रविवार, 26 फ़रवरी 2023

प्रेम:- गहन सृष्टि तत्व

प्रेम विरह है वियोग है अनुभूति है संतुष्टि है
यह बूंद है सागर का बिन्दु है और सृष्टि है
ऐसा एक अह्सास जो दूर होने पर पास है
यह सहज विश्वास है जो बहुत ही खास है।।

प्रेम उधव के ज्ञान को क्षण में हर लेता है
राधा मीरा रसखान सदा अमर कर देता है।
रीझै मन इसपे तो गीत गोविन्द लिखता है
प्रेम विवश देव शिव धनु तोड़ते दिखता है।।

पानी को आकर्षित कर वाष्प बना देता है
अवयव यह प्रेम का सब जन का चहेता हैं
बुद्धि को ले अंकुश मे निर्जीव कर देता है
प्रेम पगा मायावश घट घट मे विचरता है।।

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