शशिवेंद्र 'शशि' एक लेखक और विचारक हैं जो लगभग दो दशकों से शिक्षण, अनुसंधान और लेखन के क्षेत्र से जुड़े हुए हैं। अपने लेखन के माध्यम से वह भारतीय समाज की परंपराओं और रुढ़ियों की जटिलताओं में गहराई से जाते हैं। वह जाति प्रणाली और असमानताओं की आलोचना करते हैं और सांस्कृतिक न्याय और समानता के लिए मजबूती से वकालत करते हैं। शशि समानता और सुलभ न्याय के लिए वकालत करते हैं, साथ ही साथ महान सांस्कृतिक विरासत का जश्न मनाते हैं। ट्विटर: @Shashivendra84 सोशल मीडिया हैशटैग: #Ssps96
रविवार, 27 अक्टूबर 2024
विस्मृत ईंटें
बुधवार, 4 सितंबर 2024
गुरू महिमा के हिन्दी दोहे
-) गुरु लोभ शिष लालची दोनों खेले दाँव
दोनों बूड़े बापुरे चढ़ि पाथर की नाँव
-) मूल ध्यान गुरू रूप है मूल पूजा गुरू पाव
मूल नाम गुरू वचन है मूल सत्य सतभाव
-) गुरु की आज्ञा आवै, गुरु की आज्ञा जाय
कहैं कबीर सो संत हैं, आवागमन नशाय
-) जो गुरु बसै बनारसी, शीष समुन्दर तीर
एक पलक बिखरे नहीं, जो गुण होय शारीर तो भी सस्ता जान
सोमवार, 29 जनवरी 2024
अंधेरा बुरा है क्या .......
कमी मे जुड़कर यह इज्जत के रफूगर जैसा है
पता न चले कमी कुछ भी चाहे कैसी भी हो
चार लवों पे न आये बात चाहे जैसी भी हो
इस अंधेरे का एक वज़ूद है बड़ा ही खास
मजबूरी के नंगे बदन का बनता लिबास। ०१
जरूरी होता है कुछ बातो का कोई राजदार न हो
चिराग का उजाला सभी को बड़ा प्यारा है
जलता हो गर वो पड़ोसी की दहलीज में
बस मद्धम रौशनी देता रहे सुकून की
ख्वाहिश करे न कभी तेल न बाती की।।०२
अंधेरे को बुरा अब मत कहना
घुमड़ती है चाहत उन्हें अपने जोर आजमाइश की
उनसे बड़ा कोई अय्यार तो न हुआ अभी
पता लगाने की जुगत मे भींचते है मुट्ठी
गिरा हाथ तो इज्जत चली जायेगी
पर अंधेरे मे खाक़ बात फैल पायेगी।।०३
अंधेरे को बुरा अब मत कहना
अब तो चांद की रौशनी पर भी किराया देना होगा
अपने हिस्से के आसमां का सबब भूल ही जा
कौन मकबूलियत के आसरे बैठा निहारेगा
मेहनत की रोटी है या रोटी अपने नसीब की
रौशन है साहेब की कोठी से झोंपड़ी गरीब की।।०४
अंधेरे को बुरा अब मत कहना
बच जाते हैं बेआबरू होकर गली से गुजरने से
हालात सामना करने लायक ना भी हों
गला साफकर गर्दन सीधा रखना ही तो है
छिपाये मुंह अपना वो जो धरे गये थे कल
यहां जुर्म को बस हाथों से फिसलना ही तो हैं।।०५
अंधेरे को बुरा अब मत कहना
उजाले का जश्न मनाने वालों सबके नसीब एक से नहीं
तुम्हारे सुखों के दामन में उस पसीने की बू
महक पाओं तो समझोगे उसमे आंसू भी हैं
किसी तरह पलंग पर काटते हो दिन अपने
जहां काटते मच्छर वहां खाक आते है सपने।।०६
बड़ा जरूरी होता है कुछ बातों पर गुमनामी का पर्दा
अमीर की बेटी घर से निकलती है अंधेरे में
बेवा गरीब की दिन के उजाले मे मजूरी पे गई
हुआ बदनाम कौन सभी जानते हैं
पर बड़े को बुरा कहां मानते हैं।।०७
रविवार, 26 नवंबर 2023
गुरू नानक जी
बुधवार, 4 अक्टूबर 2023
कायाकल्प
चिरंजीव साह कस्बे के धनाढ्य लोगो मे से एक थे पर लक्ष्मी तो चंचला होती हैं समय बदला अब दाने दाने के मोहताज हो गये। बचपन जितना सुखपूर्वक बीता था बुढापे मे उतनी ही ज्यादा कठिनाई धीरे धीरे बच्चे राह पर आ गये तो घर की तंगहाली समाप्त हुई। इस कठिनाई मे साह ने बहुत कुछ गंवाया इलाज के अभाव मे पत्नी चल बसी अब बुढ़ापे मे राम का नाम ही सहारा था। कस्बे के बाहर एक जीर्ण-शीर्ण मंदिर था।
साह ने उसकी साफ सफाई की और दिन भर वहीं रह कर राम का भजन करने लगे और मंदिर की देखभाल करते पेड पौधे लगाते। धीरे धीरे वहां और भक्तो का जमावड़ा होने लगा शाम को कीर्तन की मंडली बैठने लगी। गांव के ही नियरी यादव, पांचू सिंह और भुगत मल्लाह चार लोगों ने नित्य शाम को कीर्तन करना तय किया। सुर ताल सब ठीक था औ, निस्वार्थ भाव से ईश्वर भजन होता तो लोगो को भी मजा आने लगा धीरे धीरे श्रोताओं की संख्या बढ़कर सैकड़ो मे पहुंच गई देवी मंदिर मे चढ़ावा भी आने लगा।
कुछ दिन तक तो चिरंजीव इसका जिम्मा उठाते रहे, अपनी धोती की टेंट मे रुपये दबाकर रखते थे पर जब बोझ दिनोंदिन बढने लगा तो पांचू के हाथ मे देकर बोले भईया लक्ष्मी बडे बडों का मन फेर देती हैं फिर मेरा तो जीवन भर इनसे विशेष स्नेह रहा है। अब आप ही यह जिम्मा संभालो। पांचू नियरी मास्टर और भुगत प्रधान के गवाही मे कोषाध्यक्ष बन गये। तय हुआ अगले साल गंगा नहान के दिन से मंदिर का जीर्णोद्धार शुरू होगा सबने सहमति दी।
अगले साल इन भक्तों की देख रेख और जनसहयोग से भव्य मंदिर निर्माण और विशाल भोज का आयोजन हुआ। कई कोस के गांवों से सैकड़ो लोग जुटे खूब कीर्तन भजन भी हुआ चारो ओर खूब धन्य धन्य हुआ। पर धार्मिक कार्य इतनी सहजता से नही होता, कल्याणार्थ कार्य मे कुछ खटमल भी होते है।
इतना भव्य आयोजन किया इतना खर्चा हुआ अपने पास से एक भी रुपया तो लगाया नही होगा।
गांव मे इन विषयों पर दूसरा धड़ा बनने मे समय नही लगता। अब इनके खिलाफ विरोध की बातें होने लगी
मसलन ये तो धर्म की आड़ मे चोरी कर रहे हैं,
चेहरे की चमक देखो इन बूढों के बुढ़ापे मे भी चारो कैसे लग रहे हैं, ऐसी अनगिनत बातें होने लगीं।
ऐसी ही कुछ इनके कानो तक पड़ी, कोरी धातु पर चोट करो तो उसकी पीड़ा की टंकार तेज होती है। श्रद्धापूर्वक ईश्वरीय भक्ति करते इन चारो को भी ऐसा ही दर्द महसूस हुआ। नियरी और पांचू ने तो अपनी गृहस्थी का हवाला दे किनारा कर लिया भुगत कुछ दिन तक निभाते रहे पर पारिवारिक दबाव मे वह भी समझौता कर बैठे। साह अकेले रह गये, कीर्तन का सुर कुछ कमजोर हो गया था। विरोधियों ने पंचायत बैठायी और इनके उपर हेर फेर का इल्जाम लगा तथा इनसे मंदिर की व्यवस्था का कार्य वापस ले लिया गया। नये व्यवस्थापक बड़े शौकीन थे धीरे धीरे कीर्तन की जगह, जगराता और फिर चर्चाओं ने ले लिया।
शाम को अब झाल मजीरों की जगह कहकहों और अटटहासों ने ले लिया। गांव के लोग में भी धीरे धीरे आस्तिकता बढने लगी थी मंदिर पर भक्तों की आवाजाही कम होने लगी थी।
आधी रात हो गई चिरंजीव को नींद नही आ रही थी चादर बदन पर डाल मंदिर की तरफ अनायास ही निकल पड़े। थोड़ी दूरी से आवाजें सुनायी दे रही थीं। अट्टहास के बीच कुछ मादा सुर मे कहकहे भी सुनायी दे रहे थे। साह दुखी मन से ईश्वर का ध्यान करते बोझिल कदमों से घर वापस लौट आये।
#Ssps96
:- शशिवेन्द्र "शशि"
मुहावरेदार:- बंदर 🐒 क्या जाने अदरक का स्वाद
मुहावरेदार:- बंदर 🐒 क्या जाने अदरक का स्वाद शुक्रवार की बाजार मे थैले और जेब का भरसक संतुलन बनाने का प्रयास करते हुए मैं अगली ...
-
वृद्धाश्रम में सुबह की चाय पीते हुए शारदा बाबू नीम के पेड़ के नीचे वाले चबूतरे पर बैठ गये थे। सेवानिवृत्त होने के बाद धीरे धीरे यह तीसरा साल...
-
सिसकती रातों की मंजिल क्या है लरजते आसुंओं से हासिल क्या है जीते तो मिल ही जाती बादशाहत पर हार जाने पे मुकम्मल क्या है।। थके तो...
-
शीर्षक - वफादार घोड़े :- 🐎 आज के परिवेश मे राजनीतिक कार्यकर्ताओं की घोर निष्ठा और वफादारी अपनी स्वामिभक्ति के लिए विख...