चिरैयादह वर्तमान पंजाब और हरियाणा की सीमा से लगी एक स्वतंत्र रियासत थी। यह मलेर राजपूतों की राजधानी थी। किंवदन्ती है कि एक मलेर दस दिलेर के बराबर होता था और प्रत्येक दिलेर एक सवाशेर के बराबर होता था ।
यह अनुपात कुछ इस प्रकार था कि एक सवाशेर एक पूर्णतया विकसित और पुष्ट शेर की शक्ति के सवैया के बराबर माना जाता था। उस समय चिरैयादह का शासन सुलखा मलेर के हाथ में था जो अपने पिता बिराल की चौथी पत्नी की सातवीं संतान था।
उसके जन्म से पहले ही अलूवा सिद्ध ने बता दिया था कि चिरैयादह का नया मेठ आने वाला था। चिरैयादह में राजा को मेठ कहा जाता था । उसकी मां किसी कुलीन राजवंश से नही थी बल्कि एक चरवाहे की बेटी थी जो अपनी भेडों की रक्षा के लिए निहत्थे ही भेडियों के झुंड से भिड़ जाते थे। माता के वंश का शायद जुझारूपन का यही गुण सुलखान के व्यक्तित्व में समा गया था। वह बचपन से ही बहुत जुझारू और गंभीर था। अपने भाई बहनों मे वह 11वें नंबर पर था लेकिन पिता का स्नेह इसे कभी नही मिला।
बलबन उस समय दिल्ली की गद्दी पर बैठा और उसने चहलगानी समाप्त कर अब एक नयी सैन्य पद्धति चलायी थी। जिसमें सेना में भर्ती होने के लिए अन्य राजाओं को सुल्तान की सेवा में अपने राज्य से युवा सैनिक देने पडते थे। चिरैयादह राज्य अपने निर्माण से ही स्वतंत्र रहा था उसे गुलाम बनाने का साहस कभी किसी भी शासन में नही रहा लेकिन बलबन को अब ज्यादा सैनिकों की आवश्यकता थी और अपने शासन के नवोदित काल में ही मलेरों के इतने मजबूत समूह को दिल्ली के इतने पास नही रहने देना चाहता था। यह कूटनीतिक दृष्टि से भी सुरक्षित नही प्रतीत होता था बल्कि उसे तो आश्चर्य था कि कैसे उसके पूर्ववर्ती शासको ने इनहे फलने फूलने दिया था। सो वह उन्हे छेड़ने का खतरा लेने को बाध्य था। चहलगानी के अमीर अब इल्बारी तुर्कों से नफरत करने लगे थे क्योंकि बलबन इसी वंश खानदान से था। जब एक तुर्की अमीर को भरे दरबार में घुटनों पर बैठकर सुल्तान को सिजदा और पाबोस करना पडता था तो वह अंदर तक शर्मसार हो जाता था और अपने इस अपमान का बदला लेने के लिए वह किसी भी स्तर पर जाने को तैयार बैठा था लेकिन राज दरबार मे असंतोष का स्वर उठाने का किसी मे साहस न था। बलबन की मजबूत लौह और रक्त की नीति इसके लिए जिम्मेदार थी। वह अपनी अवज्ञा करने वालों के साथ भयंकर रूप से निपटता था। इससे उसके विरोधियों के हौसले पस्त हो जाते थे और विरोध का स्वर उनके कब्र मे दब कर क्षीण हो जाता था। इतनी बर्बरता और कठोरता के आगे सभी डरे हुए थे । यहां तक कि सुल्तान के मंत्री सलाहकार भी डर डर कर सलाह देते थे। बलबन छोटे कद का एक कठोर शासक था यह उसके चेहरे से भी झलकता था जो बचपन मे ही चेचक के दाग से भर गया था और विकृत लगता था। सुल्तान की गद्दी पर बैठा इक डरावना व्यक्ति जिसकी हनक मात्र से बडे बडे योद्धाओं की छाती बैठ जाती थी परंतु बलबन मे ऐसा कोई अवगुण नही था जो राज्य के लिए नुकसानदायक हो। शायद ऐसा इसलिए कि प्रकृति ने उसे मंगोलों की चुनौती झेलने के लिए तैयार किया था। मंगोल उस समय की सबसे बडी चुनौती थे, चहलगानी अलग षड्यंत्र बुन रही थी। बलबन की राह आसान नही थी लेकिन अपनी इच्छाशक्ति से वो आगे बढ रहा था मंगोलों के छोटे छोटे हमले नाकाम किये जा रहे थे जो आने वाले किसी बडे युद्ध का संकेत भी थी। बलबन इसे भांप चुका था और वह अपनी सैन्य मजबूती मे लग गया था। हालांकि उसकी सेना में अलग अलग समूह थे सबपर उनकी वीरता का ठप्पा लगा था लेकिन मंगोलों के लिए यह पर्याप्त नही था। मंगोलों का सरदार रंहोर खान कद काठी और क्रूरता मे हूबहू दूसरा चंगेज खान था। दुधमुंहे बच्चे को पटककर मारने के उसके कई कुख्यात किस्से सुनाये जाते थे। उसपर नरभक्षण का संशय भी था यहां तक कि रात्रि में उसकी ही सेवा में तैनात परिचायकों के गायब होने की कई घटनायें हो चुकी थी। दबी जुबान से उसके निशा-राक्षस होने की बात सुनने में आती थी । वह मांस का ऐसा प्रेमी था कि जानवरों के बच्चे का मुलायम मांस कच्चा खा जाता था। ऐसे भयानक और क्रूर शत्रु ने जब दिल्ली का रूख किया तो दिल्ली सल्तनत के अंदर भय इस कदर व्याप्त हुआ कि वणिक और व्यवसायी वर्ग अपना व्यवसाय छोड़कर पूरब मे बंगाल की तरफ जाने की योजना बनाने लगे । उनका मानना था कि रंहोर विप्लव करता हुआ दिल्ली और आसपास के इलाकों तक ही रहेगा यदि आगे भी बढ गया तो मध्यक्षेत्र तक जा सकेगा बंगाल का ध्यान नही करेगा। बलबन के पास इस बात की सूचना पहुँची तो वह पहले से ही आतंकित था अब उसकी रात की नींद भी गायब हो गयी थी। रोजाना सुबह शाम मंगोल टुकड़ी की सूचना मिलती, आज यहा तक आ पहुँचे परंतु जब मंगोल सेना सरहिंद तक आ गयी जो दिल्ली से महज चार दिन का सफर शेष रह गया तो बलबन की व्याकुलता बढ़ गयी। वैसे तो मंगोल कोई बहुत युद्ध के लिए प्रशिक्षित कौम नही थी परंतु युद्ध के बाद लूट-खसोट की इतनी तत्परता शायद ही किसी और कौम मे थी। यही एक वजह थी कि उनका प्रत्येक सदस्य लडने को आतुर एक खतरनाक योद्धा था और उसके हाथ मे पकड़ी गई हरेक चीज एक हथियार थी। वह समुद्र की एक बड़ी लहर की भांति थे जो अपने सामने आने वाली हरेक चीज को बहा ले जाती थी और पीछे तबाही का अवशेष छोड जाते थे। बलबन के पास इनकी कोई काट नही थी उसकी सेना मे रंहोर का इक अलग भय भी व्याप्त था ।
जो कच्चा मांस खा जाता हो उस दस्यु की शक्ति का क्या ही पारावार होगा।
बलबन और उसका पूरा सियासी खेमा इस पर विचार कर रहा था रतजगे हो रहे थे। आधी रात बीत चुकी थी कोई समाधान नही दिख रहा था। सबके हाथ माथा थामे हुए थे अचानक जलीग नुसाई जो बलबन का बावर्ची था कहवे का कुल्हड लेकर शाही कमरे मे हाजिर हुआ और सुल्तान के दस्तरखान पर रखते हुए बोला
"हुजूर जान की माफी हो तो कुछ अर्ज करूं"
बलबन ने बिना उसकी ओर देखे बोलने का इशारा किया
"सुल्तान, इस मुसीबत को टालने के लिए पश्चिम की ओर क्यों नही देखते
जनाब, रंहोर को मलेर ही मार सकते है"।
और इतना कह कर वह हुक्म लेकर चला गया
बलबन के पास अब तक इसका समस्या कोई हल न था लेकिन अब उसके पास था
लेकिन मलेरों को मनायेगा कौन........क्रमशः
(शशिवेंद्र 'शशि' के उपन्यास 'चिरैयादह का मलेर' का अंश)
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