मंगलवार, 29 नवंबर 2022

सहमति

 ट्रेन नदी नाले पार करती चली जा रही थी। जब भी किसी नदी नाले के पुल को पार करती तो पहिए की गड़गड़ाहट से पूरा तन मन रोमांच से भर जाता था। अभी थोडी देर पहले डिब्बे मे एक अलग सा उतावलापन था। पूरा परिवार साथ बच्चों के साथ ही बडे भी बहुत उत्साहित थे।


परिवार की सबसे बड़ी लडकी रागिनी के लिए लड़का देखने जा रहे थे। यात्रा की थकान और सुबह जल्दी जागने के परवाह मे जल्दी जल्दी सभी सो गये। मां और पिता के अतिरिक्त उस कुमुदिनी की आंखो मे भी नींद नही थी जिसके नव पल्लवित जीवन का मधुमास आने वाला था। यौवन की धरा पर पांव रखते मानव का मन इक अलग ही ऊंचाई पर उड़ता हैं। मन मे रह रहकर स्वप्न के तार झंकृत होते तो नवयौवना अपनी आंखो को बंद कर उस शहद को चुप घुलने देती, बारबार ममेरी बहन स्मिता के शब्द याद आते।


विचित्र आकर्षण है विवेक मे जितना सुन्दर है उतना ही सौम्य और वाकपटू ऐसा की अंजाने को भी पल भर मे अपने रंग मे रंग ले। यह सब याद कर वह लाजवंती हल्की सी मुस्कराहट के साथ शर्मा जाती थी। ईश्वर मानव जीवन मे कितने अलग अलग रंग भरता है। यौवन यात्रा मे कितने आकर्षक प्रस्तावों से सामना हुआ था पर किसी को हां नही कहा शायद इसी सुन्दर विकल्प हेतु विधाता ने मेरा हृदय किसी से जोड़ा ही नही। इन माधुर्य विचारों मे मग्न युवती को भान भी न रहा कब नींद आ गई सुबह पापा हडबडी मे सबको जगा रहे थे। अगला स्टेशन 10मिनट मे आने वाला था। हालांकि गाड़ी 15मिनट तक रूकती थी पर इतने लोगो का सुरक्षित उतारना भी चुनौती थी। प्रभु कृपा से सब कुछ बहुत सहजता से हो गया। नियत समय पर सभी तैयार होकर होटल पहुंच गये हल्के फुल्के नाश्ते का दौर साथ साथ बातें लगातार चलती जा रही है। शीघ्र ही दोनो पक्ष परस्पर घुल मिल गये और वह समय आ गया जब वर वधू को आपस मे बात करने हेतु समय दिया गया। हृदय दुगुनी गति से धड़क रहा था। होटल के लान मे किनारे एक बेंच पर दोनो बैठे थे। बातें शुरू हुई। पहले संभल कर धीरे धीरे पर फिर जैसे भावनाएं अब बुद्धि के वश से बाहर हो रही थीं पर मर्यादा का विचार करते हुए एक दूसरे को पहचानना भी आवश्यक था। रागिनी और विवेक सहमति के काफी करीब थे की सहसा अश्विन ने रागिनी को सजग करते हुए पूछा, मेरा एक अतीत है जिसका ज़िक्र किये बिना मैं आगे नही बढना चाहता। रागिनी हल्की सी सतर्क हो गई धीमे से बोली बताइये।



मेरे जीवन का एक अतीत है हालाँकि उसकी कोई प्रासंगिकता शेष नही है फिर भी।

रागिनी पूरी तरह चौंक गई थी।

विवेक सहजता से कहता चला गया, चेहरे पर दर्द के भाव, विछोह की पीड़ा सब परिलक्षित थे।

रागिनी दुविधा मे थी, यह क्या! हे ईश्वर मेरे हिस्से मे यह विचित्र अधूरापन क्यों। अभी वो ऐसा सोच ही रही थी की विवेक ने कहा "परन्तु अब यह मेरे लिए मात्र एक बुरे स्वप्न की तरह है। जिन्हे मै अपनी असफलताओं की भांति कभी याद नही रखता"।

हां आज तुम्हे बताना जरूरी समझा मै अपनी होने वाली अर्धांगिनी से कोई रहस्य नही रखना चाहता था।

यह तो जितना सहज है उतना ही निर्मल भी धीरे धीरे रागिनी विचारमग्न थी उसका संशय छंटता जा रहा था। निर्णय की घड़ी उसके नजदीक आ गई थी विकल्प की स्वीकार्यता पर उसका निर्णय और ढृढ़ होता जा रहा था।

विवेक ने अपनी बाते समाप्त की और फिर दोनो ने आपसी सहमति से वहां से चलना प्रारंभ किया।

मुझे अतीत के उतार चढाव से सहानुभूति तो है पर कोई शिकायत नहीं,बेंच से उठ कर अपनी साडी का पल्लू संभालती रागिनी ने कहा था।

मारा सरोकार वर्तमान और भविष्य से हैं, मुझे उसका आश्वासन चाहिए और साथ भी।

सहमति के इस अद्भुत प्रस्तुतीकरण से दोनो ही आह्लादित थे

#Ssps96

:-शशिवेन्द्र "शशि"


बुधवार, 23 नवंबर 2022

लालसर:---स्वाद की लालसा

जीतन सिंह फौज से रिटायर हुए तो शहर मे बेटे बहू के पास फ्लैट मे रहने लगे। पाश सोसाइटी का फ्लैट आधुनिक सुविधापूर्ण पर जगह कम जान पडती थी। उनके अंदर का फौजी अनुशासन पक्का सुबह चार बजे जागते, पीटी परेड, रोल काॅल पर यह सिक्योरिटीज गार्ड के साथ ही बाकियों के लिए भी नीद मे खलल डालने जैसा था। 

सब परेशान थे पर कौन समझाये, बीबी पहले ही गुजर चुकी थीं। बेटे ने एक बार प्रयास किया तो उसे जो फटकार पड़ी दुबारा किसी का साहस नही हुआ। जीतन से धीरे धीरे आस पडोस के लोग कन्नी काटने लगे थे। उन्हें भी शहर उबाऊ और नीरस लगने लगा था। 


उनमें कुछ दिन के लिए अपने गांव जाकर पुस्तैनी मकान मे रहने की इच्छा जागृत हुई तो चल पड़े। यहां पास पड़ोस को जैसे नया जीवन मिला गया हो।

दूधिए से लेकर कामवाली तक सबने चैन भरी राहत की सांस ली। वहां गांव में अपने पुराने मकान की मरम्मत कराकर जीतन उसमें रहने लगे।

 होसिल और चिंता उनके बचपन के दोस्त थे दिन भर गांव के ताल के किनारे ताश होता नये नये दोस्त मिलने लगते हालांकि जान पहचान पुरानी ही थी। रही सही कसर कैन्टीन वाली दारू कर देती।

 एक दिन ताव मे लखन का लड़का अजीत बोला "चचा, दारू के साथ लालसर भी होती तो मजा आ जाता। 


लालसर खाये एक अरसा हो गया था। बाबू जी के समय मे मिलती थी पर स्वाद अभी तक नही भूला है। बस फिर क्या तय हुआ टोली बनी और शिकार के लिए तो यही मौसम ठीक हैं। इसमे ताल मे प्रवासी पक्षी आते ही हैं।

अगली रात को दस बारह लोग के जाने की सहमति बनी। शिकार के लिए जरूरी सामान टार्च, टीन की थाली, जाल और नाव आदि जुटा लिए गये थे। कर्मा मल्लाह नाव चलाने मे मास्टर हैं। चिडिया के बगल तक चला जाये तब भी उसे पता ना चले। उसने दल मे सभी को उनका उनका काम समझा दिया था। शिकार का वक्त आ गया सभी पुरानी यादें ताजा करने चल पडे थे। रास्ते मे चिंता के पट्टीदार सोखा के पांव के नीचे सांप आ गया वो तो डीह बाबा रक्षा किये पनियहवां सांप था। पनियवहां सांप जहरीला नही होता है। थाली बजने के साथ ही शिकार की शुरूआत हो चली थी। सभी अपनी अपनी जगह पर दी गई भूमिका निभाने के लिए तैयार थे। टार्च की रौशनी मे आंखे चुधियां जाने से पक्षी घबरा जाते थे इतनी देर मे उन्हे लपेटकर थैले मे रख लिया जाता था। इसी लपकने के प्रयास मे हासिल पानी मे गिर पड़ा था। करीबन 20 से ज्यादा चिड़िया पकड़ ली गई थीं। जीतन ने सोचा यदि ऐसा ही चलता रहा तो दोबारी क्यूं ढो कर लाया। कर्मा ने धीरे से सबको वापस लौटने का इशारा किया सब वापस लौटने की जुगत मे लग रहे थे की जीतन को टार्च की रौशनी मे एक मोटी लालसर दिख पड़ी थी। शब्दभेदी निशाने से सबके बीच अपने निशानची होने का दबदबा बनाने की ललक मे उसने फायर झौंक दिया।



अचानक हुए इस हमले से सभी घबरा गये पक्षियों के झुंड मे हलचल मच गई और यह कोलाहल गांव तक पहुंच गया। सब ताल से बाहर निकले ही थे की सामने पुलिस की गाड़ी आती दिखी। सिपाही ने थोड़ा धमकाकर पूछा तो कर्मा टूट गया सब सच सच बता दिया।

प्रवासी संरक्षित पक्षियों के अवैध शिकार के जुर्म मे सबको थाने में लाया गया। रातभर सभी हवालात मे बंद रहे सुबह मिलने आये प्रधान जी ने बताया दरोगा ने 50,000 की मांग की है नही तो तस्करी का केस बनायेगा। सब रोने चिल्लाने लगे थे घबराये हुए कोई अपना सिर पीट रहा था। कोई जीतन को कोस रहा था। रोते पीटते बड़ी मुश्किल से 30,000 मे बात बनी। दल मे बाकि तो सब फट़क लाल थे निठल्ले सारा बिल जीतन के माथे पडा था। थानेदार ने बडा दिल दिखाते हुए थैले मे से एक लालसर जीतन को थमाते हुए कहा मेरी दरियादिली है जो इतने मे ही छोड़ रहा हूं नही तो इस जुर्म की जमानत ही नही है। आराम से चार पांच साल के लिए अंदर जाते और कचहरी का चक्कर लगाते सो अलग। जीतन चुपचाप 30,000 की कीमत देकर लालसर वाला थैला कंधे पर लटकाए घर की तरफ चल पड़े।

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:---शशिवेन्द्र "शशि"


प्रधानी:---- (अपनों के टकराव की कहानी)

खेमू चौधरी गांव के मध्यमवर्गीय किसान थे चार बेटों मेवालाल, खूबलाल, रतिलाल और हरिलाल समेत भरा पूरा परिवार था। ठेठ मेहनती लोग अपने खेतों मे काम करते हर साल मंडी मे सबसे ज्यादा अनाज बेचते थे। खेमू ने बडी शराफत से अपने बच्चों की परवरिश की थी किसी का एक भी रूपया उधार नही, नशे का नाम तक नही। दौर बदला बच्चों के बच्चे हुए परिवार बडा हुआ। 

बड़े परिवार मे अलगाव हो ही जाता है। सब अपनी अपनी जिन्दगी मे राजी खुशी थे फिर भी मेवा और रति के परिवार मे विशेष स्नेह था जबकि खूबलाल और हरिलाल साढू थे। आज भी कहीं से निमंत्रण एक ही आता था। सरकार ने स्थानीय प्रशासन को सशक्त करने हेतु पंचायती राज लागू किया। चार बार से प्रधानी मेवालाल के परिवार मे ही थी दो बार खुद और दो बार बेटा अवधेश। हर बार चुनाव मे चारो भाइयों का परिवार एकजुट जाता था और प्रभावी ढंग से चुनाव जीत लिया जाता था। पर अबकी बार हरि का बेटा रतन भी चुनाव लड़ना चाह रहा है, बाप बेटे दोनो गांववालो को जनाते फिर रहे हैं। सोमवार को कीर्तन वाले दिन हरि अपने भाई मेवालाल से कह रहा था।

दद्दा अबकी रतनू भी प्रधानी का मन बनाये है, अवधू मान जाता तो अच्छा रहता।

पर मेवालाल को प्रधानी का स्वाद खूब पता था और सब छोड़ो फटफटिया पर बैठ कहीं जाने पर जो सम्मान मिलता हैं, लोग कुर्सी से उठकर अगवानी करते हैं। पिछली दफा नरेनदर के ससुराल मे झगड़े की पंचायत मे गये तो प्रधान जी कह कर कितना सम्मान हुआ था।



अब यह मजा सेंती मे थोड़े गंवाया जायेगा। पर हरिया को भी रूष्ट नही करना है। क्या पता किसका बुरा मान जाये फिर सहोदर का रूठना तो किसी के हित मे नही रहता। इस असंतोष मे तो रावण दुर्योधन का राज पलट गया।

किशोर एक काम कर अबकी बार लास्ट अवधेश को लडाते है अगली बार रतन को। मेवा समझाते हुए बोला

किशोर मुंह से तो कुछ नही बोला था पर भाव पूर्णतया अनिच्छा झलक रही थी। मेवा ने झट भांप लिया उसे कई प्रलोभन दिए वार्ड सदस्य से लेकर जिला पंचायत तक सब बता दिया पर किशोर टस से मस न हुआ।

मेवा बड़ा था छोटे भाईयों से उसे ना सुनने की आदत थी नही, झुंझलाहट मे बोला चल फिर लड़कर ही देख ले किसके जूते मे दम हैं।

हरिलाल हालांकि भाई को ना कहने के अपराधबोध मे किंकर्तव्यविमूढ़ था पर भाई के इस अप्रत्याशित व्यवहार से उसे अवसर मिल गया और उसने इस बात की गांठ बांध ली। जब तक मेवा को अपनी गलती का अह्सास होता बहुत देर हो चुकी थी। उसने हरि को समझाने के सारे हथकंडे अपनाये उसकी पत्नी अपने लाडले देवर को समझाने खुद उसके घर पर आयी पर हरि एक ही बात की रट लगाये था दद्दा ने चुनौती दे दी है।बात जब किसी तरह नही संभली और चुनाव आ गये। दोनो पक्षों ने क्षमता से बाहर जाकर खर्च करना शुरू किया, खर्च सुरसा के मुह की तरह फैलता ही जाये गहने बेचे, मवेशी बेच दिए,खेत रेहन रख दिए और भी जहां कही से बन पड़ा लेकर चुनाव जीतने का दम बनाया गया। पर चुनाव तो एक खेल की भांति है, हार जीत लगी रहती है, मत बंटवारे की वजह से दोनो पक्ष हार गये थे। तीसरा व्यक्ति बाजी मार ले गया, इतना बड़ा दांव हारने के बाद दोनो ही पक्ष एक दूसरे पर क्रोधित थे बस फिर क्या खींच गई लाठियां और बिना अपनेपन का लिहाज किये बरस पड़ी एक दूसरे पर। 



बड़े छोटे का लिहाज नही जिन हाथों ने गोद मे बिठाकर कभी गांव भर घुमाया था उन पर रत्तीभर मुरव्वत नहीं।थोड़ी ही देर मे सब लहूलुहान होकर धरती पर पड़ गये थे। गांव वालो ने उन्हे अस्पताल पहुंचाया इलाज के दौरान दोनो पक्षों के लोग असपताल मे भर्ती रहे। आधी रात का समय था खेमू सिर पर हाथ रखे अस्पताल के बाहर बैठे थे थोड़े समय पर जैसे ही अंदर से किसी के होश मे आने की खबर मिलती एक गहरी सांस के साथ एक बीड़ी सुलगा लेते थे।

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शशिवेन्द्र "शशि"

मंगलवार, 22 नवंबर 2022

गीत

रामसुख महतो के नाम की तरह ही उनके जीवन मे राम का दिया सुख ही सुख था। दो स्वस्थ बैल, दो सुन्दर सुशील बेटे सुलक्षणी पत्नी चना चबैना जो भी होता था अपने घर का होता। सभी निरोगी थे और क्या ही चाहिए होता है एक गृहस्थ को। महतो एक जलसे मे गये वहां बिरहा कार्यक्रम मे एक गाना सुना 

"हमरे दुगो ललनवा महान बाबू

एगो रहे सीमा पर एगो किसान बाबू।।"



महतो को यह जीवंत गीत भा गया यूं लगा जैसे यह गीत उनके लिए ही बना हो। उन्होने ठान लिया बड़े बेटे आनंद को सेना मे भेजेंगे और छोटे वाले अजय को खेती का काम देंगे। आनंद पढ़ने मे होशियार था और मेहनती भी खूब दौड़ भाग करता मेहनत करता। जब बारहवीं मे अव्वल आया तो पिता को बड़ी खुशी हुई। उसके दोस्त शहर की भर्ती रैली मे जा रहे थे आनंद भी उनके साथ हो लिया। बरसों से इसकी ही तैयारी थी अतः उसका सिलेक्शन हो गया। शाम को घर लौटकर जब यह खबर बूढ़े पिता को सुनाया तो महतो ने उसे गले से लगा लिया।


फौज की ट्रेनिंग बड़ी कठिन होती है आनंद ने उसे जी-जान से पूरी कर पोस्टिंग प्राप्त की। कच्छ के रण की अपनी अलग ही कठिनाईयां थी जैसे नंगे पैर नही चल सकते, जहरीले सांप बिच्छूओं का कदम कदम पे खतरा पर पहली पोस्टिंग और जवानी के दिनों में अपने सपने के पूरे होते देखने के उत्साह के सन्मुख यह कुछ भी नही था। आनंद की शादी के लिए दूर दूर से रिश्ते आने लगे, जाति गोत देखकर मास्टर ब्रजनाथ की बेटी से लगन तय हुआ। मास्टर की बेटी पढी लिखी थी सुन्दर और सुशील भी। शादी हुई परिवार बढ़ा आनंद का ओहदा भी बढ़ गया सिपाही से हवलदार और इधर महतो छोटे बेटे के साथ खेतों मे जमकर मेहनत करते घर मे चार लोग कमाने वाले आस पड़ोस के खेत भी खरीद लिए। 


अब महतो की गिनती इलाके के संपन्न लोगो मे होने लगी। छोटे बेटे के लिए और अच्छे रिश्ते आने लगे, पड़ोस के गांव के ओंकार महतो का शहर मे अच्छा काम जम गया था लोग इज्जत से ओंकार बाबू कहने लगे थे। शादी तय हुई और नई बहू दहेज मे ट्रैक्टर ले आई। ट्रैक्टर बड़े कमाल की चीज था बीघा भर खेत कम समय मे ही जोत देता था। पर महतो को जाने क्यो इससे ज्यादा अपने बैलों से स्नेह था ट्रैक्टर के नखरे अलग महंगा तेल पीता था घड़ी घड़ी नखरे कभी पिसटन तो कभी पहिए हमेशा कुछ न कुछ गडबड़ी।


छोटी बहू भी थोडी अलग मिजाज की थी घर मे किसी से नही बनता बात बात पर ताने मारती थी। दरअसल व्यापारी पिता की इकलौती बेटी थी दिखावा उसके जीवन का अभिन्न अंग था। सुबह और शाम की ही भांति जन्म और मृत्यु भी धरती का अनिवार्य सच हैं। महतो के स्वर्गवास के बाद दोनो भाई बंटवारे के लिए आमने सामने थे। बहुओं ने अपने अपने पसंद के पंच बुला लिए दोनो भाई भी पत्नियों के आग्रह पर आ गये। दरवाजे पर इक छोटी भीड़ इकट्ठा थी सामान बराबर बांट कर रख दिए गये थे, बूढी मां चुप बैठी देख रही थी। एक पंच ने आवाज लगायी हां भाई तुम दोनो बोलो कौन सा हिस्सा किसे चाहिए।

आनंद बोलता इससे पहले ही अजय बोला " बाबूजी के बाद भैया ही बड़े है सब उनकी ही कमाई से खरीदा है उन्हें जो चाहिए वो वापस ले लें।

आनंद उसे रोकते हुए बोला " हां मेला बाजार मे तो हमसे पहले तुम खिलौना लेते हुए आया है। अपनी मेहनत से तुमने दो का चार किया है आज भी तुम ही पहले बोलो, यह कहते हुए उसका गला भर्रा गया।

छोटा रोते हुए उससे लिपट गया। दोनो भाई एक दूसरे को अंक मे भर कर रोने लगे असमंजस पंचो की भी आंखे नम हो गई। बहुएं लज्जित सी ड्योढी मे अपने पतियों के इस कारनामें को आश्चर्य से देख रहीं थीं।

बुढ़िया महतो वाला पुराना गीत गुनगुनाते अंदर हुक्का भरने चली गई।

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शशिवेन्द्र "शशि"

सोमवार, 21 नवंबर 2022

आहूति

 पिता की मौत होने के बाद घर की जिम्मेदारियों से प्रभावित अमरेन्द्र एक छोटे से अस्पताल मे सुरक्षाकर्मी की नौकरी करने लगा। पिता की छत्र छाया मे कभी खाने पीने की कमी नही रही थी खाने पीने के शौकीन हल्की मूंछो वाले अमरेन्द्र का बजरंग बली मे बड़ा भरोसा था। नौकरी के पहले दिन से ही अपने मिलनसार व्यवहार से उसने सबका हृदय जीत लिया था। 



धीरे धीरे समय बीतता गया जिम्मेदारियां बढ़ती गई पुराने लोग खत्म हो गये समय के साथ अस्पताल का बिजनेस भी बढ़ा कुछ नही बढा तो वो था अमरेन्द्र का ओहदा। तीस वर्षों से उसी पद पर रहे। दशकों लंबा आयुर्वेदिक इलाज करा रहे मरीज हर महीने मिलते थे उनसे खूब जन पहचान थी। तनख्वाह के अतिरिक्त कुछ उपरी आमदनी भी हो जाती थी बात व्यवहार मे कुशल अमरेन्द्र का कभी कभी झगड़ा भी हो जाता था। जिस संस्था को अपना खून पसीना दिया उसने कभी न्याय नही किया दीवाली के बोनस के अतिरिक्त कोई अलग प्रोत्साहन नही।

अस्पताल का काम बढा वह एक शोध और शिक्षण संस्थान मे बदल चुका था 



सभी पुराने स्टाफ की तरक्की हो गई थी यहां तक की काउंटर पर पर्ची बनाने वाले क्लर्क भी अब मैनेजर बन कर मोटी सैलरी लेने लगे थे पर पाल का काम अब भी वही था। फिर भी ईश्वरीय शक्ति मे यकीन कर बडी निष्ठा से काम करता रहा जब अस्पताल के सुरक्षा व्यवस्था का टेंडर जारी हुआ।

बड़ी बड़ी प्राइवेट सुरक्षा एजेन्सियों ने दिलचस्पी दिखाई अमरेन्द्र ने भी एक छोटी सी कंपनी बनाकर टेंडर डाल दिया था। मालिक का बेटा रोहन जो स्विट्जरलैंड मे कहीं सैटल था वो पाल को जानता था उससे सिफारिश की तो उसने हां कर दिया। मगर मणिदास ने ऐन वक्त पर अडंगा लगा दिया और होता होता काम रूक गया। सहकर्मी और कंपनी को तेज तर्रार बन्दा नही चाहिए था। कुछ बहाने से पाल को छुट्टी दे दी गई और वह बेरोजगार हो गया।

मुसीबतें अकेले थोड़े आती हैं, संक्रामक बीमारी कोरोना ने कोढ मे खाज कर दी, बीमार हुए तो इसी अस्पताल मे भर्ती हुए।



संक्रमण ज्यादा था इलाज के दौरान मौत हो गई परिवार वालों को शव देने हेतु अस्पताल ने लाख का बिल बनाया।

वर्षो से आर्थिक परेशानी से जूझता परिवार बिल चुका पाने मे असमर्थ था। बेटा और पत्नी अस्पताल के हैड के पास गये, विनती की हाथ जोड़े तब पसीजकर अस्पताल प्रशासन ने करूणा दिखाते हुए अपने पूर्व कर्मचारी की सेवाओं को ध्यान मे रखते हुए बिल मे 30 प्रतिशत का डिस्काउंट दिया। पाल का खरीदा एक ही प्लाट रह गया था, वह औने पौने दाम मे बेच कर बिल का भुगतान कर शव का अंतिम संस्कार किया गया।

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:-शशिवेन्द्र "शशि"

शुक्रवार, 18 नवंबर 2022

सम्मान

पहलवान जतन चौधरी का इलाके मे काफी नाम था दूर दूर तक कुश्ती मे कोई सानी नही था। मन मे राष्ट्रीय स्तर पर कभी ना खेल पाने का मलाल रह गया था। माता पिता अधूरे सपने को अपने बच्चो की आंखों मे देखने लगते हैं जब शादी हुई और एक के बाद एक तीन लडकियां हुई तो जतन को अपना सपना टूटता दिखा।


मन मसोस कर रह गया छोरियां क्या पहलवानी करेंगी और फिर... खैर छोड़ो यह सपना छोड़कर जतन ने खेती और काम धंधे पर मन लगाना शुरू किया पहलवानी मे सीखी लगन और अनुशासन ने यहां भी रंग दिखाया और जल्दी ही क्षेत्र के सबसे समृद्ध किसानों मे गिनती होने लगी। बेटियां बड़ी हुई तो दो की शादी कर दी बस अब तीसरी बच रही थी। वो अभी कॉलेज मे पढ़ाई कर रही है सोचा पढ लिखकर अफसर भी लग जाये तो ठीक नाम हो जाये। पर उसका मन तो कही और ही है शायद नेतागिरी मे।

नेतागिरी मे आज तक हमारे खानदान से किसी ने कभी चुनाव ना लडा, हम वोट तक अनमने ढंग से डालते हैं फिर क्या करेगी यह चुनाव लड़कर। पिछली बार अपने कालेज के किसी चुनाव की बात कर रही थी। ना भैया ना मेरी बेटी नही लडेगी, हमारे खानदान की इज्जत दांव पर ना लगायेगी।


अबकी घर आती है तो शादी की बात चलाउंगा शादी कर अपने घर जा वहीं लडे चुनाव। जतन ने ट्रैक्टर पर बैठे बगल की सीट पर बैठी पत्नी से कहा। पत्नी चुप रही वो भी अच्छे खाते पीते घर से आयी थी थोडी बहुत पढी भी थी पर जतन के घर मे बोलने की ज्यादा स्वतंत्रता नही थीं सो चुप ही रहती थी।

जब बेटी ललिता अबकी घर आयी तो बाप बेटी मे बात शुरू हुई बेटी नई नई बातें बता रही थी। चौधरी बोलना चाह रहा था पर उसकी बाते सुनी तो चुप सुनता रह गया। बाते तो बड़ी अच्छी करती है सुन्दर तर्कपूर्ण समुचित उत्तर, चौधरी दाव पेच का सामंजस्य खूब समझता था उसे चर्चा की इस कुश्ती मे पुत्री से हारते हुए बड़ा अच्छा लगा।

कई दिन बीत गये बेटी की छुटटियां खत्म हो गई थीं अब वह वापस जाने वाली थी बाकी दोनो बिटिया भी छुट्टी मे आ गयीं थीं चौधरी ने सही समय देख ललिता को बुलाया।

ललिता आंगन मे पडें तखत पर बैठ गई चौधरी आंगन के मोढे पर बैठा बोला " बेटा जमाना खराब है, मुझे चिन्ता होती हैं, आजकल बेटियों के साथ हादसे हो रहे हैं। लोगो मे पाप पुण्य का भय खत्म हो गया है। मेरी बात मान अब शादी कर ले मैने एक लड़का देखा है। सुन्दर पढा लिखा है और दिल्ली पुलिस मे इंस्पेक्टर है। ललिता ठिठक गई बापू आज क्या हो गया, अचानक ये क्यों अभी सुबह तक तो सब ठीक था। जवान बेटी का बाप चिन्ता तो करेगा ही।

हां बापू पर मैंने ऐसा क्या किया, जो आप परेशान हो रहे।मै तो आपका ही नाम बढाउंगी। धीरे से ही सही सभी ने उसका समर्थन किया।



चौधरी निरूत्तर था चार औरतें वो अकेला पत्नी की तरफ इशारा करके बोला समझाओ इसे।

बड़ी बेटी बोली "पापा जी ललिता ने बहुत मेहनत की है उसे इस बार अपने मन की कर लेने दो।

चौधरी घूरते हुए मुड़ा ही था की पत्नी की आवाज आयी "जब बेटियां इतनी मिन्नते कर रही है तो इस बार खुद को ही समझा लो। बात व्यंग्यपूर्ण थी पर मर्मपूर्ण थी।

चौधरी मैने और मेरी बेटियों ने कभी तुम्हारी मूंछ नीची ना होने दी भरोसा रखो।

बात सही थी चौधरी चुप रह गया बेटी को बस स्टैंड तक छोड़कर आया।

समय बीतता गया एक दिन शाम को ललिता का फोन आया वो विश्वविद्यालय का छात्रसंघ का चुनाव जीत गई है। अगले दिन सुबह नौ बजे तक चौधरी के घर के आगे हजारों की भीड़ जुट गई बधाई देने वालों का तांता लगा था। फूल मालाओं से लदी ललिता ने पिता के चरण स्पर्श किए तो चौधरी की मूंछे बिना ताव दिए ही आसमान छूं रहीं थीं।

बेटी के इस सम्मान  से अभिभूत चौधरी की आंखे विजय के गर्व से नम थी।

#Ssps96 

शशिवेन्द्र "शशि"

महात्म्य :

रामाज्ञा वैद्य अब बुजुर्ग हो चले थे। इधर गांव मे आज भी कोसों दूर तक कोई भी उनकी तरह कारगर नही था। हालांकि आयु 90 वर्ष पार कर चुकी थी पर यम नियम के इतने पक्के थे कि दूसरे की पकायी चीज तक नही खाते थे। उनका गांव शहर से काफी दूर था और  आवागमन के लिए लोगो के पास सीमित साधन थे। वैसे तो गांव मे सब कुछ ठीक ही रहता था और जो थोड़ा बहुत ही कुछ होता तो वैद्य जी संभाल लेते थे। आधुनिक दौर मे भी उनका आयुर्वेदिक दवाएं गजब का कमाल करती थीं। 

इस दौर मे भी गांव अपनी जरूरतों के लिए खुद पर ही निर्भर रहता था। छोटी छोटी जरूरतों के लिए शहर का मुंह नही देखना पडता। 

वैद्य जी का बेटा हरीश अपनी डॉक्टरी की पढ़ाई पूरी कर शहर मे ही नौकरी करने लगा। पिता पुत्र के स्वभाव में बहुत फर्क था। दोनो के लिए धर्म और कर्तव्य का अर्थ भी अलग था। एक के लिए मानव सेवा ही धर्म तो दूसरे को सेवा के मोल से अधिक मतलब था। वैद्य जी ने खूब समझाया पैसा प्राथमिक नही होता लोकसेवा से अर्जित पुण्य का ही असल महत्व हैं पर बेटे पर आधुनिकता का रंग ऐसा चढ़ा था की वह पैसे को ही सब कुछ समझता था।

वैद्य जी ने भी इसे अपना भाग्यफल मान खुद को सहज बना लिया था। पत्नी के साथ अपने खेतों मे खूब मेहनत करते एवं प्रकृति के सानिध्य मे ही रहते। इससे मानो उनकी आयु जैसे स्थिर बनी हुई थी परन्तु इसके विपरीत पुत्र हरीश ज्यादा मेहनत करता और आय के चक्कर मे शहर के आपाधापी भरे जीवन में रहते हुए उसे नित्यप्रति रोगियों के साथ रहते रहते स्वयं भी थोड़े अस्वस्थ रहने लगा था। 


पर यह दौर पैसे कमाने का है और लक्ष्मी तो कर्मठ व्यक्ति की ही पकड़ मे आती हैं। यही सोचकर दिन रात एक कर दिया था। एक हास्पिटल भी खोल लिया था व्यस्तता मे हफ्ते मे एकाध बार माता पिता से बात भी हो जाती। 

हालांकि पुत्र प्रेम मे विह्वल वैद्य जी हां हूं बोल देते पर अवसर मिलते ही बेटे को नैतिकता का पाठ भी अवश्य पढा दिया करते थे। हरीश को पिता की बातें नागवार लगती शहर मे कितना नाम है मेरा और एक ये हैं जो मुझे अलग ही नसीहत दे रहे हैं। शायद पिता जी अपने जीवन मे कुछ खास नही कर पाये अतः उनको थोड़ा अपमान महसूस करते होंगे।

नियति ने माता पिता दो ऐसे रिश्ते बनाये है जो हमेशा अपनी संतान को खुद से आगे देखना चाहते हैं। परंतु जब ऐसा अभिमान पुत्र के मन मे पलने लगे तब उसका नष्ट होना भी तय हो जाता हैं। पग पग पर स्पर्धा से भरे इस जीवन मे कोई आपको स्वयं से आगे देखना चाहता है वह पिता होता है।

पुत्र के विशेष हठ पर वैद्य जी पत्नी समेत कुछ दिनो के लिए शहर आये थे। बेटे ने बड़ी चालाकी से अपना वैभव दिखाने बुलाया था। 

दुपहर के समय अस्पताल का एक चक्कर लगाते वैद्य जी एक औरत और एक लडके से मिले जिन्हे डाक्टर के जवाब ने बड़ा परेशान कर रखा था। वह पुरूष एक असाध्य रोग से पीड़ित था और मृत्यु के काफी नजदीक था।



वैद्य जी ने उनकी बातें सुनी उसकी नब्ज पकड़ी और जब कुछ मर्ज समझ मे आया तो बोले बाबू आज तो मै घर जा रहा हूं आपको इलाज चाहिए तो मेरे साथ वहां चलो। मृत्यु के निकट व्यक्ति को जब कोई और उपाय न सूझता देख वह उनके साथ हो लिया। परिवार भी जीवन की आस मिलती देख अपनी सहमति दे देता हैं।

सश्रम जीवनयापन और वैद्य जी की औषधियों का प्रयोग करते हुए बरसों बीत चुके थे रोगी अब स्वस्थ हो चला था। गांव की प्राकृतिक आबो हवा और स्वस्थ खुराक से हृष्ट-पुष्ट भी हो गया था।

अबकी बार जब वैद्य जी हरीश से मिलने आये तो उस व्यक्ति को भी अपने साथ ले आये। उसका परिवार इस बात से बहुत खुश था। जबकि हरीश चुपचाप खड़ा अपने पिता के ज्ञान और आयुर्वेद के महात्म्य को अब समझ पाया था।।

#Ssps96

शशिवेन्द्र "शशि"


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