार लड़का लड़की भी आपस मे बातें कर लें। इस बात पर सबकी सहमति बनी और दोनो को उपर वाले कमरे में भेजा गया। कुसुम की मौसेरी बहन साथ गई।

रूकते हिचकते हुए अनंत ने बात शुरू की। औपचारिक बातों के बाद पसंद नापसंद और भी बहुत ढेर सारी बातें। कुसुम को अनंत की बातों का अंदाज बड़ा भा रहा था। दोनो के मन मे एक दूसरे को जानने की उत्सुकता खूब थी। बातें खत्म ही नही हो रही थी पर जल्दी ही नीचे से बुलावा आ गया।

रिश्ता दोनो पक्षों को पसंद आ गया। फिर कुछ देर बाद अनंत का परिवार वहां से विदा लेकर अपने घर के लिए निकल गया।

#यह भी पढ़ें:- अंजाना बंधन

तीन दिन बीत चुके थे दोनो में कोई बात नही हुई थी। कोई फोन काॅल नही पता नही किसी ने नंबर दिया या नही। नंबर तो दिया था पर क्या पता पसंद ना आई हों नही कहने में सकुचाते हों और बस यहां बातें बनाकर चले गये हों।

इसी उधेडबुन मे लगी वो थोड़ी सी दुखी अपनी गलती ढूंढ ही रही थी की अचानक उसके मोबाइल की हल्की घंटी बजी थी और काल कट गई। 

कोई और दिन होता तो शायद इस समय फोन देखती भी नही पर आज तपाक से फोन वापस उसी नंबर पर मिला दिया। उधर से घबरायी हुई सी पर खूब जानी पहचानी आवाज आयी " हैलो मै अनंत बोल रहा हूं, 

कुसुम ने प्यारी सी सहमति दी

फिर धीरे धीरे दोनो में बातें आगे बढ़ने लगी।

"साॅरी वो मै समझ नही पा रहा था फोन करके क्या कहूँगा इसीलिए तीन दिन तक सोचता रहा था"

यह सुनकर कुसुम खिलखिलाती हंसने लगी फिर दोनो तरफ से ही कहकहे लगने लगे। इनकी प्यारी हंसी से दोनो घरों मे आह्लादित सुख और नये जुड़ाव का वास्तविक श्रीगणेश हो चला था।


:-SHASHIVENDRA SHASHI

शशिवेन्द्र "शशि"

#hindilekhan

#hindilinespoetry

#hindilekh

#lekhak

#stories

#hindiline

#lekhakrang

#lekhika

#lekha

#umeed

#hindipoetryslam

#lafj

#lekh

#madhushala

#hindihaihum

#kuchhbatein

#lekhalekhi

#litraturelover

#hindiurdushayari

#hindyugm

#nayiwalihindi

#newwritersclub

#hindikitaab

#hindwi

#laghukatha

#hindikahani

#hindi

#hindistory

#hindikavi

#hindilines

#hindipoetry

#story

#shabd

#hindikavitayen

#hindiquotes

#shabdanchal

#hindikaveeta

#hindikavyasangam

#hindistories

#kahani

#hindidakgharpoetry

#kaviraj

#hindikavisammelan

#hindidakghar

#shabdalay

#hindiliterature

#dakgharpoetry

#dakghar

#hindilearning

#storytelling

आंसू

सिसकती रातों की मंजिल क्या है लरजते आसुंओं से हासिल क्या है जीते तो मिल ही जाती बादशाहत  पर हार जाने पे मुकम्मल क्या है।। थके तो...