बुधवार, 4 सितंबर 2024

गुरू महिमा के हिन्दी दोहे

            हिन्दी और गुरू महिमा 

🙏गुरू अंधेरे जीवन में प्रकाश लाते हैं। हालांकि यह कोई औपचारिक पद नहीं है, प्रत्येक व्यक्ति जिसने ज्ञान देकर दूसरे के जीवन को बेहतर बनाया है, वह गुरु है।

 
-) सब धरती कागज करूँ, लिखनी सब बनराय
   सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाय 

-) गुरू गोविन्द दोऊ खड़े, काके लागूं पांय
    बलिहारी गुरू अपने गोविन्द दियो बताय 

-) कुमति कीच चेला भरा, गुरु ज्ञान जल होय
    जनम - जनम का मोरचा, पल में डारे धोया 

-) गुरु कुम्हार शिष कुंभ है, गढ़ि - गढ़ि काढ़ै खोट
    अन्तर हाथ सहार दै, बाहर बाहै चोट 

-) गुरु समान दाता नहीं, याचक शीष समान
    तीन लोक की सम्पदा, सो गुरु दीन्ही दान 

-) गुरु को सिर राखिये, चलिये आज्ञा माहिं
   कहैं कबीर ता दास को, तीन लोकों भय नाहिं 

-) गुरु मूरति आगे खड़ी, दुतिया भेद कुछ नाहिं
    उन्हीं कूं परनाम करि, सकल तिमिर मिटि जाहिं 

-) ज्ञान समागम प्रेम सुख, दया भक्ति विश्वास
    गुरु सेवा ते पाइए, सद् गुरु चरण निवास 

-) कबीरा ते नर अन्ध है गुरु को कहते और 
    हरि रूठे गुरु ठौर है गुरु रुठै नहीं ठौर 

-) गुरु बिन ज्ञान न उपजै गुरु बिन मिलै न मोक्ष 
    गुरु बिन लखै न सत्य को गुरु बिन मिटै न दोष 

-) तगुरू पारस को अन्तरो, जानत हैं सब संत
    वह लोहा कंचन करे, ये करि लेय महंत 

-) कुमति कीच चेला भरा गुरु ज्ञान जल होय
    जनम जनम का मोरचा पल में डारे धोय 

-) गुरु किया है देह का सतगुरु चीन्हा नाहिं 
   भवसागर के जाल में फिर फिर गोता खाहि

-) शब्द गुरु का शब्द है काया का गुरु काय
    भक्ति करै नित शब्द की सत्गुरु यौं समुझाय 

-) जो गुरु ते भ्रम न मिटे भ्रान्ति न जिसका जाय
    सो गुरु झूठा जानिये त्यागत देर न लाय

-) यह तन विषय की बेलरी गुरु अमृत की खान
    सीस दिये जो गुरु मिलै तो भी सस्ता जान

-) गुरु लोभ शिष लालची दोनों खेले दाँव
    दोनों बूड़े बापुरे चढ़ि पाथर की नाँव

-) मूल ध्यान गुरू रूप है मूल पूजा गुरू पाव 
    मूल नाम गुरू वचन है मूल सत्य सतभाव 

-) गुरु की आज्ञा आवै, गुरु की आज्ञा जाय 
    कहैं कबीर सो संत हैं, आवागमन नशाय 

-) जो गुरु बसै बनारसी, शीष समुन्दर तीर 
    एक पलक बिखरे नहीं, जो गुण होय शारीर तो भी सस्ता जान 

-) गुरु लोभ शिष लालची दोनों खेले दाँव
    दोनों बूड़े बापुरे चढ़ि पाथर की नाँव 

-) मूल ध्यान गुरू रूप है मूल पूजा गुरू पाव 
    मूल नाम गुरू वचन है मूल सत्य सतभाव  

-) गुरु की आज्ञा आवै, गुरु की आज्ञा जाय 
    कहैं कबीर सो संत हैं, आवागमन नशाय 

-) जो गुरु बसै बनारसी, शीष समुन्दर तीर 
    एक पलक बिखरे नहीं, जो गुण होय शारीर 

कबीर दास ने गुरु-शिष्य संबंध के महत्व पर बल दिया, यह कहते हुए कि एक सच्चा गुरु शिष्य को आध्यात्मिक ज्ञान की ओर मार्गदर्शन कर सकता है। उन्होंने इस विषय पर अपनी कविताओं और दोहों में विस्तार से लिखा। कबीर दास की शिक्षाएं और लेखन आज भी आध्यात्मिक मार्ग पर चलने वाले लोगों को प्रेरणा देती हैं, भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं में गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व को उजागर करती हैं।

उन्होने गुरु-शिष्य प्रेम की महिमा गाई, सच्चा गुरु जो शिष्य को ज्ञान के द्वार तक ले जाए।उनकी कविताओं और दोहों में यही संदेश है, गुरु-शिष्य परंपरा के महत्व का वर्णन भारतीय आध्यात्मिकता में भी है।

सोमवार, 29 जनवरी 2024

अंधेरा बुरा है क्या .......

अंधेरे को बुरा अब मत कहना
कमी मे जुड़कर यह इज्जत के रफूगर जैसा है

पता न चले कमी कुछ भी चाहे कैसी भी हो
चार लवों पे न आये बात चाहे जैसी भी हो
इस अंधेरे का एक वज़ूद है बड़ा ही खास
मजबूरी के नंगे बदन का बनता लिबास। ०१


अंधेरे को बुरा अब मत कहना
जरूरी होता है कुछ बातो का कोई राजदार न हो

चिराग का उजाला सभी को बड़ा प्यारा है
जलता हो गर वो पड़ोसी की दहलीज में
बस मद्धम रौशनी देता रहे सुकून की
ख्वाहिश करे न कभी तेल न बाती की।।०२

अंधेरे को बुरा अब मत कहना
घुमड़ती है चाहत उन्हें अपने जोर आजमाइश की

उनसे बड़ा कोई अय्यार तो न हुआ अभी
पता लगाने की जुगत मे भींचते है मुट्ठी
गिरा हाथ तो इज्जत चली जायेगी
पर अंधेरे मे खाक़ बात फैल पायेगी।।०३

अंधेरे को बुरा अब मत कहना
अब तो चांद की रौशनी पर भी किराया देना होगा

अपने हिस्से के आसमां का सबब भूल ही जा
कौन मकबूलियत के आसरे बैठा निहारेगा
मेहनत की रोटी है या रोटी अपने नसीब की
रौशन है साहेब की कोठी से झोंपड़ी गरीब की।।०४

अंधेरे को बुरा अब मत कहना
बच जाते हैं बेआबरू होकर गली से गुजरने से

हालात सामना करने लायक ना भी हों
गला साफकर गर्दन सीधा रखना ही तो है
छिपाये मुंह अपना वो जो धरे गये थे कल
यहां जुर्म को बस हाथों से फिसलना ही तो हैं।।०५

अंधेरे को बुरा अब मत कहना
उजाले का जश्न मनाने वालों सबके नसीब एक से नहीं

तुम्हारे सुखों के दामन में उस पसीने की बू
महक पाओं तो समझोगे उसमे आंसू भी हैं
किसी तरह पलंग पर काटते हो दिन अपने
जहां काटते मच्छर वहां खाक आते है सपने।।०६

अंधेरा बुरा है अब मत कहना
बड़ा जरूरी होता है कुछ बातों पर गुमनामी का पर्दा

अमीर की बेटी घर से निकलती है अंधेरे में
बेवा गरीब की दिन के उजाले मे मजूरी पे गई
हुआ बदनाम कौन सभी जानते हैं
पर बड़े को बुरा कहां मानते हैं।।०७

रविवार, 26 नवंबर 2023

गुरू नानक जी

सतगुरु नानक परगटिया
मिटी धुंध जग चानन होआ। 

सिख धर्म के प्रथम #गुरु एवं संस्थापक श्री #गुरु_नानक_देव_जी की पावन #GuruNanakJayanti के अवसर पर समस्त देशवासियों को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएं..!
#GuruNanakDevJi की शिक्षाओं का हृदय से पालन करें
बाबा #नानक जी #जयंती
#jayanti
#Ssps96

बुधवार, 4 अक्टूबर 2023

कायाकल्प

चिरंजीव साह कस्बे के धनाढ्य लोगो मे से एक थे पर लक्ष्मी तो चंचला होती हैं समय बदला अब दाने दाने के मोहताज हो गये। बचपन जितना सुखपूर्वक बीता था बुढापे मे उतनी ही ज्यादा कठिनाई धीरे धीरे बच्चे राह पर आ गये तो घर की तंगहाली समाप्त हुई। इस कठिनाई मे साह ने बहुत कुछ गंवाया इलाज के अभाव मे पत्नी चल बसी अब बुढ़ापे मे राम का नाम ही सहारा था। कस्बे के बाहर एक जीर्ण-शीर्ण मंदिर था। 



साह ने उसकी साफ सफाई  की और दिन भर वहीं रह कर राम का भजन करने लगे और मंदिर की देखभाल करते पेड पौधे लगाते। धीरे धीरे वहां और भक्तो का जमावड़ा होने लगा शाम को कीर्तन की मंडली बैठने लगी। गांव के ही नियरी यादव, पांचू सिंह और भुगत मल्लाह चार लोगों ने नित्य शाम को कीर्तन करना तय किया। सुर ताल सब ठीक था औ, निस्वार्थ भाव से ईश्वर भजन होता तो लोगो को भी मजा आने लगा धीरे धीरे श्रोताओं की संख्या बढ़कर सैकड़ो मे पहुंच गई देवी मंदिर मे चढ़ावा भी आने लगा।



कुछ दिन तक तो चिरंजीव इसका जिम्मा उठाते रहे, अपनी धोती की टेंट मे रुपये दबाकर रखते थे पर जब बोझ दिनोंदिन बढने लगा तो पांचू के हाथ मे देकर बोले भईया लक्ष्मी बडे बडों का मन फेर देती हैं फिर मेरा तो जीवन भर इनसे विशेष स्नेह रहा है। अब आप ही यह जिम्मा संभालो। पांचू नियरी मास्टर और भुगत प्रधान के गवाही मे कोषाध्यक्ष बन गये। तय हुआ अगले साल गंगा नहान के दिन से मंदिर का जीर्णोद्धार शुरू होगा सबने सहमति दी।

अगले साल इन भक्तों की देख रेख और जनसहयोग से  भव्य मंदिर निर्माण और विशाल भोज का आयोजन हुआ। कई कोस के गांवों से सैकड़ो लोग जुटे खूब कीर्तन भजन भी हुआ चारो ओर खूब धन्य धन्य हुआ। पर धार्मिक कार्य इतनी सहजता से नही होता, कल्याणार्थ कार्य मे कुछ खटमल भी होते है। 


इतना भव्य आयोजन किया इतना खर्चा हुआ अपने पास से एक भी रुपया तो लगाया नही होगा।

गांव मे इन विषयों पर दूसरा धड़ा बनने मे समय नही लगता। अब इनके खिलाफ विरोध की बातें होने लगी 

मसलन ये तो धर्म की आड़ मे चोरी कर रहे हैं,

चेहरे की चमक देखो इन बूढों के बुढ़ापे मे भी चारो कैसे लग रहे हैं, ऐसी अनगिनत बातें होने लगीं।

ऐसी ही कुछ इनके कानो तक पड़ी, कोरी धातु पर चोट करो तो उसकी पीड़ा की टंकार तेज होती है। श्रद्धापूर्वक ईश्वरीय भक्ति करते इन चारो को भी ऐसा ही दर्द महसूस हुआ। नियरी और पांचू ने तो अपनी गृहस्थी का हवाला दे किनारा कर लिया भुगत कुछ दिन तक निभाते रहे पर पारिवारिक दबाव मे वह भी समझौता कर बैठे। साह अकेले रह गये, कीर्तन का सुर कुछ कमजोर हो गया था। विरोधियों ने पंचायत बैठायी और इनके उपर हेर फेर का इल्जाम लगा तथा इनसे मंदिर की व्यवस्था का कार्य वापस ले लिया गया। नये व्यवस्थापक बड़े शौकीन थे धीरे धीरे कीर्तन की जगह, जगराता और फिर चर्चाओं ने ले लिया।

शाम को अब झाल मजीरों की जगह कहकहों और अटटहासों ने ले लिया। गांव के लोग में भी धीरे धीरे आस्तिकता बढने लगी थी मंदिर पर भक्तों की आवाजाही कम होने लगी थी।

आधी रात हो गई चिरंजीव को नींद नही आ रही थी चादर बदन पर डाल मंदिर की तरफ अनायास ही निकल पड़े। थोड़ी दूरी से आवाजें सुनायी दे रही थीं। अट्टहास के बीच कुछ मादा सुर मे कहकहे भी सुनायी दे रहे थे। साह दुखी मन से ईश्वर का ध्यान करते बोझिल कदमों से घर वापस लौट आये।

#Ssps96

:- शशिवेन्द्र "शशि"

शुक्रवार, 15 सितंबर 2023

ताकि जीवन बचा रहे

ताकि जीवन बचा रहे
वृक्ष लगाओ तन्मयता से
नव पीढ़ी पर्यावरण बचाये
अपनी पूरी क्षमता से।।1
कैसा कठिन रहेगा जीवन
गर नदिया मे पानी ना हो
कैसे गुजर करोगे प्यारे
घर मे रखा अन्न भी ना हो।।2

कौवा बुलबुल मोर हंस और
बगुले क्या तुम्हे नही रिझाते
पेड़ो पर बेठे बंदर क्या 
दांत दिखा न तुम्हे चिढ़ाते।।3

कैसा दुर्दिन होगा सोचो
आंगन मे गौरैया ना आए
कितना नीरस होगा बोलो
वृक्षों पर कोयल ना गाये।।4

चीतल खरहा हिरन भालू 
मरे पड़े क्या देख सकोगे
पुरखों ने जो तुमको सौंपा
उससे बुरा इतिहास लिखोगे।।5
इसे मिटाओ आगे बढ़कर
पर्यावरण बचाओ भाई
समझ बूझकर भेज रहा
"ओजोन दिवस" की तुम्हे बधाई।।6
:- शशिवेन्द्र "शशि"



गुरुवार, 7 सितंबर 2023

दरख्त से बना घर

जिस पेड़ की शाखों से मेरा आलीशान मकां बना है
उस दरख्त का मेरे घर के दरवाजे पर आना मना है।।


तो दूर गांव से ही अपनी दुआ के असर भेजती है मां
नये घर की इस मालकिन से मेरी मां का तनी तना है।।

हम अपने पुराने घर मे जैसे चाहते हैं वैसे रह लेते हैं
अम्मा के आंचल जैसा वो अब भी छोटा नही पड़ता।।

शहर की आलीशां कोठी मे बोझ है और घुटन भी है
दिल लगाकर बनाया जरूर है पर अंजानी कमी सी है।।

जगाने को घर में अलार्म है पर वो मजा नही आता
दरवाजे को बुहारते हुए कहां अब कोई है जगाता।।

न भाई बहनों की तकिए की तकरार, न जंग होती है
नही लड़ता है छुटका अब न ही मुनिया ही रोती है।।

अब तो आगे सोने को छुटकू की जिद भी न होती
कितने बदले है रिश्ते जरूरतें और खासकर हम

मनाना भी नही पड़ता उसे चंदा को मामा बता करके
न ही वो जिद करता है कभी फोन पर आ करके।।

दीवाली मे हुई थी बात अब परसों होली भी आ गई
कहां रोजाना फोन कर किसी को परेशां करे कोई।।

शायद यह अदब़, यह शऊर सीखा है मैने शह़र से
बेवजह बिना बात क्यूं किसी का वक्त बर्बाद करें।।

बचपन मे बदनाम लोगों को सुनता देखता था मैं
फलां की बेरूखी के किस्से को गौर से गुनता था मैं।।

मेरी छुटपन की बुद्धि तब फ़ैसला कर नही पाती
कैसे मां को अलग रखकर जिन्दगी जी हैं जाती।।

बड़ा होकर समझा हूं दुनियादारी के ये घने दांव
मैने भी है आजमाया मां को अलग रखने का रोग।।

सिमट गये हैं रिश्ते ये जिंदगी या हम इंसा बदले हैं
बदलते दौर मे सब कुछ बदल तरक्की को चले हैं।।

संवाद:- रिश्तों को निभाने मे हम अपने पूर्वजों से बहुत पीछे हैं। यकीं मानिए लंबा चौड़ा और भरा पूरा परिवार एक वरदान की तरह होता है। जड़ों से जुड़े रहिए 
इस कविता मे लिखी गई बातें मेरे निजी जीवन से भले ही ताल्लुक न रखती हों लेकिन एक लेखक के तौर पर समाज में इस तरह का अपभ्रंश मैं नियमित तौर पर देख रहा हूं। आप सभी भी रिश्तों मे आये इस तरह के अवमूल्यन को देखते होंगे।

बुधवार, 6 सितंबर 2023

वक्त:- रेतीली नदी

उजले बालों को देखकर ये ख्याल आता है
जहां मे मुस्ससलल क्या है वक्त के सिवा
गुमां बेकार है दौर को अपना बताने का
वक्त की दरिया मे बह जाते है सब निशां।।1

जिनका हुकुक कायम कभी अहले वतन में
दो गज़ मिट्टी मयस्सर नही उसे क़ब्रे दफ़न में
उम्र भी तो मुट्ठीभर रेत ही कहते हो साहेब
नही ये कम बीते जो जिन्दगी चैन ओ अमन से।।2

लिखने बैठो तो सब दुशवारिया टूट पड़ती हैं
किसी ने यादों की बाल्टी सिर पे उलट दी है
छुटपन के वो वादे इरादे अब भी याद आते हैं
आम की डाली पकड़ कसमें जो हम खाते थे।।3

खो गये वो मेरे दोस्त या सयाने हो बदल गये
मेरे मुहल्ले के वो सारे सामियाने भी जल गये
गली कच्ची रही नही तो लड़के कंचे खेले कैसे
तरक्की ने शायद उनकी ये खुशियां लूट ली है।।4


दौर बदलेगा, कल मेरा तो आज तुम्हारा होगा
बड़ी शिद्दत से हर दौर के कुछ सानी भी होंगे
पर्दा गिरा तो उनके किरदार भी बदल जायेंगे
इस उठापटक मे एक मशविरा ग़र तुम मानो।।5

संजो लेना उसे जेहन मे जो ख़ुशनुमा गुजारा है
जब कभी भी बैठोगे इस रेतीली नदी के किनारे
और उठाओगे इसकी रेत को पानी समझ़कर के
फिसल जायेगी यह, फिसलना इसकी फितरत में है।।6

आंसू

सिसकती रातों की मंजिल क्या है लरजते आसुंओं से हासिल क्या है जीते तो मिल ही जाती बादशाहत  पर हार जाने पे मुकम्मल क्या है।। थके तो...