गुरुवार, 15 दिसंबर 2022

कपोत और वनराज

शांति कपोतों की बिरियानी वे नित्य चाव से खाते थे।

क्षुधातृप्ति की हिचकी ले हमको सदा चिढ़ाते थे।।

हम चोटिल चोटिल रहते थे घाटी मे अत्याचारों से।

हम थे अवाक् कश्मीरी जन्नत मे जेहादी नारों से।।

अबकी सिंहासन पर गिर का बाज बिठाया है हमने।

उनकी चाले सीधी कर दे वनराज बिठाया है हमने।।

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आज का अंगुलीमाल #hindistories

सुबह के चार बजे थे कि छत्तीसगढ के सीमांत जनपद का विधनू जंगल गोलियों की तडतडाहट से गूंज उठा था। कमांडेंट विभा सोरांव के नेतृत्व मे केन्द्रीय रिजर्व बल की यह टुकड़ी नक्सल आपरेशन पर थी। नक्सलियों से मुठभेड मे दोनो तरफ से फायरिंग चलते हुए काफी समय बीत गया था। अब सूरज दो लट्ठ उपर आसमान मे चढ़ आया था।


इस मुठभेड़ मे अब तक कितने नक्सली हताहत हुए कुछ पता नही पर सुरक्षाबलों के दो जवान गंभीर तौर पर घायल हो चुके थे। दुश्मनों की हरेक गोली विभा के हौसले को दोगुना कर देती थी। चारो तरफ से घिरे नक्सलियों के पास जब गोला बारूद खत्म होने लगा तो भागने के दुस्साहसिक प्रयास मे उन्हे मार गिराया गया।अंतिम नक्सली के कंधे पर विभा की गोली लगी और वो जमीन पर गिरा कराहने लगा। विभा दौड़कर उस तक पहुंची घायल नक्सली कराहता जा रहा था। जीत की खुशी मे डूबी विभा को अचानक उस कराहती आवाज ने गम के सागर मे डूबो दिया उसकी सारी खुशी गम मे बदल गई थी। कराहने वाली की आवाज मद्धम हो रही थी और विभा की धड़कनें तेज होती जा रही थी। ये वही है, उसने झट घुटनों के बल बैठ कर असित के चेहरे से नकाब हटाया था।


वो रो पड़ी। सुरक्षाबलों की मदद से सभी घायलों को अस्पताल पहुंचाया गया। आपरेशन के बाद अभी तक असित को होश नही आया था। विभा उसके वार्ड का राउंड लगाकर आयी तो उसे यकीन नही हो रहा था कि दशकों से वो जिसका इंतजार कर रही थी वो इस हाल मे मिलेगा। वो बार बार खुद को कोसती जा रही थी, काश आखिरी गोली न चलाई होती। ऐसा कैसे हो सकता है, यूपीएससी की परीक्षा पास करने वाला इंसान नौकरी ज्वाइन ना करके नक्सलवाद का समर्थक कैसे हो गया? उसे यकीन नही हो पा रहा था।


उसे अब भी यूनिवर्सिटी की कैंटीन का वो कोना याद था जहां एक शर्मीला लड़का अकेले बैठा रहता था। यहां तक की उसे प्रेम का प्रस्ताव भी विभा ने स्वयं ही दिया था।

पर हां असित बहुत भावुक था, भेदभाव को बिल्कुल बर्दाश्त नही करता था इस मसले पर तो कितना आगबबूला हो जाता था वो।

वो खयालों मे खोयी ही थी की इंस्पेक्टर ने बताया कि असित को होश आ गया है। विभा अंदर वार्ड मे गयी बड़ी बड़ी आंखो और सुन्दर केश विन्यास वाला असित अब कितनी झुर्रियां थी उसके चेहरे पर अधपके बाल और आंखो मे अंतहीन बेचारगी भी।

नही तुम ये नही हो सकते तुम तो तथागत थे अंगुलीमाल कैसे बन गये, तुमसे किसी का अपमान तक होते नही देखा जाता था अब तुम हत्यारे कैसे हो सकते हो। खुद को असहज होता देख विभा बोली उसकी आंखो से आंसू बहने लगे थे।

असित भी कुछ बोलना चाह तो रहा था पर शारीरिक कमजोरी से उसके बोल ना निकले। बेबसी में आंसु निकल पड़े थे। दूसरों के बहकावे मे बहुत कर ली मनमानी पर अब नही, अब मुझे मेरा अधिकार चाहिए जो बरसों पहले अनायास मुझसे छीन लिया गया था, विभा दूसरे हाथ से अपने आंसू पोछते बोल पडी थी। उसके हाथों में अपना हाथ देता असित चुप लेटा था आंखो से अश्रुधार बहती ही जा रही थी उसमें पश्चात, प्रेम, विछोह सब साथ मिश्रित थे।

असित ने यह कभी नही सोचा था विभा उसकी इस भाँति प्रतीक्षा करेगी। उसे बहुत सी बातों का पश्चाताप था पर विभा के प्रति हुआ अन्याय उनमे सबसे भारी लग रहा था। 

अस्पताल के वार्ड मे खड़ी विभा उसे प्रत्यक्ष "तथागत" लगी जो उस अंगुलीमाल का जीवन उद्धार कर रही थी।

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:- शशिवेन्द्र "शशि"

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मंगलवार, 13 दिसंबर 2022

जीवन-स्वामी

 दीन दयाल विरिद संभारी हरहू नाथ मम् संकट भारी।।

पुजारी जी ने इस चौपाई के साथ आज शाम के कीर्तन पर विराम लगाया था। सभा अब विसर्जित हो चुकी थी "एकादशी कब है पंडित जी" केशव भगत घुटने पर हाथ लगा कर उठते हुए बोले।



क्यो, भगत व्रत रखोगे क्या? पुजारी ने ठिठोली करते पूछा

"हां सोच रहा हूं, जबसे बुढिया गई है कोई व्रत त्यौहार नही मना है" भगत बोले

"सब राम जी की इच्छा है भगत" पुजारी ने एकादशी तिथि बताते हुए कहा 

वैसे तो पुजारी और केशव भगत दोनो ही अपने घर मे अकेले थे। यदा कदा खाना भी साथ मे बना लेते थे।

आज पता नही क्यूं भगत को भूख नही लगी थी सो हल्की रात मे थोड़ा थोड़ा टहलने निकल पड़े थे। धीरे धीरे गांव से बाहर अपने खेतों की ओर निकल पड़े। ट्यूबवेल के पास एक चबूतरा बना रखा थोड़ी थकान लगी बस वही चबूतरे पर लेट गये मंद मंद बयार मे हल्की सी झपकी आ गई।

प्रेम की मां कह रही है आ जाओ रोटी खा लो लेकिन भगत आज पूरा खेत एक ही सांस मे जोत लेना चाहते थे। कल ही नया ट्रैक्टर जो लाये थे, गृहस्थ बड़ी मिन्नतों और संयम के बाद कुछ खरीद पाता है और जब बात ट्रैक्टर जैसे बड़े सौदे की हो फिर तो उत्साह चौगुना होता है। तब ट्रैक्टर ट्राली जोडकर पूरे मोहल्ले को बगही के मेला मे ले गये थे। नई साडी मे प्रेम की महतारी बडी चितभावन लग रही थी। केशव के हृदय मे रह रह कर उमंग उठ रही थी तब प्रेम तीन बरस का था।


अहा विधाता हो, क्या दिन थे। दर्द और पश्चाताप पिघल कर उनकी आंखो से द्रव रूप मे निकल पड़ा था। आंखे खोलने का मन नही हो रहा था। वहीं से पुरानी यादों मे चित्त खो गया रात गहराने के साथ ही नींद भी गहरी होती गयी। बड़ी देर तक यादों के समंदर मे गोते लगाते हुए भगत अचानक एक औरत के जल्दी जल्दी चलने की आवाज से सिहर गये थे; आधी रात मे कौन है भगत पांव दबाये उस आवाज की तरफ चल पड़े थे।

तब तक दो अलग आवाजें सुनाई दी, "हम यहां से कहीं दूर चल पडेंगे लेकिन अपने बच्चे को यहां न छोडूंगी" युवती बोली।

"तो क्या अनबयाही किसी बच्चे को साथ रखेगी कुलक्षिनी" दूसरी औरत बोली थी।

यह सुनकर भगत सारा माजरा समझ गये थे। एक नवजात बच्चे की आवाज सुनाई दे रही थी और यही उसके जीवन को समाप्त करने का वाद विवाद भी चल रहा था की एक पुरुष चीखा "मान जा नही तो तुझे भी यही दफन कर देंगे"।

"हमारी नाक पहले ही कटा चुकी हैं" उसने डपटते हुए कहा था

युवती बोली मै इसे लेकर कहीं और चली जाउंगी आप दोनो लोगो से कह देना मै मर गई। आप पर कोई लांछन नही आयेगा। युवती ने तर्क देते हुए विनती की थी। इस समय वह नवजात दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह अपनी जननी की गोद मे था। पुरूष ने गुस्से मे कहा "इसका बाप तो गांव छोड़कर भाग गया है और उसका बाप उल्टे हमे पुलिस केस मे फंसाने की धमकी दे रहा है।

दूसरी औरत रोने लगी थी पुरूष ने धमकाया चुप रह ये मैल मिटाने दे।

वह उस नवजात की तरफ बढ़ा ही था कि केशव झट कूदकर उनके बीच आ गया और उसकी लाठी पकड ली थी।


दोनो गुत्थम गुत्था थे पर नौजवान केशव मे खूब दम खम था उसने जोर लगाकर धम नीचे पटक दिया था। दूसरी औरत पीछे से केशव को मार रही थी पर केशव ने मजबूती से धर रखा था। इतनी देर मे वह जोर से चिल्ला पड़ा तो गांव से लोग लाठी डंडा लेकर दौड़ पड़े थे। सभी को पकडकर गांव मे लाया गया। यह लोग दूर किसी गाँव से आये थे। तय हुआ कल दिन के उजाले मे पंचायत मे फैसला होगा। गांव के बीच पीपल के तले बड़े बुजुर्ग बैठे। चर्चा शुरू हुई लडकी का परिवार उसके बच्चे को अपनाने को कत्तई तैयार नही था और लडकी भी अपने बच्चे को छोड़ने को तैयार नही थी। पंचो के समक्ष यह अजीबोगरीब समस्या थी। कोई समाधान होता ना देख लडकी के मां बाप अपने घर लौट गये साथ ही लड़की से नाता भी तोड़कर गये अब उसके पास क्या रास्ता था। पंचो ने उसकी इच्छा जानने के लिए पूछा।

लड़की ने हाथ जोड़कर कहा " पंचो जीवन बचाने वाला देवता होता है और प्राणों का स्वामी भी, मेरा जीवन तो किसी और के छल से नष्ट हो चुका है अब यदि मुझे आश्रय मिले तो बड़ा उपकार होगा, यह कह उसने अपना सिर पंचो के समक्ष जमीन पर झुका दिया था।

नौजवान केशव को लड़की की बातों ने खूब प्रभावित किया था उसने स्वयं पहल किया और लड़की ने सहर्ष उसे अपने जीवन स्वामी के रूप में स्वीकार कर लिया था। अपने जीवन की इस सच्चाई को दोहराते जब तक भगत की नींद खुलती आसमान मे हल्का उजाला हो चुका था।

:-शशिवेन्द्र "शशि"

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मंगलवार, 29 नवंबर 2022

सहमति

 ट्रेन नदी नाले पार करती चली जा रही थी। जब भी किसी नदी नाले के पुल को पार करती तो पहिए की गड़गड़ाहट से पूरा तन मन रोमांच से भर जाता था। अभी थोडी देर पहले डिब्बे मे एक अलग सा उतावलापन था। पूरा परिवार साथ बच्चों के साथ ही बडे भी बहुत उत्साहित थे।


परिवार की सबसे बड़ी लडकी रागिनी के लिए लड़का देखने जा रहे थे। यात्रा की थकान और सुबह जल्दी जागने के परवाह मे जल्दी जल्दी सभी सो गये। मां और पिता के अतिरिक्त उस कुमुदिनी की आंखो मे भी नींद नही थी जिसके नव पल्लवित जीवन का मधुमास आने वाला था। यौवन की धरा पर पांव रखते मानव का मन इक अलग ही ऊंचाई पर उड़ता हैं। मन मे रह रहकर स्वप्न के तार झंकृत होते तो नवयौवना अपनी आंखो को बंद कर उस शहद को चुप घुलने देती, बारबार ममेरी बहन स्मिता के शब्द याद आते।


विचित्र आकर्षण है विवेक मे जितना सुन्दर है उतना ही सौम्य और वाकपटू ऐसा की अंजाने को भी पल भर मे अपने रंग मे रंग ले। यह सब याद कर वह लाजवंती हल्की सी मुस्कराहट के साथ शर्मा जाती थी। ईश्वर मानव जीवन मे कितने अलग अलग रंग भरता है। यौवन यात्रा मे कितने आकर्षक प्रस्तावों से सामना हुआ था पर किसी को हां नही कहा शायद इसी सुन्दर विकल्प हेतु विधाता ने मेरा हृदय किसी से जोड़ा ही नही। इन माधुर्य विचारों मे मग्न युवती को भान भी न रहा कब नींद आ गई सुबह पापा हडबडी मे सबको जगा रहे थे। अगला स्टेशन 10मिनट मे आने वाला था। हालांकि गाड़ी 15मिनट तक रूकती थी पर इतने लोगो का सुरक्षित उतारना भी चुनौती थी। प्रभु कृपा से सब कुछ बहुत सहजता से हो गया। नियत समय पर सभी तैयार होकर होटल पहुंच गये हल्के फुल्के नाश्ते का दौर साथ साथ बातें लगातार चलती जा रही है। शीघ्र ही दोनो पक्ष परस्पर घुल मिल गये और वह समय आ गया जब वर वधू को आपस मे बात करने हेतु समय दिया गया। हृदय दुगुनी गति से धड़क रहा था। होटल के लान मे किनारे एक बेंच पर दोनो बैठे थे। बातें शुरू हुई। पहले संभल कर धीरे धीरे पर फिर जैसे भावनाएं अब बुद्धि के वश से बाहर हो रही थीं पर मर्यादा का विचार करते हुए एक दूसरे को पहचानना भी आवश्यक था। रागिनी और विवेक सहमति के काफी करीब थे की सहसा अश्विन ने रागिनी को सजग करते हुए पूछा, मेरा एक अतीत है जिसका ज़िक्र किये बिना मैं आगे नही बढना चाहता। रागिनी हल्की सी सतर्क हो गई धीमे से बोली बताइये।



मेरे जीवन का एक अतीत है हालाँकि उसकी कोई प्रासंगिकता शेष नही है फिर भी।

रागिनी पूरी तरह चौंक गई थी।

विवेक सहजता से कहता चला गया, चेहरे पर दर्द के भाव, विछोह की पीड़ा सब परिलक्षित थे।

रागिनी दुविधा मे थी, यह क्या! हे ईश्वर मेरे हिस्से मे यह विचित्र अधूरापन क्यों। अभी वो ऐसा सोच ही रही थी की विवेक ने कहा "परन्तु अब यह मेरे लिए मात्र एक बुरे स्वप्न की तरह है। जिन्हे मै अपनी असफलताओं की भांति कभी याद नही रखता"।

हां आज तुम्हे बताना जरूरी समझा मै अपनी होने वाली अर्धांगिनी से कोई रहस्य नही रखना चाहता था।

यह तो जितना सहज है उतना ही निर्मल भी धीरे धीरे रागिनी विचारमग्न थी उसका संशय छंटता जा रहा था। निर्णय की घड़ी उसके नजदीक आ गई थी विकल्प की स्वीकार्यता पर उसका निर्णय और ढृढ़ होता जा रहा था।

विवेक ने अपनी बाते समाप्त की और फिर दोनो ने आपसी सहमति से वहां से चलना प्रारंभ किया।

मुझे अतीत के उतार चढाव से सहानुभूति तो है पर कोई शिकायत नहीं,बेंच से उठ कर अपनी साडी का पल्लू संभालती रागिनी ने कहा था।

मारा सरोकार वर्तमान और भविष्य से हैं, मुझे उसका आश्वासन चाहिए और साथ भी।

सहमति के इस अद्भुत प्रस्तुतीकरण से दोनो ही आह्लादित थे

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:-शशिवेन्द्र "शशि"


बुधवार, 23 नवंबर 2022

लालसर:---स्वाद की लालसा

जीतन सिंह फौज से रिटायर हुए तो शहर मे बेटे बहू के पास फ्लैट मे रहने लगे। पाश सोसाइटी का फ्लैट आधुनिक सुविधापूर्ण पर जगह कम जान पडती थी। उनके अंदर का फौजी अनुशासन पक्का सुबह चार बजे जागते, पीटी परेड, रोल काॅल पर यह सिक्योरिटीज गार्ड के साथ ही बाकियों के लिए भी नीद मे खलल डालने जैसा था। 

सब परेशान थे पर कौन समझाये, बीबी पहले ही गुजर चुकी थीं। बेटे ने एक बार प्रयास किया तो उसे जो फटकार पड़ी दुबारा किसी का साहस नही हुआ। जीतन से धीरे धीरे आस पडोस के लोग कन्नी काटने लगे थे। उन्हें भी शहर उबाऊ और नीरस लगने लगा था। 


उनमें कुछ दिन के लिए अपने गांव जाकर पुस्तैनी मकान मे रहने की इच्छा जागृत हुई तो चल पड़े। यहां पास पड़ोस को जैसे नया जीवन मिला गया हो।

दूधिए से लेकर कामवाली तक सबने चैन भरी राहत की सांस ली। वहां गांव में अपने पुराने मकान की मरम्मत कराकर जीतन उसमें रहने लगे।

 होसिल और चिंता उनके बचपन के दोस्त थे दिन भर गांव के ताल के किनारे ताश होता नये नये दोस्त मिलने लगते हालांकि जान पहचान पुरानी ही थी। रही सही कसर कैन्टीन वाली दारू कर देती।

 एक दिन ताव मे लखन का लड़का अजीत बोला "चचा, दारू के साथ लालसर भी होती तो मजा आ जाता। 


लालसर खाये एक अरसा हो गया था। बाबू जी के समय मे मिलती थी पर स्वाद अभी तक नही भूला है। बस फिर क्या तय हुआ टोली बनी और शिकार के लिए तो यही मौसम ठीक हैं। इसमे ताल मे प्रवासी पक्षी आते ही हैं।

अगली रात को दस बारह लोग के जाने की सहमति बनी। शिकार के लिए जरूरी सामान टार्च, टीन की थाली, जाल और नाव आदि जुटा लिए गये थे। कर्मा मल्लाह नाव चलाने मे मास्टर हैं। चिडिया के बगल तक चला जाये तब भी उसे पता ना चले। उसने दल मे सभी को उनका उनका काम समझा दिया था। शिकार का वक्त आ गया सभी पुरानी यादें ताजा करने चल पडे थे। रास्ते मे चिंता के पट्टीदार सोखा के पांव के नीचे सांप आ गया वो तो डीह बाबा रक्षा किये पनियहवां सांप था। पनियवहां सांप जहरीला नही होता है। थाली बजने के साथ ही शिकार की शुरूआत हो चली थी। सभी अपनी अपनी जगह पर दी गई भूमिका निभाने के लिए तैयार थे। टार्च की रौशनी मे आंखे चुधियां जाने से पक्षी घबरा जाते थे इतनी देर मे उन्हे लपेटकर थैले मे रख लिया जाता था। इसी लपकने के प्रयास मे हासिल पानी मे गिर पड़ा था। करीबन 20 से ज्यादा चिड़िया पकड़ ली गई थीं। जीतन ने सोचा यदि ऐसा ही चलता रहा तो दोबारी क्यूं ढो कर लाया। कर्मा ने धीरे से सबको वापस लौटने का इशारा किया सब वापस लौटने की जुगत मे लग रहे थे की जीतन को टार्च की रौशनी मे एक मोटी लालसर दिख पड़ी थी। शब्दभेदी निशाने से सबके बीच अपने निशानची होने का दबदबा बनाने की ललक मे उसने फायर झौंक दिया।



अचानक हुए इस हमले से सभी घबरा गये पक्षियों के झुंड मे हलचल मच गई और यह कोलाहल गांव तक पहुंच गया। सब ताल से बाहर निकले ही थे की सामने पुलिस की गाड़ी आती दिखी। सिपाही ने थोड़ा धमकाकर पूछा तो कर्मा टूट गया सब सच सच बता दिया।

प्रवासी संरक्षित पक्षियों के अवैध शिकार के जुर्म मे सबको थाने में लाया गया। रातभर सभी हवालात मे बंद रहे सुबह मिलने आये प्रधान जी ने बताया दरोगा ने 50,000 की मांग की है नही तो तस्करी का केस बनायेगा। सब रोने चिल्लाने लगे थे घबराये हुए कोई अपना सिर पीट रहा था। कोई जीतन को कोस रहा था। रोते पीटते बड़ी मुश्किल से 30,000 मे बात बनी। दल मे बाकि तो सब फट़क लाल थे निठल्ले सारा बिल जीतन के माथे पडा था। थानेदार ने बडा दिल दिखाते हुए थैले मे से एक लालसर जीतन को थमाते हुए कहा मेरी दरियादिली है जो इतने मे ही छोड़ रहा हूं नही तो इस जुर्म की जमानत ही नही है। आराम से चार पांच साल के लिए अंदर जाते और कचहरी का चक्कर लगाते सो अलग। जीतन चुपचाप 30,000 की कीमत देकर लालसर वाला थैला कंधे पर लटकाए घर की तरफ चल पड़े।

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:---शशिवेन्द्र "शशि"


प्रधानी:---- (अपनों के टकराव की कहानी)

खेमू चौधरी गांव के मध्यमवर्गीय किसान थे चार बेटों मेवालाल, खूबलाल, रतिलाल और हरिलाल समेत भरा पूरा परिवार था। ठेठ मेहनती लोग अपने खेतों मे काम करते हर साल मंडी मे सबसे ज्यादा अनाज बेचते थे। खेमू ने बडी शराफत से अपने बच्चों की परवरिश की थी किसी का एक भी रूपया उधार नही, नशे का नाम तक नही। दौर बदला बच्चों के बच्चे हुए परिवार बडा हुआ। 

बड़े परिवार मे अलगाव हो ही जाता है। सब अपनी अपनी जिन्दगी मे राजी खुशी थे फिर भी मेवा और रति के परिवार मे विशेष स्नेह था जबकि खूबलाल और हरिलाल साढू थे। आज भी कहीं से निमंत्रण एक ही आता था। सरकार ने स्थानीय प्रशासन को सशक्त करने हेतु पंचायती राज लागू किया। चार बार से प्रधानी मेवालाल के परिवार मे ही थी दो बार खुद और दो बार बेटा अवधेश। हर बार चुनाव मे चारो भाइयों का परिवार एकजुट जाता था और प्रभावी ढंग से चुनाव जीत लिया जाता था। पर अबकी बार हरि का बेटा रतन भी चुनाव लड़ना चाह रहा है, बाप बेटे दोनो गांववालो को जनाते फिर रहे हैं। सोमवार को कीर्तन वाले दिन हरि अपने भाई मेवालाल से कह रहा था।

दद्दा अबकी रतनू भी प्रधानी का मन बनाये है, अवधू मान जाता तो अच्छा रहता।

पर मेवालाल को प्रधानी का स्वाद खूब पता था और सब छोड़ो फटफटिया पर बैठ कहीं जाने पर जो सम्मान मिलता हैं, लोग कुर्सी से उठकर अगवानी करते हैं। पिछली दफा नरेनदर के ससुराल मे झगड़े की पंचायत मे गये तो प्रधान जी कह कर कितना सम्मान हुआ था।



अब यह मजा सेंती मे थोड़े गंवाया जायेगा। पर हरिया को भी रूष्ट नही करना है। क्या पता किसका बुरा मान जाये फिर सहोदर का रूठना तो किसी के हित मे नही रहता। इस असंतोष मे तो रावण दुर्योधन का राज पलट गया।

किशोर एक काम कर अबकी बार लास्ट अवधेश को लडाते है अगली बार रतन को। मेवा समझाते हुए बोला

किशोर मुंह से तो कुछ नही बोला था पर भाव पूर्णतया अनिच्छा झलक रही थी। मेवा ने झट भांप लिया उसे कई प्रलोभन दिए वार्ड सदस्य से लेकर जिला पंचायत तक सब बता दिया पर किशोर टस से मस न हुआ।

मेवा बड़ा था छोटे भाईयों से उसे ना सुनने की आदत थी नही, झुंझलाहट मे बोला चल फिर लड़कर ही देख ले किसके जूते मे दम हैं।

हरिलाल हालांकि भाई को ना कहने के अपराधबोध मे किंकर्तव्यविमूढ़ था पर भाई के इस अप्रत्याशित व्यवहार से उसे अवसर मिल गया और उसने इस बात की गांठ बांध ली। जब तक मेवा को अपनी गलती का अह्सास होता बहुत देर हो चुकी थी। उसने हरि को समझाने के सारे हथकंडे अपनाये उसकी पत्नी अपने लाडले देवर को समझाने खुद उसके घर पर आयी पर हरि एक ही बात की रट लगाये था दद्दा ने चुनौती दे दी है।बात जब किसी तरह नही संभली और चुनाव आ गये। दोनो पक्षों ने क्षमता से बाहर जाकर खर्च करना शुरू किया, खर्च सुरसा के मुह की तरह फैलता ही जाये गहने बेचे, मवेशी बेच दिए,खेत रेहन रख दिए और भी जहां कही से बन पड़ा लेकर चुनाव जीतने का दम बनाया गया। पर चुनाव तो एक खेल की भांति है, हार जीत लगी रहती है, मत बंटवारे की वजह से दोनो पक्ष हार गये थे। तीसरा व्यक्ति बाजी मार ले गया, इतना बड़ा दांव हारने के बाद दोनो ही पक्ष एक दूसरे पर क्रोधित थे बस फिर क्या खींच गई लाठियां और बिना अपनेपन का लिहाज किये बरस पड़ी एक दूसरे पर। 



बड़े छोटे का लिहाज नही जिन हाथों ने गोद मे बिठाकर कभी गांव भर घुमाया था उन पर रत्तीभर मुरव्वत नहीं।थोड़ी ही देर मे सब लहूलुहान होकर धरती पर पड़ गये थे। गांव वालो ने उन्हे अस्पताल पहुंचाया इलाज के दौरान दोनो पक्षों के लोग असपताल मे भर्ती रहे। आधी रात का समय था खेमू सिर पर हाथ रखे अस्पताल के बाहर बैठे थे थोड़े समय पर जैसे ही अंदर से किसी के होश मे आने की खबर मिलती एक गहरी सांस के साथ एक बीड़ी सुलगा लेते थे।

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शशिवेन्द्र "शशि"

मंगलवार, 22 नवंबर 2022

गीत

रामसुख महतो के नाम की तरह ही उनके जीवन मे राम का दिया सुख ही सुख था। दो स्वस्थ बैल, दो सुन्दर सुशील बेटे सुलक्षणी पत्नी चना चबैना जो भी होता था अपने घर का होता। सभी निरोगी थे और क्या ही चाहिए होता है एक गृहस्थ को। महतो एक जलसे मे गये वहां बिरहा कार्यक्रम मे एक गाना सुना 

"हमरे दुगो ललनवा महान बाबू

एगो रहे सीमा पर एगो किसान बाबू।।"



महतो को यह जीवंत गीत भा गया यूं लगा जैसे यह गीत उनके लिए ही बना हो। उन्होने ठान लिया बड़े बेटे आनंद को सेना मे भेजेंगे और छोटे वाले अजय को खेती का काम देंगे। आनंद पढ़ने मे होशियार था और मेहनती भी खूब दौड़ भाग करता मेहनत करता। जब बारहवीं मे अव्वल आया तो पिता को बड़ी खुशी हुई। उसके दोस्त शहर की भर्ती रैली मे जा रहे थे आनंद भी उनके साथ हो लिया। बरसों से इसकी ही तैयारी थी अतः उसका सिलेक्शन हो गया। शाम को घर लौटकर जब यह खबर बूढ़े पिता को सुनाया तो महतो ने उसे गले से लगा लिया।


फौज की ट्रेनिंग बड़ी कठिन होती है आनंद ने उसे जी-जान से पूरी कर पोस्टिंग प्राप्त की। कच्छ के रण की अपनी अलग ही कठिनाईयां थी जैसे नंगे पैर नही चल सकते, जहरीले सांप बिच्छूओं का कदम कदम पे खतरा पर पहली पोस्टिंग और जवानी के दिनों में अपने सपने के पूरे होते देखने के उत्साह के सन्मुख यह कुछ भी नही था। आनंद की शादी के लिए दूर दूर से रिश्ते आने लगे, जाति गोत देखकर मास्टर ब्रजनाथ की बेटी से लगन तय हुआ। मास्टर की बेटी पढी लिखी थी सुन्दर और सुशील भी। शादी हुई परिवार बढ़ा आनंद का ओहदा भी बढ़ गया सिपाही से हवलदार और इधर महतो छोटे बेटे के साथ खेतों मे जमकर मेहनत करते घर मे चार लोग कमाने वाले आस पड़ोस के खेत भी खरीद लिए। 


अब महतो की गिनती इलाके के संपन्न लोगो मे होने लगी। छोटे बेटे के लिए और अच्छे रिश्ते आने लगे, पड़ोस के गांव के ओंकार महतो का शहर मे अच्छा काम जम गया था लोग इज्जत से ओंकार बाबू कहने लगे थे। शादी तय हुई और नई बहू दहेज मे ट्रैक्टर ले आई। ट्रैक्टर बड़े कमाल की चीज था बीघा भर खेत कम समय मे ही जोत देता था। पर महतो को जाने क्यो इससे ज्यादा अपने बैलों से स्नेह था ट्रैक्टर के नखरे अलग महंगा तेल पीता था घड़ी घड़ी नखरे कभी पिसटन तो कभी पहिए हमेशा कुछ न कुछ गडबड़ी।


छोटी बहू भी थोडी अलग मिजाज की थी घर मे किसी से नही बनता बात बात पर ताने मारती थी। दरअसल व्यापारी पिता की इकलौती बेटी थी दिखावा उसके जीवन का अभिन्न अंग था। सुबह और शाम की ही भांति जन्म और मृत्यु भी धरती का अनिवार्य सच हैं। महतो के स्वर्गवास के बाद दोनो भाई बंटवारे के लिए आमने सामने थे। बहुओं ने अपने अपने पसंद के पंच बुला लिए दोनो भाई भी पत्नियों के आग्रह पर आ गये। दरवाजे पर इक छोटी भीड़ इकट्ठा थी सामान बराबर बांट कर रख दिए गये थे, बूढी मां चुप बैठी देख रही थी। एक पंच ने आवाज लगायी हां भाई तुम दोनो बोलो कौन सा हिस्सा किसे चाहिए।

आनंद बोलता इससे पहले ही अजय बोला " बाबूजी के बाद भैया ही बड़े है सब उनकी ही कमाई से खरीदा है उन्हें जो चाहिए वो वापस ले लें।

आनंद उसे रोकते हुए बोला " हां मेला बाजार मे तो हमसे पहले तुम खिलौना लेते हुए आया है। अपनी मेहनत से तुमने दो का चार किया है आज भी तुम ही पहले बोलो, यह कहते हुए उसका गला भर्रा गया।

छोटा रोते हुए उससे लिपट गया। दोनो भाई एक दूसरे को अंक मे भर कर रोने लगे असमंजस पंचो की भी आंखे नम हो गई। बहुएं लज्जित सी ड्योढी मे अपने पतियों के इस कारनामें को आश्चर्य से देख रहीं थीं।

बुढ़िया महतो वाला पुराना गीत गुनगुनाते अंदर हुक्का भरने चली गई।

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शशिवेन्द्र "शशि"

आंसू

सिसकती रातों की मंजिल क्या है लरजते आसुंओं से हासिल क्या है जीते तो मिल ही जाती बादशाहत  पर हार जाने पे मुकम्मल क्या है।। थके तो...